अत-तौबा · 23/129
अनुवाद उच्चारण — सूरा अत-तौबा
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَتَّخِذُوا آبَاءَكُمْ وَإِخْوَانَكُمْ أَوْلِيَاءَ إِنِ اسْتَحَبُّوا الْكُفْرَ عَلَى الْإِيمَانِ ۚ وَمَن يَتَوَلَّهُم مِّنكُمْ فَأُولَٰئِكَ هُمُ الظَّالِمُونَ ۝٢٣
Yaaa aiyuhal lazeena aamanoo laa tattakhizooo aabaaa `akum wa ikhwaanakum awliyaaa`a inis tahabbul kufra `alal eemaan; wa mai yatawal lahum minkum fa ulaaa`ika humuz zaalimoon
📖 हिंदी अर्थ
ऐ ईमानदारों अगर तुम्हारे माँ बाप और तुम्हारे (बहन) भाई ईमान के मुक़ाबले कुफ़्र को तरजीह देते हो तो तुम उनको (अपना) ख़ैर ख्वाह (हमदर्द) न समझो और तुममें जो शख़्स उनसे उलफ़त रखेगा तो यही लोग ज़ालिम है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • أَوْلِيَاء: मित्र, सहायक, विश्वासपात्र और करीबी साथी।
  • اسْتَحَبُّوا: पसंद किया, प्राथमिकता दी।
  • الظَّالِمُونَ: अत्याचारी, जो चीज़ को उसके सही स्थान पर न रखें।

तफसीर (व्याख्या):

हे ईमानवालों! यदि तुम्हारे पिता और भाई (या अन्य रिश्तेदार) कुफ्र को ईमान पर प्राथमिकता दें और कुफ्र ही उन्हें पसंद हो, तो उन्हें अपना मित्र, सहायक और विश्वासपात्र न बनाओ। उनसे मुसलमानों के भेद न खोलो, न ही उनसे अपने मामलों में सलाह-मशविरा करो, क्योंकि वे तुम्हें ईमान से रोकेंगे और अल्लाह की आज्ञा का पालन करने में बाधा डालेंगे। जो व्यक्ति उन्हें अपना मित्र बनाएगा और उनसे प्रेम रखेगा, उसने अल्लाह की अवज्ञा की और अपनी आत्मा पर अत्याचार किया—क्योंकि उसने मित्रता को उसके सही स्थान पर नहीं रखा और स्वयं को विनाश के मार्ग पर डाल दिया। यह आदेश उस समय विशेष रूप से महत्वपूर्ण था जब मुसलमानों को हिजरत (प्रवास) और जिहाद का सामना करना पड़ रहा था, और जो लोग कुफ्र पर डटे रहते थे, उनसे मित्रता रखना ईमान के विरुद्ध था।

लाभ और शिक्षाएँ:

  1. ईमान और कुफ्र के बीच कोई समझौता नहीं हो सकता—यदि कोई रिश्तेदार कुफ्र को पसंद करता है, तो उससे दिल की मुहब्बत और विश्वास का रिश्ता नहीं रखा जा सकता।
  2. रिश्तेदारी का दर्जा ईमान से ऊपर नहीं हो सकता; अल्लाह की रज़ा सबसे पहले है।
  3. मुसलमानों के भेद और रहस्य दुश्मनों तक नहीं पहुँचने चाहिए, चाहे वे रिश्तेदार ही क्यों न हों।
  4. यह आयत हमें सिखाती है कि सच्चा प्रेम और वफ़ादारी अल्लाह और उसके दीन के साथ होनी चाहिए, और यही वह रास्ता है जो दुनिया और आख़िरत में कामयाबी देता है।
  5. अत्याचार का सबसे बड़ा रूप यह है कि इंसान अपनी आत्मा को अल्लाह की नाफ़रमानी में डाल दे—इससे बचना ही असली भलाई है।


