अत-तौबा · 97/129
अनुवाद उच्चारण — अत-तौबा
الْأَعْرَابُ أَشَدُّ كُفْرًا وَنِفَاقًا وَأَجْدَرُ أَلَّا يَعْلَمُوا حُدُودَ مَا أَنزَلَ اللَّهُ عَلَىٰ رَسُولِهِ ۗ وَاللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ ۝٩٧
Al A`raabu ashaddu kufranw wa nifaaqanw wa ajdaru allaa ya`lamoo hudooda maaa anzalal laahu `alaa Rasoolih; wallaahu `Aleemun Hakeem
📖 हिंदी अर्थ
(ये) अरब के गॅवार देहाती कुफ्र व निफाक़ में बड़े सख्त हैं और इसी क़ाबिल हैं कि जो किताब ख़ुदा ने अपने रसूल पर नाज़िल फरमाई है उसके एहक़ाम न जानें और ख़ुदा तो बड़ा दाना हकीम है
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • الأَعْرَابُ: बद्दू (ग्रामीण/जंगल में रहने वाले अरब)।
  • أَشَدُّ كُفْرًا وَنِفَاقًا: कुफ्र (अविश्वास) और निफ़ाक़ (पाखंड) में अत्यधिक सख्त/कठोर।
  • وَأَجْدَرُ: अधिक योग्य/अधिक हक़दार।
  • حُدُودَ مَا أَنزَلَ اللَّهُ: अल्लाह द्वारा उतारी गई (शरीयत की) सीमाओं/हदों को।
  • عَلِيمٌ حَكِيمٌ: सब कुछ जानने वाला, पूर्ण तत्वदर्शी/हिकमत वाला।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत बद्दू (ग्रामीण/जंगली अरब) के लोगों की विशेषता बयान करती है। अल्लाह तआला फ़रमाता है कि ये बद्दू लोग शहरों में रहने वालों की तुलना में कुफ्र और निफ़ाक़ (पाखंड) में कहीं अधिक सख्त और गहरे होते हैं। इसका कारण यह है कि वे जंगलों और दूर-दराज़ के इलाकों में रहते हैं, जहाँ उनका मेल-जोल कम होता है, उनके दिल कठोर हो जाते हैं, और वे ऐसे वातावरण में पलते-बढ़ते हैं जहाँ न तो उन्हें सीधे तौर पर कुरआन सुनने का मौक़ा मिलता है, न ही अल्लाह के रसूल (ﷺ) की सुन्नत और शरीयत की शिक्षाओं से वाक़िफ़ हो पाते हैं। इसीलिए वे अल्लाह द्वारा अपने रसूल पर उतारी गई हदों (सीमाओं, फ़राइज़, सुन्नतों और अहकाम) को जानने से सबसे अधिक दूर रहते हैं। उनकी यह जिहालत (अज्ञानता) उन्हें कुफ्र और निफ़ाक़ में और गहरा कर देती है।

अल्लाह तआला उनके इस हाल से पूरी तरह वाक़िफ़ है, और वह अपनी हिकमत (तत्वदर्शिता) के अनुसार हर एक को उसके कर्मों का बदला देने वाला है। यह आयत उन लोगों के लिए एक गंभीर चेतावनी है जो इल्म (ज्ञान) और अमल (अच्छे कर्मों) से दूर रहते हैं, क्योंकि ज्ञान और अच्छी संगत से दूरी इंसान को गुमराही की तरफ ले जाती है।


फ़ायदे (उपदेश):

  1. इल्म (ज्ञान) की अहमियत: यह आयत सिखाती है कि इल्म और अच्छी संगत इंसान के दिल को नरम करती है और उसे सही रास्ते पर चलाती है। जो लोग इल्म से दूर रहते हैं, उनके दिल कठोर हो जाते हैं और वे गुमराही का शिकार हो जाते हैं।
  2. अच्छी संगत का असर: शहरों में रहने वाले लोग, जो उलमा (विद्वानों) और नेक लोगों की संगत में रहते हैं, उनके दिल नरम होते हैं और वे दीन को बेहतर समझ पाते हैं। इससे हमें सीख मिलती है कि हमें नेक और इल्म वाले लोगों की संगत इख्तियार करनी चाहिए।
  3. अल्लाह की हिकमत पर भरोसा: अल्लाह तआला हर चीज़ से बाख़बर है और वह अपनी हिकमत से हर इंसान के साथ वैसा ही व्यवहार करता है जैसा वह हक़दार है। इससे हमें यह सबक मिलता है कि हमें अल्लाह के फ़ैसलों पर भरोसा रखना चाहिए और उसकी रहमत की उम्मीद रखते हुए उसके अज़ाब से डरना चाहिए।
  4. दीन को समझने की कोशिश: यह आयत हमें तरग़ीब (प्रोत्साहन) देती है कि हम कुरआन और सुन्नत को सीखें और समझें, ताकि हम अल्लाह की हदों (सीमाओं) से वाक़िफ़ हो सकें और उन पर अमल कर सकें। जो इंसान दीन को समझता है, वह कुफ्र और निफ़ाक़ से महफ़ूज़ रहता है।
🎧 सुनें

