अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
- فَرِحَ: खुश हुआ, आनन्दित हुआ
- الْمُخَلَّفُونَ: वे लोग जो पीछे छोड़ दिए गए (यानी जिहाद से बचकर बैठने वाले मुनाफ़िक़ीन)
- بِمَقْعَدِهِمْ: अपने बैठे रहने पर
- خِلَافَ رَسُولِ اللَّهِ: रसूलुल्लाह ﷺ की مخالفت करके
- كَرِهُوا: उन्होंने नापसन्द किया
- لَا تَنفِرُوا: तुम निकलो मत (जिहाद के लिए)
- الْحَرِّ: गर्मी
- يَفْقَهُونَ: समझते, जानते
तफ़सीर:
यह आयत उन मुनाफ़िक़ों (दिखावटी मुसलमानों) के हाल का वर्णन करती है जो ग़ज़वा-ए-तबूक के समय रसूलुल्लाह ﷺ के साथ जिहाद के लिए नहीं निकले। यह ग़ज़वा अत्यधिक गर्मी के मौसम में हुई थी, और इसमें सफ़र भी बहुत लंबा और कठिन था।
इन मुनाफ़िक़ों ने रसूलुल्लाह ﷺ की खुली مخالفت करते हुए मदीना में बैठे रहने को अपनी ख़ुशी और कामयाबी समझा। उन्हें अपने इस काम पर बहुत फ़ख़्र था कि उन्होंने जिहाद से बचकर अपनी जान और माल को सुरक्षित रख लिया। उन्होंने अपने माल और जान के साथ अल्लाह के रास्ते में जिहाद करना नापसन्द किया, क्योंकि उनके दिलों में अल्लाह पर ईमान और उसके इनाम की उम्मीद नहीं थी।
इतना ही नहीं, बल्कि उन्होंने दूसरे कमज़ोर ईमान वाले लोगों को भी गुमराह करने की कोशिश की और कहा: "गर्मी में मत निकलो!" वे चाहते थे कि और लोग भी उनकी तरह जिहाद से पीछे रह जाएँ।
इस पर अल्लाह तआला ने रसूलुल्लाह ﷺ को हुक्म दिया कि उनसे कहें: "जहन्नम की आग इस गर्मी से कहीं ज़्यादा सख़्त है!" यानी जिस गर्मी से तुम डरकर जिहाद से भागे हो, उससे कहीं बढ़कर गर्मी जहन्नम में है, जो तुम्हारे इस कुकर्म की सज़ा में तुम्हारा इंतज़ार कर रही है। अगर वे यह बात समझते और जानते होते, तो कभी भी जिहाद से पीछे नहीं रहते।
फ़ायदे और सबक़:
- जिहाद की अहमियत: यह आयत सिखाती है कि अल्लाह के रास्ते में जिहाद (अपने माल और जान से) एक बहुत बड़ी नेमत और इबादत है। जो लोग इसे छोड़ते हैं, वह अल्लाह की नज़र में बड़े नुक़सान में हैं।
- दुनियावी आराम की हक़ीक़त: मुनाफ़िक़ों ने दुनिया के आराम और गर्मी से बचने को अपनी कामयाबी समझा, लेकिन अल्लाह ने बताया कि असली आराम और सकून अल्लाह की राह में कुर्बानी देने में है, न कि दुनिया के सुखों में।
- बुरी सोहबत का ख़तरा: मुनाफ़िक़ों ने दूसरों को भी जिहाद से रोकने की कोशिश की। यह सबक़ देता है कि हमें बुरे लोगों की बातों से बचना चाहिए और अच्छे लोगों की सोहबत इख्तियार करनी चाहिए।
- अल्लाह की याद और आख़िरत का ख़ौफ़: अगर इंसान को आख़िरत और जहन्नम के अज़ाब का सही एहसास हो, तो वह दुनिया की छोटी-मोटी तकलीफ़ों से कभी नहीं घबराएगा। जो लोग अल्लाह और आख़िरत पर सच्चा ईमान रखते हैं, वे दुनिया की हर मुश्किल को अल्लाह की राह में आसानी से बर्दाश्त कर लेते हैं।
- ईमान की कसौटी: यह आयत बताती है कि मुश्किल हालात में इंसान का असली चेहरा सामने आता है। जो सच्चे मुसलमान हैं, वे हर हाल में अल्लाह के दीन की मदद करते हैं, और जिनके दिलों में बीमारी है, वे बहाने बनाकर पीछे हट जाते हैं।
📜 आयत 79-83 — अत-तौबा
अनुवाद — अत-तौबा 81
सूरा अत-तौबा आयत 81 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : (जंगे तबूक़ में) रसूले ख़ुदा के पीछे रह जाने वाले…सूरा आयत 81/129 — अत-तौबा التوبة (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अत-तौबा सुनें, अत-तौबा अनुवाद, अत-तौबा mp3, अत-तौबा pdf. आयत 79–83. हिंदी अर्थ: اردو.
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Tuesday, August 18, 2026
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