अन-नहल · 45/128
अनुवाद उच्चारण — अन-नहल
أَفَأَمِنَ الَّذِينَ مَكَرُوا السَّيِّئَاتِ أَن يَخْسِفَ اللَّهُ بِهِمُ الْأَرْضَ أَوْ يَأْتِيَهُمُ الْعَذَابُ مِنْ حَيْثُ لَا يَشْعُرُونَ ۝٤٥
Afa aminal lazeena makarus saiyi aati ai yakhsifal laahu bihimul arda aw yaaa tiyahumul `azaabu min haisu laa yash`uroon
📖 हिंदी अर्थ
तो क्या जो लोग बड़ी बड़ी मक्कारियाँ (शिर्क वग़ैरह) करते थे (उनको इस बात का इत्मिनान हो गया है (और मुत्तलिक़ ख़ौफ नहीं) कि ख़ुदा उन्हें ज़मीन में धसा दे या ऐसी तरफ से उन पर अज़ाब आ पहुँचे कि उसकी उनको ख़बर भी न हो
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • مَكَرُوا السَّيِّئَاتِ: बुरी चालें चलने वाले, बुरे कामों की योजना बनाने वाले।
  • يَخْسِفَ: धरती में धँसा देना (जैसे क़ारून को धँसाया गया)।
  • مِنْ حَيْثُ لَا يَشْعُرُونَ: ऐसी जगह से जहाँ से उन्हें इसका एहसास भी न हो, न अंदाज़ा हो।

तफ़्सीर (व्याख्या):

क्या वे लोग जिन्होंने बुरी चालें चलीं और बुरे कामों की योजनाएँ बनाईं — जैसे मक्का के काफिरों ने रसूल ﷺ के ख़िलाफ़ साज़िशें कीं — क्या वे इस बात से निडर हो गए हैं कि अल्लाह उन्हें धरती में धँसा दे, जैसे उसने क़ारून को धँसाया था? या उन पर अज़ाब ऐसी जगह से आ पड़े जिसका उन्हें ज़रा भी अंदाज़ा न हो और न वे उसे महसूस कर सकें? यानी अल्लाह की पकड़ कभी भी और किसी भी तरह से आ सकती है — चाहे वे अपने घरों में हों, सफर में हों, या अपने कामों में मशगूल हों। अल्लाह उन्हें कभी आगे निकलने नहीं देगा और न वे उसकी पकड़ से बच सकते हैं। वह क़ादिर है, उसकी ताक़त से कोई चीज़ बाहर नहीं है। यह भी हो सकता है कि अल्लाह उन्हें माल, जान और फलों की कमी के ज़रिए अज़ाब दे, या उन्हें डर की हालत में पकड़ ले। मगर अल्लाह अपने बंदों पर बड़ा मेहरबान और रहम करने वाला है — वह जल्दी सज़ा नहीं देता, बल्कि उन्हें मौका देता है ताकि वे तौबा कर लें।


फ़ायदे (सबक):

  1. अल्लाह की पकड़ बहुत सख्त है, और वह बुरी चालें चलने वालों को कभी बे-सज़ा नहीं छोड़ता — चाहे उन्हें कितनी भी देर लग जाए।
  2. इंसान को कभी भी अपनी ताक़त, चालाकी या योजनाओं पर घमंड नहीं करना चाहिए, क्योंकि अल्लाह की ताक़त सबसे बढ़कर है।
  3. अल्लाह की रहमत और मेहरबानी का तकाज़ा है कि वह सज़ा में जल्दी नहीं करता — यह उसकी बंदों पर शफ़्क़त है। इसलिए हमें भी अपने जीवन में रहम और नर्मी अपनानी चाहिए।
  4. यह आयत मुसलमानों को तसल्ली देती है कि ज़ालिमों की साज़िशें कामयाब नहीं होंगी, और सच्चाई की मदद अल्लाह करता है।
  5. इंसान को चाहिए कि वह अल्लाह के अज़ाब से डरे और अपने कर्मों को सुधारे, क्योंकि अज़ाब अचानक और अनजानी जगह से आ सकता है।
🎧 सुनें

📜 आयत 43-47 — अन-नहल

43وَمَا أَرْسَلْنَا مِن قَبْلِكَ إِلَّا رِجَالًا نُّوحِي إِلَيْهِمْ ۚ فَاسْأَلُوا أَهْلَ الذِّكْرِ إِن كُنتُمْ لَا تَعْلَمُونَ
और (ऐ रसूल) तुम से पहले आदमियों ही को पैग़म्बर बना बनाकर भेजा किए जिन की तरफ हम वहीं भेजते थे तो (तुम अहले मक्का से कहो कि) अगर तुम खुद नहीं जानते हो तो अहले ज़िक्र (आलिमों से) पूछो (और उन पैग़म्बरों को भेजा भी तो) रौशन दलीलों और किताबों के साथ
44بِالْبَيِّنَاتِ وَالزُّبُرِ ۗ وَأَنزَلْنَا إِلَيْكَ الذِّكْرَ لِتُبَيِّنَ لِلنَّاسِ مَا نُزِّلَ إِلَيْهِمْ وَلَعَلَّهُمْ يَتَفَكَّرُونَ
और तुम्हारे पास क़ुरान नाज़िल किया है ताकि जो एहकाम लोगों के लिए नाज़िल किए गए है तुम उनसे साफ साफ बयान कर दो ताकि वह लोग खुद से कुछ ग़ौर फिक्र करें
45أَفَأَمِنَ الَّذِينَ مَكَرُوا السَّيِّئَاتِ أَن يَخْسِفَ اللَّهُ بِهِمُ الْأَرْضَ أَوْ يَأْتِيَهُمُ الْعَذَابُ مِنْ حَيْثُ لَا يَشْعُرُونَ
तो क्या जो लोग बड़ी बड़ी मक्कारियाँ (शिर्क वग़ैरह) करते थे (उनको इस बात का इत्मिनान हो गया है (और मुत्तलिक़ ख़ौफ नहीं) कि ख़ुदा उन्हें ज़मीन में धसा दे या ऐसी तरफ से उन पर अज़ाब आ पहुँचे कि उसकी उनको ख़बर भी न हो
46أَوْ يَأْخُذَهُمْ فِي تَقَلُّبِهِمْ فَمَا هُم بِمُعْجِزِينَ
उनके चलते फिरते (ख़ुदा का अज़ाब) उन्हें गिरफ्तार करे तो वह लोग उसे ज़ेर नहीं कर सकते
47أَوْ يَأْخُذَهُمْ عَلَىٰ تَخَوُّفٍ فَإِنَّ رَبَّكُمْ لَرَءُوفٌ رَّحِيمٌ
या वह अज़ाब से डरते हो तो (उसी हालत में) धर पकड़ करे इसमें तो शक नहीं कि तुम्हारा परवरदिगार बड़ा शफीक़ रहम वाला है
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अनुवाद — अन-नहल 45

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Tuesday, August 18, 2026

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