अत-तौबा · 81/129
अनुवाद उच्चारण — अत-तौबा
فَرِحَ الْمُخَلَّفُونَ بِمَقْعَدِهِمْ خِلَافَ رَسُولِ اللَّهِ وَكَرِهُوا أَن يُجَاهِدُوا بِأَمْوَالِهِمْ وَأَنفُسِهِمْ فِي سَبِيلِ اللَّهِ وَقَالُوا لَا تَنفِرُوا فِي الْحَرِّ ۗ قُلْ نَارُ جَهَنَّمَ أَشَدُّ حَرًّا ۚ لَّوْ كَانُوا يَفْقَهُونَ ۝٨١
Farihal mukhallafoona bimaq`adihim khilaafa Rasoolil laahi wa karihooo ai yujaahidoo bi amwaalihim wa anfusihim fee sabeelil laahi wa qaaloo la tanfiroo fil harr; qul Naaru jahannama ashaddu harraa; law kaanoo yafqahoon
📖 हिंदी अर्थ
(जंगे तबूक़ में) रसूले ख़ुदा के पीछे रह जाने वाले अपनी जगह बैठ रहने (और जिहाद में न जाने) से ख़ुश हुए और अपने माल और आपनी जानों से ख़ुदा की राह में जिहाद करना उनको मकरू मालूम हुआ और कहने लगे (इस) गर्मी में (घर से) न निकलो (ऐ रसूल) तुम कह दो कि जहन्नुम की आग (जिसमें तुम चलोगे उससे कहीं ज्यादा गर्म है
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • فَرِحَ: खुश हुआ, आनन्दित हुआ
  • الْمُخَلَّفُونَ: वे लोग जो पीछे छोड़ दिए गए (यानी जिहाद से बचकर बैठने वाले मुनाफ़िक़ीन)
  • بِمَقْعَدِهِمْ: अपने बैठे रहने पर
  • خِلَافَ رَسُولِ اللَّهِ: रसूलुल्लाह ﷺ की مخالفت करके
  • كَرِهُوا: उन्होंने नापसन्द किया
  • لَا تَنفِرُوا: तुम निकलो मत (जिहाद के लिए)
  • الْحَرِّ: गर्मी
  • يَفْقَهُونَ: समझते, जानते

तफ़सीर:

यह आयत उन मुनाफ़िक़ों (दिखावटी मुसलमानों) के हाल का वर्णन करती है जो ग़ज़वा-ए-तबूक के समय रसूलुल्लाह ﷺ के साथ जिहाद के लिए नहीं निकले। यह ग़ज़वा अत्यधिक गर्मी के मौसम में हुई थी, और इसमें सफ़र भी बहुत लंबा और कठिन था।

इन मुनाफ़िक़ों ने रसूलुल्लाह ﷺ की खुली مخالفت करते हुए मदीना में बैठे रहने को अपनी ख़ुशी और कामयाबी समझा। उन्हें अपने इस काम पर बहुत फ़ख़्र था कि उन्होंने जिहाद से बचकर अपनी जान और माल को सुरक्षित रख लिया। उन्होंने अपने माल और जान के साथ अल्लाह के रास्ते में जिहाद करना नापसन्द किया, क्योंकि उनके दिलों में अल्लाह पर ईमान और उसके इनाम की उम्मीद नहीं थी।

इतना ही नहीं, बल्कि उन्होंने दूसरे कमज़ोर ईमान वाले लोगों को भी गुमराह करने की कोशिश की और कहा: "गर्मी में मत निकलो!" वे चाहते थे कि और लोग भी उनकी तरह जिहाद से पीछे रह जाएँ।

इस पर अल्लाह तआला ने रसूलुल्लाह ﷺ को हुक्म दिया कि उनसे कहें: "जहन्नम की आग इस गर्मी से कहीं ज़्यादा सख़्त है!" यानी जिस गर्मी से तुम डरकर जिहाद से भागे हो, उससे कहीं बढ़कर गर्मी जहन्नम में है, जो तुम्हारे इस कुकर्म की सज़ा में तुम्हारा इंतज़ार कर रही है। अगर वे यह बात समझते और जानते होते, तो कभी भी जिहाद से पीछे नहीं रहते।


फ़ायदे और सबक़:

  1. जिहाद की अहमियत: यह आयत सिखाती है कि अल्लाह के रास्ते में जिहाद (अपने माल और जान से) एक बहुत बड़ी नेमत और इबादत है। जो लोग इसे छोड़ते हैं, वह अल्लाह की नज़र में बड़े नुक़सान में हैं।
  2. दुनियावी आराम की हक़ीक़त: मुनाफ़िक़ों ने दुनिया के आराम और गर्मी से बचने को अपनी कामयाबी समझा, लेकिन अल्लाह ने बताया कि असली आराम और सकून अल्लाह की राह में कुर्बानी देने में है, न कि दुनिया के सुखों में।
  3. बुरी सोहबत का ख़तरा: मुनाफ़िक़ों ने दूसरों को भी जिहाद से रोकने की कोशिश की। यह सबक़ देता है कि हमें बुरे लोगों की बातों से बचना चाहिए और अच्छे लोगों की सोहबत इख्तियार करनी चाहिए।
  4. अल्लाह की याद और आख़िरत का ख़ौफ़: अगर इंसान को आख़िरत और जहन्नम के अज़ाब का सही एहसास हो, तो वह दुनिया की छोटी-मोटी तकलीफ़ों से कभी नहीं घबराएगा। जो लोग अल्लाह और आख़िरत पर सच्चा ईमान रखते हैं, वे दुनिया की हर मुश्किल को अल्लाह की राह में आसानी से बर्दाश्त कर लेते हैं।
  5. ईमान की कसौटी: यह आयत बताती है कि मुश्किल हालात में इंसान का असली चेहरा सामने आता है। जो सच्चे मुसलमान हैं, वे हर हाल में अल्लाह के दीन की मदद करते हैं, और जिनके दिलों में बीमारी है, वे बहाने बनाकर पीछे हट जाते हैं।
🎧 सुनें

