अल-बकरा · 191/286
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-बकरा
وَاقْتُلُوهُمْ حَيْثُ ثَقِفْتُمُوهُمْ وَأَخْرِجُوهُم مِّنْ حَيْثُ أَخْرَجُوكُمْ ۚ وَالْفِتْنَةُ أَشَدُّ مِنَ الْقَتْلِ ۚ وَلَا تُقَاتِلُوهُمْ عِندَ الْمَسْجِدِ الْحَرَامِ حَتَّىٰ يُقَاتِلُوكُمْ فِيهِ ۖ فَإِن قَاتَلُوكُمْ فَاقْتُلُوهُمْ ۗ كَذَٰلِكَ جَزَاءُ الْكَافِرِينَ ۝١٩١
Waqtuloohum haisu saqif tumoohum wa akhrijoohum min haisu akhrajookum; walfitnatu ashaddu minal qatl; wa laa tuqaatiloohum `indal Majidil Haraami hattaa yaqaatilookum feehi fa in qaatalookum faqtuloohum; kazaalika jazaaa`ul kaafireen
📖 हिंदी अर्थ
और तुम उन (मुशरिकों) को जहाँ पाओ मार ही डालो और उन लोगों ने जहाँ (मक्का) से तुम्हें शहर बदर किया है तुम भी उन्हें निकाल बाहर करो और फितना परदाज़ी (शिर्क) खूँरेज़ी से भी बढ़ के है और जब तक वह लोग (कुफ्फ़ार) मस्ज़िद हराम (काबा) के पास तुम से न लडे तुम भी उन से उस जगह न लड़ों पस अगर वह तुम से लड़े तो बेखटके तुम भी उन को क़त्ल करो काफ़िरों की यही सज़ा है

M Mishary Rashid Alafasy ✓
M Mahmoud Khalil Al-Husary ✓
A Abdurrahman As-Sudais ✓
M Mohamed Siddiq Al-Minshawi ✓
A Abdul Basit Abdul Samad ✓
A Ali Al-Hudhaify ✓
A Ahmed ibn Ali al-Ajamy ✓
A Abu Bakr Ash-Shaatree ✓
M Muhammad Ayyoub ✓
A Abdullah Basfar ✓
A Abdullah Al-Juhani ✓
M Maher Al Muaiqly ✓
0:00
0:00
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • ثَقِفْتُمُوهُمْ: जहाँ कहीं भी उन्हें पाओ, उन पर क़ाबू पाओ।
  • الْفِتْنَةُ: यहाँ इससे मुराद कुफ़्र, शिर्क और अल्लाह के दीन से रोकना है।
  • أَشَدُّ مِنَ الْقَتْلِ: यानी फ़ित्ना (कुफ़्र और शिर्क) क़त्ल से भी बढ़कर सख़्त और बुरा है।

तफ़सीर:

अल्लाह तआला इस आयत में मुसलमानों को हिदायत देता है कि जो मुशरिकीन तुमसे जंग करते हैं और तुम्हारे दीन को मिटाने की कोशिश करते हैं, उनसे जिहाद करो और उन्हें जहाँ कहीं भी पाओ, उनका मुक़ाबला करो और उन्हें मारो। और उन्हें उस जगह से निकालो, जहाँ से उन्होंने तुम्हें निकाला था — यानी मक्का मुकर्रमा से — क्योंकि उन्होंने ही पहले मुसलमानों को उनके घरों और वतन से बेदख़ल किया था।

फिर अल्लाह फ़रमाता है: "और फ़ित्ना क़त्ल से भी ज़्यादा सख़्त है।" यानी मुसलमानों को उनके दीन से भटकाना, उन्हें कुफ़्र की तरफ लौटाना, और अल्लाह की इबादत से रोकना — यह फ़ित्ना उस क़त्ल से कहीं बढ़कर बुरा है जो जंग के मैदान में होता है। क्योंकि क़त्ल सिर्फ़ जिस्म को ख़त्म करता है, लेकिन फ़ित्ना दीन, ईमान और आख़िरत को तबाह कर देता है। इसलिए अगर फ़ित्ने को ख़त्म करने के लिए जंग ज़रूरी हो, तो वह जंग बेहतर है, क्योंकि उससे दीन की हिफ़ाज़त होती है।

फिर अल्लाह तआला फ़रमाता है: "और मस्जिदे-हराम के पास उनसे न लड़ो, जब तक कि वे ख़ुद तुमसे वहाँ न लड़ें।" यानी मुसलमानों को हुक्म दिया गया कि हराम (मक्का) के अंदर और मस्जिदे-हराम के नज़दीक तुम पहल करके जंग शुरू न करो, क्योंकि वह जगह अल्लाह के यहाँ बहुत ही मुअज़्ज़ज़ और मुक़द्दस है। लेकिन अगर दुश्मन ख़ुद वहाँ तुम पर हमला करें और लड़ाई शुरू करें, तो तुम्हें पूरा हक़ है कि उनसे लड़ो और उन्हें मारो। यह उनका बदला है — यानी काफ़िरों की सज़ा यही है कि जब वे हद से बढ़ें और हराम की बे-हुरमती करें, तो उन्हें उनकी शरारत का मुनासिब बदला दिया जाए।


दावती पहलू:

