بِمَا كَانُوا يَكْسِبُونَ: उन कर्मों के कारण जो वे कमाते थे
तफसीर (व्याख्या):
यह आयत उन मुनाफ़िक़ों (दिखावटी मुसलमानों) के बारे में है जो अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के साथ तबूक के जिहाद में शामिल नहीं हुए और पीछे रह गए। अल्लाह तआला उन्हें धमकी के अंदाज़ में कहता है कि वे इस दुनिया की फ़ानी (नाशवान) ज़िंदगी में थोड़ी सी हँसी हँस लें, क्योंकि यह हँसी बहुत कम समय के लिए है। लेकिन आगे उनका इंतज़ार कर रहा है वह लंबा और दर्दनाक रोना — जहन्नम की आग में — जो कभी खत्म नहीं होगा। यह उनके उन कर्मों का बदला है जो उन्होंने दुनिया में किए — निफ़ाक़ (मुनाफ़िक़ी), कुफ़्र (इनकार), और गुनाह — जिनकी वजह से उन्होंने अल्लाह की राह में जिहाद से बचना चुना और अपने नफ़्स की ख्वाहिशों की پیروی की।
यानी यह आयत उन्हें बताती है कि दुनिया की यह हँसी बहुत थोड़ी है, और आख़िरत का रोना बहुत लंबा और भारी है। जो लोग अल्लाह के हुक्म से मुँह मोड़ते हैं और अपने गुनाहों पर हँसते-खेलते रहते हैं, उनका अंजाम यही है कि वे उस दिन बहुत रोएँगे जब रोना किसी काम नहीं आएगा।
फ़ायदे (सबक):
दुनिया की हँसी फ़ानी है — यह आयत हमें सिखाती है कि दुनिया की खुशियाँ और हँसी बहुत थोड़ी और अस्थायी हैं। अक्लमंद वह है जो इस थोड़ी सी हँसी के बदले आख़िरत की हमेशा की खुशियाँ न खोए।
गुनाह का अंजाम दर्दनाक है — जो लोग गुनाहों पर हँसते हैं और अल्लाह के हुक्मों को हल्का समझते हैं, उनका अंजाम रोना और पछतावा है। इससे हमें अपने आमाल की जाँच करनी चाहिए कि कहीं हम भी उन लोगों में से तो नहीं जो दुनिया की ख्वाहिशों के पीछे पड़कर आख़िरत को भूल रहे हैं।
अल्लाह की राह में कुर्बानी की अहमियत — यह आयत उन लोगों के लिए सबक है जो अल्लाह की राह में जिहाद और नेक कामों से पीछे रहते हैं। मुसलमान को चाहिए कि वह अल्लाह की राह में अपने माल, वक़्त और ताकत से हिस्सा ले, ताकि उसे आख़िरत में पछतावा न करना पड़े।
तौबा का दरवाज़ा खुला है — यह आयत धमकी के साथ-साथ रहमत की तरफ इशारा भी करती है। जो लोग गुनाह में मुब्तिला हैं, उन्हें चाहिए कि वे अभी तौबा कर लें, क्योंकि अल्लाह तौबा कबूल करने वाला और बहुत मेहरबान है। यह आयत हमें बताती है कि हमें अपनी ज़िंदगी को इस तरह गुज़ारना चाहिए कि हमारी हँसी और खुशी दोनों जगहों (दुनिया और आख़िरत) में हो — और वह तभी मुमकिन है जब हम अल्लाह की इताअत (आज्ञाकारिता) में जिएँ।
(ऐ रसूल) ख्वाह तुम उन (मुनाफिक़ों) के लिए मग़फिरत की दुआ मॉगों या उनके लिए मग़फिरत की दुआ न मॉगों (उनके लिए बराबर है) तुम उनके लिए सत्तर बार भी बख्शिस की दुआ मांगोगे तो भी ख़ुदा उनको हरगिज़ न बख्शेगा ये (सज़ा) इस सबब से है कि उन लोगों ने ख़ुदा और उसके रसूल के साथ कुफ्र किया और ख़ुदा बदकार लोगों को मंज़िलें मकसूद तक नहीं पहुँचाया करता
(जंगे तबूक़ में) रसूले ख़ुदा के पीछे रह जाने वाले अपनी जगह बैठ रहने (और जिहाद में न जाने) से ख़ुश हुए और अपने माल और आपनी जानों से ख़ुदा की राह में जिहाद करना उनको मकरू मालूम हुआ और कहने लगे (इस) गर्मी में (घर से) न निकलो (ऐ रसूल) तुम कह दो कि जहन्नुम की आग (जिसमें तुम चलोगे उससे कहीं ज्यादा गर्म है
तो (ऐ रसूल) अगर ख़ुदा तुम इन मुनाफेक़ीन के किसी गिरोह की तरफ (जिहाद से सहीसालिम) वापस लाए फिर तुमसे (जिहाद के वास्ते) निकलने की इजाज़त माँगें तो तुम साफ़ कह दो कि तुम मेरे साथ (जिहाद के वास्ते) हरगिज़ न निकलने पाओगे और न हरगिज़ दुश्मन से मेरे साथ लड़ने पाओगे जब तुमने पहली मरतबा (घर में) बैठे रहना पसन्द किया तो (अब भी) पीछे रह जाने वालों के साथ (घर में) बैठे रहो
और (ऐ रसूल) उन मुनाफिक़ीन में से जो मर जाए तो कभी ना किसी पर नमाजे ज़नाज़ा पढ़ना और न उसकी क़ब्र पर (जाकर) खडे होना इन लोगों ने यक़ीनन ख़ुदा और उसके रसूल के साथ कुफ़्र किया और बदकारी की हालत में मर (भी) गए
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