📜 आयत 79-83 — अत-तौबा

79الَّذِينَ يَلْمِزُونَ الْمُطَّوِّعِينَ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ فِي الصَّدَقَاتِ وَالَّذِينَ لَا يَجِدُونَ إِلَّا جُهْدَهُمْ فَيَسْخَرُونَ مِنْهُمْ ۙ سَخِرَ اللَّهُ مِنْهُمْ وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ
जो लोग दिल खोलकर ख़ैरात करने वाले मोमिनीन पर (रियाकारी का) और उन मोमिनीन पर जो सिर्फ अपनी शफ़क़क़्त (मेहनत) की मज़दूरी पाते (शेख़ी का) इल्ज़ाम लगाते हैं फिर उनसे मसख़रापन करते तो ख़ुदा भी उन से मसख़रापन करेगा और उनके लिए दर्दनाक अज़ाब है
80اسْتَغْفِرْ لَهُمْ أَوْ لَا تَسْتَغْفِرْ لَهُمْ إِن تَسْتَغْفِرْ لَهُمْ سَبْعِينَ مَرَّةً فَلَن يَغْفِرَ اللَّهُ لَهُمْ ۚ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ كَفَرُوا بِاللَّهِ وَرَسُولِهِ ۗ وَاللَّهُ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الْفَاسِقِينَ
(ऐ रसूल) ख्वाह तुम उन (मुनाफिक़ों) के लिए मग़फिरत की दुआ मॉगों या उनके लिए मग़फिरत की दुआ न मॉगों (उनके लिए बराबर है) तुम उनके लिए सत्तर बार भी बख्शिस की दुआ मांगोगे तो भी ख़ुदा उनको हरगिज़ न बख्शेगा ये (सज़ा) इस सबब से है कि उन लोगों ने ख़ुदा और उसके रसूल के साथ कुफ्र किया और ख़ुदा बदकार लोगों को मंज़िलें मकसूद तक नहीं पहुँचाया करता
81فَرِحَ الْمُخَلَّفُونَ بِمَقْعَدِهِمْ خِلَافَ رَسُولِ اللَّهِ وَكَرِهُوا أَن يُجَاهِدُوا بِأَمْوَالِهِمْ وَأَنفُسِهِمْ فِي سَبِيلِ اللَّهِ وَقَالُوا لَا تَنفِرُوا فِي الْحَرِّ ۗ قُلْ نَارُ جَهَنَّمَ أَشَدُّ حَرًّا ۚ لَّوْ كَانُوا يَفْقَهُونَ
(जंगे तबूक़ में) रसूले ख़ुदा के पीछे रह जाने वाले अपनी जगह बैठ रहने (और जिहाद में न जाने) से ख़ुश हुए और अपने माल और आपनी जानों से ख़ुदा की राह में जिहाद करना उनको मकरू मालूम हुआ और कहने लगे (इस) गर्मी में (घर से) न निकलो (ऐ रसूल) तुम कह दो कि जहन्नुम की आग (जिसमें तुम चलोगे उससे कहीं ज्यादा गर्म है
82فَلْيَضْحَكُوا قَلِيلًا وَلْيَبْكُوا كَثِيرًا جَزَاءً بِمَا كَانُوا يَكْسِبُونَ
अगर वह कुछ समझें जो कुछ वह किया करते थे उसके बदले उन्हें चाहिए कि वह बहुत कम हॅसें और बहुत रोएँ
83فَإِن رَّجَعَكَ اللَّهُ إِلَىٰ طَائِفَةٍ مِّنْهُمْ فَاسْتَأْذَنُوكَ لِلْخُرُوجِ فَقُل لَّن تَخْرُجُوا مَعِيَ أَبَدًا وَلَن تُقَاتِلُوا مَعِيَ عَدُوًّا ۖ إِنَّكُمْ رَضِيتُم بِالْقُعُودِ أَوَّلَ مَرَّةٍ فَاقْعُدُوا مَعَ الْخَالِفِينَ
तो (ऐ रसूल) अगर ख़ुदा तुम इन मुनाफेक़ीन के किसी गिरोह की तरफ (जिहाद से सहीसालिम) वापस लाए फिर तुमसे (जिहाद के वास्ते) निकलने की इजाज़त माँगें तो तुम साफ़ कह दो कि तुम मेरे साथ (जिहाद के वास्ते) हरगिज़ न निकलने पाओगे और न हरगिज़ दुश्मन से मेरे साथ लड़ने पाओगे जब तुमने पहली मरतबा (घर में) बैठे रहना पसन्द किया तो (अब भी) पीछे रह जाने वालों के साथ (घर में) बैठे रहो
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अनुवाद — अत-तौबा 81

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Tuesday, August 18, 2026

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