यह आयत हमें सिखाती है कि इस्लाम में जंग सिर्फ़ इंसाफ़ और हक़ के लिए है, न कि ज़ुल्म और ज़्यादती के लिए। अल्लाह तआला ने मुसलमानों को हमेशा इंसाफ़, हिम्मत और हक़ पर साबित क़दम रहने की तालीम दी है। यह भी याद रखना चाहिए कि इस्लाम का असली पैग़ाम अम्न (शांति) और रहमत है, लेकिन जब दुश्मन हद से बढ़ जाएं और दीन को मिटाने की कोशिश करें, तो उनका मुक़ाबला करना भी इंसाफ़ और हक़ का हिस्सा है। हमें चाहिए कि हम अपने दीन की हिफ़ाज़त के लिए हर क़ुर्बानी देने को तैयार रहें, क्योंकि दीन ही हमारी असली ज़िंदगी है — और फ़ित्ने से बचना और दीन पर साबित रहना ही सबसे बड़ी कामयाबी है।



📜 आयत 189-193 — सूरा अल-बकरा

189۞ يَسْأَلُونَكَ عَنِ الْأَهِلَّةِ ۖ قُلْ هِيَ مَوَاقِيتُ لِلنَّاسِ وَالْحَجِّ ۗ وَلَيْسَ الْبِرُّ بِأَن تَأْتُوا الْبُيُوتَ مِن ظُهُورِهَا وَلَٰكِنَّ الْبِرَّ مَنِ اتَّقَىٰ ۗ وَأْتُوا الْبُيُوتَ مِنْ أَبْوَابِهَا ۚ وَاتَّقُوا اللَّهَ لَعَلَّكُمْ تُفْلِحُونَ
(ऐ रसूल) तुम से लोग चाँद के बारे में पूछते हैं (कि क्यो घटता बढ़ता है) तुम कह दो कि उससे लोगों के (दुनयावी) अम्र और हज के अवक़ात मालूम होते है और ये कोई भली बात नही है कि घरो में पिछवाड़े से फाँद के) आओ बल्कि नेकी उसकी है जो परहेज़गारी करे और घरों में आना हो तो) उनके दरवाजों क़ी तरफ से आओ और ख़ुदा से डरते रहो ताकि तुम मुराद को पहुँचो
190وَقَاتِلُوا فِي سَبِيلِ اللَّهِ الَّذِينَ يُقَاتِلُونَكُمْ وَلَا تَعْتَدُوا ۚ إِنَّ اللَّهَ لَا يُحِبُّ الْمُعْتَدِينَ
और जो लोग तुम से लड़े तुम (भी) ख़ुदा की राह में उनसे लड़ो और ज्यादती न करो (क्योंकि) ख़ुदा ज्यादती करने वालों को हरगिज़ दोस्त नहीं रखता
191وَاقْتُلُوهُمْ حَيْثُ ثَقِفْتُمُوهُمْ وَأَخْرِجُوهُم مِّنْ حَيْثُ أَخْرَجُوكُمْ ۚ وَالْفِتْنَةُ أَشَدُّ مِنَ الْقَتْلِ ۚ وَلَا تُقَاتِلُوهُمْ عِندَ الْمَسْجِدِ الْحَرَامِ حَتَّىٰ يُقَاتِلُوكُمْ فِيهِ ۖ فَإِن قَاتَلُوكُمْ فَاقْتُلُوهُمْ ۗ كَذَٰلِكَ جَزَاءُ الْكَافِرِينَ
और तुम उन (मुशरिकों) को जहाँ पाओ मार ही डालो और उन लोगों ने जहाँ (मक्का) से तुम्हें शहर बदर किया है तुम भी उन्हें निकाल बाहर करो और फितना परदाज़ी (शिर्क) खूँरेज़ी से भी बढ़ के है और जब तक वह लोग (कुफ्फ़ार) मस्ज़िद हराम (काबा) के पास तुम से न लडे तुम भी उन से उस जगह न लड़ों पस अगर वह तुम से लड़े तो बेखटके तुम भी उन को क़त्ल करो काफ़िरों की यही सज़ा है
192فَإِنِ انتَهَوْا فَإِنَّ اللَّهَ غَفُورٌ رَّحِيمٌ
फिर अगर वह लोग बाज़ रहें तो बेशक ख़ुदा बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है
193وَقَاتِلُوهُمْ حَتَّىٰ لَا تَكُونَ فِتْنَةٌ وَيَكُونَ الدِّينُ لِلَّهِ ۖ فَإِنِ انتَهَوْا فَلَا عُدْوَانَ إِلَّا عَلَى الظَّالِمِينَ
और उन से लड़े जाओ यहाँ तक कि फ़साद बाक़ी न रहे और सिर्फ ख़ुदा ही का दीन रह जाए फिर अगर वह लोग बाज़ रहे तो उन पर ज्यादती न करो क्योंकि ज़ालिमों के सिवा किसी पर ज्यादती (अच्छी) नहीं
अल-बकराकुरान सूची
286आयत
मदनीअवतरण स्थान
191आयत

अनुवाद — अल-बकरा 191

सूरा अल-बकरा आयत 191 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : और तुम उन (मुशरिकों) को जहाँ पाओ मार ही डालो…

सूरा आयत 191/286 — सूरा अल-बकरा البقرة (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अल-बकरा सुनें, सूरा अल-बकरा अनुवाद, सूरा अल-बकरा mp3, सूरा अल-बकरा pdf. आयत 189–193. हिंदी अर्थ: اردو.





पवित्र क़ुरआन


Tuesday, September 29, 2026

अपनी नेक दुआओं में हमें मत भूलिए