Wa min haisu kharajta fawalli wajhaka shatral Masjidil Haraami wa innahoo lalhaqqu mir Rabbik; wa mallaahu bighaafilin `ammaa ta`maloon
📖 अनुवाद (हिंदी अर्थ)
📖 हिंदी अर्थ
और (ऐ रसूल) तुम जहाँ से जाओ (यहाँ तक मक्का से) तो भी नमाज़ मे तुम अपना मुँह मस्ज़िदे मोहतरम (काबा) की तरफ़ कर लिया करो और बेशक ये नया क़िबला तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से हक़ है
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اور تم جہاں سے نکلو، (نماز میں) اپنا منہ مسجد محترم کی طرف کر لیا کرو بےشک وہ تمہارے پروردگار کی طرف سے حق ہے۔ اور تم لوگ جو کچھ کرتے ہو۔ خدا اس سے بے خبر نہیں
और (ऐ रसूल) तुम जहाँ से जाओ (यहाँ तक मक्का से) तो भी नमाज़ मे तुम अपना मुँह मस्ज़िदे मोहतरम (काबा) की तरफ़ कर लिया करो और बेशक ये नया क़िबला तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से हक़ है
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
شَطْرَ: की ओर, दिशा में।
الْمَسْجِدِ الْحَرَامِ: पवित्र मस्जिद (काबा)।
لَلْحَقُّ: निस्संदेह सत्य।
بِغَافِلٍ: बेखबर, अनदेखा करने वाला।
व्याख्या:
हे नबी! आप जहाँ से भी निकलें—चाहे यात्रा में हों या किसी अन्य स्थान पर—और नमाज़ अदा करने का इरादा करें, तो अपना चेहरा मस्जिद-ए-हराम (काबा) की ओर कर लें। यही आदेश आपके रब की ओर से सत्य है, जो आप पर उतारा गया है। यह कोई मनमाना नियम नहीं, बल्कि ईश्वरीय आदेश है जो सत्य पर आधारित है। अल्लाह तआला उन सब कर्मों से पूर्णतः अवगत है जो तुम लोग करते हो—न तो उसकी नज़र से कोई बात छिपी है और न ही वह तुम्हारे अमल से बेखबर है। वह तुम्हारे हर अच्छे या बुरे काम का हिसाब रखेगा और उसका पूरा बदला देगा। यह आदेश केवल नबी ﷺ के लिए नहीं, बल्कि उनके अनुयायियों के लिए भी है—हर वह व्यक्ति जो नमाज़ पढ़े, उसे क़िबला (काबा) की ओर मुँह करना अनिवार्य है, चाहे वह कहीं भी हो।
शिक्षाएँ और लाभ:
इस आयत से हमें यह सीख मिलती है कि अल्लाह की इबादत में एकता और अनुशासन होना चाहिए। सभी मुसलमान दुनिया के किसी भी कोने में हों, एक ही दिशा (काबा) की ओर मुँह करके नमाज़ पढ़ते हैं, जो उनकी एकता और भाईचारे की प्रतीक है।
यह आयत हमें बताती है कि अल्लाह हर समय हमारे साथ है और हमारे हर कर्म को देख रहा है। यह विश्वास इंसान को अच्छे काम करने की प्रेरणा देता है और बुरे कामों से रोकता है, क्योंकि हम जानते हैं कि हमारा रब सब कुछ देख रहा है।
इस्लाम में नमाज़ की अहमियत और उसके नियमों का पालन करना कितना आवश्यक है, यह इस आयत से स्पष्ट होता है। यह हमें सिखाता है कि धर्म के मामलों में अपनी मर्ज़ी नहीं चलानी चाहिए, बल्कि अल्लाह और उसके रसूल के आदेशों का पालन करना चाहिए।
यह आयत मुसलमानों को आश्वस्त करती है कि उनकी इबादत और अच्छे कर्म अल्लाह से छिपे नहीं हैं। चाहे लोग उनकी परवाह करें या न करें, अल्लाह उनके कर्मों का सही मूल्यांकन करेगा और उन्हें उचित प्रतिफल देगा।
और हर फरीक़ के वास्ते एक सिम्त है उसी की तरफ वह नमाज़ में अपना मुँह कर लेता है पस तुम ऐ मुसलमानों झगड़े को छोड़ दो और नेकियों मे उन से लपक के आगे बढ़ जाओ तुम जहाँ कहीं होगे ख़ुदा तुम सबको अपनी तरफ ले आऐगा बेशक ख़ुदा हर चीज़ पर क़ादिर है
और (ऐ रसूल) तुम जहाँ से जाओ (यहाँ तक मक्का से) तो भी नमाज़ मे तुम अपना मुँह मस्ज़िदे मोहतरम (काबा) की तरफ़ कर लिया करो और बेशक ये नया क़िबला तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से हक़ है
और तुम्हारे कामों से ख़ुदा ग़ाफिल नही है और (ऐ रसूल) तुम जहाँ से जाओ (यहाँ तक के मक्का से तो भी) तुम (नमाज़ में) अपना मुँह मस्ज़िदे हराम की तरफ कर लिया करो और (ऐ रसूल) तुम जहाँ कही हुआ करो तो नमाज़ में अपना मुँह उसी काबा की तरफ़ कर लिया करो (बार बार हुक्म देने का एक फायदा ये है ताकि लोगों का इल्ज़ाम तुम पर न आने पाए मगर उन में से जो लोग नाहक़ हठधर्मी करते हैं वह तो ज़रुर इल्ज़ाम देगें) तो तुम लोग उनसे डरो नहीं और सिर्फ़ मुझसे डरो और (दूसरा फ़ायदा ये है) ताकि तुम पर अपनी नेअमत पूरी कर दूँ
और तीसरा फायदा ये है ताकि तुम हिदायत पाओ मुसलमानों ये एहसान भी वैसा ही है जैसे हम ने तुम में तुम ही में का एक रसूल भेजा जो तुमको हमारी आयतें पढ़ कर सुनाए और तुम्हारे नफ्स को पाकीज़ा करे और तुम्हें किताब क़ुरान और अक्ल की बातें सिखाए और तुम को वह बातें बतांए जिन की तुम्हें पहले से खबर भी न थी
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