📜 आयत 95-99 — अत-तौबा

95سَيَحْلِفُونَ بِاللَّهِ لَكُمْ إِذَا انقَلَبْتُمْ إِلَيْهِمْ لِتُعْرِضُوا عَنْهُمْ ۖ فَأَعْرِضُوا عَنْهُمْ ۖ إِنَّهُمْ رِجْسٌ ۖ وَمَأْوَاهُمْ جَهَنَّمُ جَزَاءً بِمَا كَانُوا يَكْسِبُونَ
जब तुम उनके पास (जिहाद से) वापस आओगे तो तुम्हारे सामने ख़ुदा की क़समें खाएगें ताकि तुम उनसे दरगुज़र करो तो तुम उनकी तरफ से मुँह फेर लो बेशक ये लोग नापाक हैं और उनका ठिकाना जहन्नुम है (ये) सज़ा है उसकी जो ये (दुनिया में) किया करते थे
96يَحْلِفُونَ لَكُمْ لِتَرْضَوْا عَنْهُمْ ۖ فَإِن تَرْضَوْا عَنْهُمْ فَإِنَّ اللَّهَ لَا يَرْضَىٰ عَنِ الْقَوْمِ الْفَاسِقِينَ
तुम्हारे सामने ये लोग क़समें खाते हैं ताकि तुम उनसे राज़ी हो (भी) जाओ तो ख़ुदा बदकार लोगों से हरगिज़ कभी राज़ी नहीं होगा
97الْأَعْرَابُ أَشَدُّ كُفْرًا وَنِفَاقًا وَأَجْدَرُ أَلَّا يَعْلَمُوا حُدُودَ مَا أَنزَلَ اللَّهُ عَلَىٰ رَسُولِهِ ۗ وَاللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ
(ये) अरब के गॅवार देहाती कुफ्र व निफाक़ में बड़े सख्त हैं और इसी क़ाबिल हैं कि जो किताब ख़ुदा ने अपने रसूल पर नाज़िल फरमाई है उसके एहक़ाम न जानें और ख़ुदा तो बड़ा दाना हकीम है
98وَمِنَ الْأَعْرَابِ مَن يَتَّخِذُ مَا يُنفِقُ مَغْرَمًا وَيَتَرَبَّصُ بِكُمُ الدَّوَائِرَ ۚ عَلَيْهِمْ دَائِرَةُ السَّوْءِ ۗ وَاللَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمٌ
और कुछ गॅवार देहाती (ऐसे भी हैं कि जो कुछ ख़ुदा की) राह में खर्च करते हैं उसे तावान (जुर्माना) समझते हैं और तुम्हारे हक़ में (ज़माने की) गर्दिशों के मुन्तज़िर (इन्तेज़ार में) हैं उन्हीं पर (ज़माने की) बुरी गर्दिश पड़े और ख़ुदा तो सब कुछ सुनता जानता है
99وَمِنَ الْأَعْرَابِ مَن يُؤْمِنُ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ وَيَتَّخِذُ مَا يُنفِقُ قُرُبَاتٍ عِندَ اللَّهِ وَصَلَوَاتِ الرَّسُولِ ۚ أَلَا إِنَّهَا قُرْبَةٌ لَّهُمْ ۚ سَيُدْخِلُهُمُ اللَّهُ فِي رَحْمَتِهِ ۗ إِنَّ اللَّهَ غَفُورٌ رَّحِيمٌ
और कुछ देहाती तो ऐसे भी हैं जो ख़ुदा और आख़िरत पर ईमान रखते हैं और जो कुछ खर्च करते है उसे ख़ुदा की (बारगाह में) नज़दीकी और रसूल की दुआओं का ज़रिया समझते हैं आगाह रहो वाक़ई ये (ख़ैरात) ज़रूर उनके तक़र्रुब (क़रीब होने का) का बाइस है ख़ुदा उन्हें बहुत जल्द अपनी रहमत में दाख़िल करेगा बेशक ख़ुदा बड़ा बख़्शने वाला मेहरबान है
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अनुवाद — अत-तौबा 97

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Tuesday, August 18, 2026

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