अत-तौबा · 24/129
अनुवाद उच्चारण — अत-तौबा
قُلْ إِن كَانَ آبَاؤُكُمْ وَأَبْنَاؤُكُمْ وَإِخْوَانُكُمْ وَأَزْوَاجُكُمْ وَعَشِيرَتُكُمْ وَأَمْوَالٌ اقْتَرَفْتُمُوهَا وَتِجَارَةٌ تَخْشَوْنَ كَسَادَهَا وَمَسَاكِنُ تَرْضَوْنَهَا أَحَبَّ إِلَيْكُم مِّنَ اللَّهِ وَرَسُولِهِ وَجِهَادٍ فِي سَبِيلِهِ فَتَرَبَّصُوا حَتَّىٰ يَأْتِيَ اللَّهُ بِأَمْرِهِ ۗ وَاللَّهُ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الْفَاسِقِينَ ۝٢٤
Qul in kaana aabaaa`ukum wa abnaaa`ukum wa ikhwaanukum wa azwaajukum wa `asheeratukum wa amwaaluniq taraftumoohaa wa tijaaratun takhshawna kasaadahaa wa masaakinu tardawnahaaa ahabba ilaikum minal laahi wa Rasoolihee wa Jihaadin fee Sabeelihee fatarabbasoo hattaa yaatiyallaahu bi amrih; wallaahu laa yahdil qawmal faasiqeen
📖 हिंदी अर्थ
(ऐ रसूल) तुम कह दो तुम्हारे बाप दादा और तुम्हारे बेटे और तुम्हारे भाई बन्द और तुम्हारी बीबियाँ और तुम्हारे कुनबे वाले और वह माल जो तुमने कमा के रख छोड़ा हैं और वह तिजारत जिसके मन्द पड़ जाने का तुम्हें अन्देशा है और वह मकानात जिन्हें तुम पसन्द करते हो अगर तुम्हें ख़ुदा से और उसके रसूल से और उसकी राह में जिहाद करने से ज्यादा अज़ीज़ है तो तुम ज़रा ठहरो यहाँ तक कि ख़ुदा अपना हुक्म (अज़ाब) मौजूद करे और ख़ुदा नाफरमान लोगों की हिदायत नहीं करता
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अनुवाद — Tafsir

कुछ शब्दों के अर्थ:

  • عَشِيرَتُكُمْ: तुम्हारे रिश्तेदार और क़रीबी लोग।
  • اقْتَرَفْتُمُوهَا: जिसे तुमने कमाया और इकट्ठा किया।
  • تَخْشَوْنَ كَسَادَهَا: जिसके बिकने (चलन) का तुम्हें डर हो।
  • مَسَاكِنُ تَرْضَوْنَهَا: वे घर और आवास जिन्हें तुम पसंद करते हो और जिनमें तुम्हें सुकून मिलता है।
  • فَتَرَبَّصُوا: तो इंतज़ार करो (अर्थात् अंजाम का इंतज़ार करो)।
  • الفَاسِقِينَ: आज्ञा का उल्लंघन करने वाले, हुक्म से निकल जाने वाले।

तफ़सीर (व्याख्या):

हे नबी! आप मुसलमानों से कह दीजिए कि अगर तुम्हारे बाप, तुम्हारे बेटे, तुम्हारे भाई, तुम्हारी पत्नियाँ, तुम्हारे क़रीबी रिश्तेदार, वे माल जो तुमने कमाए हैं, वह तिजारत जिसके मंदी (बिक्री न होने) का तुम्हें डर है, और वे आलीशान घर जिनमें तुम्हें रहना अच्छा लगता है — अगर ये सब चीज़ें तुम्हें अल्लाह, उसके रसूल और उसके रास्ते में जिहाद से ज़्यादा प्यारी हैं, तो फिर अल्लाह के अज़ाब का इंतज़ार करो। यह एक सख़्त चेतावनी है कि जो व्यक्ति दुनिया की इन चीज़ों को आख़िरत और अल्लाह की रज़ा पर तरजीह देता है, वह अल्लाह के क़हर (प्रकोप) का हक़दार बन जाता है। अल्लाह उस वक़्त तक अपना फ़ैसला सुना सकता है, और यह बात याद रखो कि अल्लाह उन लोगों को हिदायत नहीं देता जो उसकी आज्ञा से निकल जाते हैं (यानी फ़ासिक़ीन को वह सीधा रास्ता नहीं दिखाता)।

फ़ायदे (सीख):

  1. मोहब्बत का पैमाना: यह आयत साफ़ करती है कि अल्लाह और उसके रसूल की मोहब्बत किसी और चीज़ से बढ़कर होनी चाहिए। अगर दिल में दुनिया की चीज़ों की मुहब्बत ज़्यादा है, तो यह ईमान की कमज़ोरी की निशानी है।
  2. दुनिया की आज़माइश: यह आयत बताती है कि माल, औलाद, रिश्तेदार और घर — ये सब एक इम्तिहान हैं। इन्हें अल्लाह की राह पर कुर्बान करना ही असली कामयाबी है।
  3. जिहाद की अहमियत: जिहाद (अल्लाह की राह में कोशिश) का दर्जा इतना ऊँचा है कि उसकी तुलना दुनिया की सबसे प्यारी चीज़ों से की गई है। यह बताता है कि दीन की सरबुलंदी के लिए कुर्बानी देना कितना बड़ा काम है।
  4. अंजाम का डर: जो लोग दुनिया को आख़िरत पर तरजीह देते हैं, उन्हें अल्लाह के अज़ाब का इंतज़ार करना चाहिए। यह एक रहमत भरी चेतावनी है ताकि इंसान सुधर जाए।
  5. हिदायत अल्लाह के हाथ में: हिदायत सिर्फ़ अल्लाह देता है, और वह उन्हीं को देता है जो उसकी आज्ञा मानते हैं। फ़ासिक़ (आज्ञा का उल्लंघन करने वाला) हिदायत से महरूम रहता है।
🎧 सुनें