📜 आयत 21-25 — सूरा अत-तौबा

21يُبَشِّرُهُمْ رَبُّهُم بِرَحْمَةٍ مِّنْهُ وَرِضْوَانٍ وَجَنَّاتٍ لَّهُمْ فِيهَا نَعِيمٌ مُّقِيمٌ
उनका परवरदिगार उनको अपनी मेहरबानी और ख़ुशनूदी और ऐसे (हरे भरे) बाग़ों की ख़ुशख़बरी देता है जिसमें उनके लिए दाइमी ऐश व (आराम) होगा
22خَالِدِينَ فِيهَا أَبَدًا ۚ إِنَّ اللَّهَ عِندَهُ أَجْرٌ عَظِيمٌ
और ये लोग उन बाग़ों में हमेशा अब्दआलाबाद (हमेशा हमेशा) तक रहेंगे बेशक ख़ुदा के पास तो बड़ा बड़ा अज्र व (सवाब) है
23يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَتَّخِذُوا آبَاءَكُمْ وَإِخْوَانَكُمْ أَوْلِيَاءَ إِنِ اسْتَحَبُّوا الْكُفْرَ عَلَى الْإِيمَانِ ۚ وَمَن يَتَوَلَّهُم مِّنكُمْ فَأُولَٰئِكَ هُمُ الظَّالِمُونَ
ऐ ईमानदारों अगर तुम्हारे माँ बाप और तुम्हारे (बहन) भाई ईमान के मुक़ाबले कुफ़्र को तरजीह देते हो तो तुम उनको (अपना) ख़ैर ख्वाह (हमदर्द) न समझो और तुममें जो शख़्स उनसे उलफ़त रखेगा तो यही लोग ज़ालिम है
24قُلْ إِن كَانَ آبَاؤُكُمْ وَأَبْنَاؤُكُمْ وَإِخْوَانُكُمْ وَأَزْوَاجُكُمْ وَعَشِيرَتُكُمْ وَأَمْوَالٌ اقْتَرَفْتُمُوهَا وَتِجَارَةٌ تَخْشَوْنَ كَسَادَهَا وَمَسَاكِنُ تَرْضَوْنَهَا أَحَبَّ إِلَيْكُم مِّنَ اللَّهِ وَرَسُولِهِ وَجِهَادٍ فِي سَبِيلِهِ فَتَرَبَّصُوا حَتَّىٰ يَأْتِيَ اللَّهُ بِأَمْرِهِ ۗ وَاللَّهُ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الْفَاسِقِينَ
(ऐ रसूल) तुम कह दो तुम्हारे बाप दादा और तुम्हारे बेटे और तुम्हारे भाई बन्द और तुम्हारी बीबियाँ और तुम्हारे कुनबे वाले और वह माल जो तुमने कमा के रख छोड़ा हैं और वह तिजारत जिसके मन्द पड़ जाने का तुम्हें अन्देशा है और वह मकानात जिन्हें तुम पसन्द करते हो अगर तुम्हें ख़ुदा से और उसके रसूल से और उसकी राह में जिहाद करने से ज्यादा अज़ीज़ है तो तुम ज़रा ठहरो यहाँ तक कि ख़ुदा अपना हुक्म (अज़ाब) मौजूद करे और ख़ुदा नाफरमान लोगों की हिदायत नहीं करता
25لَقَدْ نَصَرَكُمُ اللَّهُ فِي مَوَاطِنَ كَثِيرَةٍ ۙ وَيَوْمَ حُنَيْنٍ ۙ إِذْ أَعْجَبَتْكُمْ كَثْرَتُكُمْ فَلَمْ تُغْنِ عَنكُمْ شَيْئًا وَضَاقَتْ عَلَيْكُمُ الْأَرْضُ بِمَا رَحُبَتْ ثُمَّ وَلَّيْتُم مُّدْبِرِينَ
(मुसलमानों) ख़ुदा ने तुम्हारी बहुतेरे मक़ामात पर (ग़ैबी) इमदाद की और (ख़ासकर) जंग हुनैन के दिन जब तुम्हें अपनी क़सरत (तादाद) ने मग़रूर कर दिया था फिर वह क़सरत तुम्हें कुछ भी काम न आयी और (तुम ऐसे घबराए कि) ज़मीन बावजूद उस वसअत (फैलाव) के तुम पर तंग हो गई तुम पीठ कर भाग निकले
अत-तौबाकुरान सूची
129आयत
मदनीअवतरण स्थान
23आयत

अनुवाद — अत-तौबा 23

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Monday, September 28, 2026

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