अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- الأَعْرَابُ: बद्दू (ग्रामीण/जंगल में रहने वाले अरब)।
- أَشَدُّ كُفْرًا وَنِفَاقًا: कुफ्र (अविश्वास) और निफ़ाक़ (पाखंड) में अत्यधिक सख्त/कठोर।
- وَأَجْدَرُ: अधिक योग्य/अधिक हक़दार।
- حُدُودَ مَا أَنزَلَ اللَّهُ: अल्लाह द्वारा उतारी गई (शरीयत की) सीमाओं/हदों को।
- عَلِيمٌ حَكِيمٌ: सब कुछ जानने वाला, पूर्ण तत्वदर्शी/हिकमत वाला।
तफ़सीर (व्याख्या):
यह आयत बद्दू (ग्रामीण/जंगली अरब) के लोगों की विशेषता बयान करती है। अल्लाह तआला फ़रमाता है कि ये बद्दू लोग शहरों में रहने वालों की तुलना में कुफ्र और निफ़ाक़ (पाखंड) में कहीं अधिक सख्त और गहरे होते हैं। इसका कारण यह है कि वे जंगलों और दूर-दराज़ के इलाकों में रहते हैं, जहाँ उनका मेल-जोल कम होता है, उनके दिल कठोर हो जाते हैं, और वे ऐसे वातावरण में पलते-बढ़ते हैं जहाँ न तो उन्हें सीधे तौर पर कुरआन सुनने का मौक़ा मिलता है, न ही अल्लाह के रसूल (ﷺ) की सुन्नत और शरीयत की शिक्षाओं से वाक़िफ़ हो पाते हैं। इसीलिए वे अल्लाह द्वारा अपने रसूल पर उतारी गई हदों (सीमाओं, फ़राइज़, सुन्नतों और अहकाम) को जानने से सबसे अधिक दूर रहते हैं। उनकी यह जिहालत (अज्ञानता) उन्हें कुफ्र और निफ़ाक़ में और गहरा कर देती है।
अल्लाह तआला उनके इस हाल से पूरी तरह वाक़िफ़ है, और वह अपनी हिकमत (तत्वदर्शिता) के अनुसार हर एक को उसके कर्मों का बदला देने वाला है। यह आयत उन लोगों के लिए एक गंभीर चेतावनी है जो इल्म (ज्ञान) और अमल (अच्छे कर्मों) से दूर रहते हैं, क्योंकि ज्ञान और अच्छी संगत से दूरी इंसान को गुमराही की तरफ ले जाती है।
फ़ायदे (उपदेश):
- इल्म (ज्ञान) की अहमियत: यह आयत सिखाती है कि इल्म और अच्छी संगत इंसान के दिल को नरम करती है और उसे सही रास्ते पर चलाती है। जो लोग इल्म से दूर रहते हैं, उनके दिल कठोर हो जाते हैं और वे गुमराही का शिकार हो जाते हैं।
- अच्छी संगत का असर: शहरों में रहने वाले लोग, जो उलमा (विद्वानों) और नेक लोगों की संगत में रहते हैं, उनके दिल नरम होते हैं और वे दीन को बेहतर समझ पाते हैं। इससे हमें सीख मिलती है कि हमें नेक और इल्म वाले लोगों की संगत इख्तियार करनी चाहिए।
- अल्लाह की हिकमत पर भरोसा: अल्लाह तआला हर चीज़ से बाख़बर है और वह अपनी हिकमत से हर इंसान के साथ वैसा ही व्यवहार करता है जैसा वह हक़दार है। इससे हमें यह सबक मिलता है कि हमें अल्लाह के फ़ैसलों पर भरोसा रखना चाहिए और उसकी रहमत की उम्मीद रखते हुए उसके अज़ाब से डरना चाहिए।
- दीन को समझने की कोशिश: यह आयत हमें तरग़ीब (प्रोत्साहन) देती है कि हम कुरआन और सुन्नत को सीखें और समझें, ताकि हम अल्लाह की हदों (सीमाओं) से वाक़िफ़ हो सकें और उन पर अमल कर सकें। जो इंसान दीन को समझता है, वह कुफ्र और निफ़ाक़ से महफ़ूज़ रहता है।
📜 आयत 95-99 — अत-तौबा
अनुवाद — अत-तौबा 97
सूरा अत-तौबा आयत 97 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : (ये) अरब के गॅवार देहाती कुफ्र व निफाक़ में बड़े…सूरा आयत 97/129 — अत-तौबा التوبة (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अत-तौबा सुनें, अत-तौबा अनुवाद, अत-तौबा mp3, अत-तौबा pdf. आयत 95–99. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Tuesday, August 18, 2026
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