📜 आयत 22-26 — अत-तौबा

22خَالِدِينَ فِيهَا أَبَدًا ۚ إِنَّ اللَّهَ عِندَهُ أَجْرٌ عَظِيمٌ
और ये लोग उन बाग़ों में हमेशा अब्दआलाबाद (हमेशा हमेशा) तक रहेंगे बेशक ख़ुदा के पास तो बड़ा बड़ा अज्र व (सवाब) है
23يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَتَّخِذُوا آبَاءَكُمْ وَإِخْوَانَكُمْ أَوْلِيَاءَ إِنِ اسْتَحَبُّوا الْكُفْرَ عَلَى الْإِيمَانِ ۚ وَمَن يَتَوَلَّهُم مِّنكُمْ فَأُولَٰئِكَ هُمُ الظَّالِمُونَ
ऐ ईमानदारों अगर तुम्हारे माँ बाप और तुम्हारे (बहन) भाई ईमान के मुक़ाबले कुफ़्र को तरजीह देते हो तो तुम उनको (अपना) ख़ैर ख्वाह (हमदर्द) न समझो और तुममें जो शख़्स उनसे उलफ़त रखेगा तो यही लोग ज़ालिम है
24قُلْ إِن كَانَ آبَاؤُكُمْ وَأَبْنَاؤُكُمْ وَإِخْوَانُكُمْ وَأَزْوَاجُكُمْ وَعَشِيرَتُكُمْ وَأَمْوَالٌ اقْتَرَفْتُمُوهَا وَتِجَارَةٌ تَخْشَوْنَ كَسَادَهَا وَمَسَاكِنُ تَرْضَوْنَهَا أَحَبَّ إِلَيْكُم مِّنَ اللَّهِ وَرَسُولِهِ وَجِهَادٍ فِي سَبِيلِهِ فَتَرَبَّصُوا حَتَّىٰ يَأْتِيَ اللَّهُ بِأَمْرِهِ ۗ وَاللَّهُ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الْفَاسِقِينَ
(ऐ रसूल) तुम कह दो तुम्हारे बाप दादा और तुम्हारे बेटे और तुम्हारे भाई बन्द और तुम्हारी बीबियाँ और तुम्हारे कुनबे वाले और वह माल जो तुमने कमा के रख छोड़ा हैं और वह तिजारत जिसके मन्द पड़ जाने का तुम्हें अन्देशा है और वह मकानात जिन्हें तुम पसन्द करते हो अगर तुम्हें ख़ुदा से और उसके रसूल से और उसकी राह में जिहाद करने से ज्यादा अज़ीज़ है तो तुम ज़रा ठहरो यहाँ तक कि ख़ुदा अपना हुक्म (अज़ाब) मौजूद करे और ख़ुदा नाफरमान लोगों की हिदायत नहीं करता
25لَقَدْ نَصَرَكُمُ اللَّهُ فِي مَوَاطِنَ كَثِيرَةٍ ۙ وَيَوْمَ حُنَيْنٍ ۙ إِذْ أَعْجَبَتْكُمْ كَثْرَتُكُمْ فَلَمْ تُغْنِ عَنكُمْ شَيْئًا وَضَاقَتْ عَلَيْكُمُ الْأَرْضُ بِمَا رَحُبَتْ ثُمَّ وَلَّيْتُم مُّدْبِرِينَ
(मुसलमानों) ख़ुदा ने तुम्हारी बहुतेरे मक़ामात पर (ग़ैबी) इमदाद की और (ख़ासकर) जंग हुनैन के दिन जब तुम्हें अपनी क़सरत (तादाद) ने मग़रूर कर दिया था फिर वह क़सरत तुम्हें कुछ भी काम न आयी और (तुम ऐसे घबराए कि) ज़मीन बावजूद उस वसअत (फैलाव) के तुम पर तंग हो गई तुम पीठ कर भाग निकले
26ثُمَّ أَنزَلَ اللَّهُ سَكِينَتَهُ عَلَىٰ رَسُولِهِ وَعَلَى الْمُؤْمِنِينَ وَأَنزَلَ جُنُودًا لَّمْ تَرَوْهَا وَعَذَّبَ الَّذِينَ كَفَرُوا ۚ وَذَٰلِكَ جَزَاءُ الْكَافِرِينَ
तब ख़ुदा ने अपने रसूल पर और मोमिनीन पर अपनी (तरफ से) तसकीन नाज़िल फरमाई और (रसूल की ख़ातिर से) फ़रिश्तों के लश्कर भेजे जिन्हें तुम देखते भी नहीं थे और कुफ्फ़ार पर अज़ाब नाज़िल फरमाया और काफिरों की यही सज़ा है
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अनुवाद — अत-तौबा 24

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Tuesday, August 18, 2026

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