Laaa ikraaha fid deeni qat tabiyanar rushdu minal ghayy; famai yakfur bit Taaghooti wa yu`mim billaahi faqadis tamsaka bil`urwatil wusqaa lan fisaama lahaa; wallaahu Samee`un `Aleem
📖 अनुवाद (हिंदी अर्थ)
📖 हिंदी अर्थ
दीन में किसी तरह की जबरदस्ती नहीं क्योंकि हिदायत गुमराही से (अलग) ज़ाहिर हो चुकी तो जिस शख्स ने झूठे खुदाओं बुतों से इंकार किया और खुदा ही पर ईमान लाया तो उसने वो मज़बूत रस्सी पकड़ी है जो टूट ही नहीं सकती और ख़ुदा सब कुछ सुनता और जानता है
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دین (اسلام) میں زبردستی نہیں ہے ہدایت (صاف طور پر ظاہر اور) گمراہی سے الگ ہو چکی ہے تو جو شخص بتوں سے اعتقاد نہ رکھے اور خدا پر ایمان لائے اس نے ایسی مضبوط رسی ہاتھ میں پکڑ لی ہے جو کبھی ٹوٹنے والی نہیں اور خدا (سب کچھ) سنتا اور (سب کچھ) جانتا ہے
दीन में किसी तरह की जबरदस्ती नहीं क्योंकि हिदायत गुमराही से (अलग) ज़ाहिर हो चुकी तो जिस शख्स ने झूठे खुदाओं बुतों से इंकार किया और खुदा ही पर ईमान लाया तो उसने वो मज़बूत रस्सी पकड़ी है जो टूट ही नहीं सकती और ख़ुदा सब कुछ सुनता और जानता है
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
لَا إِكْرَاهَ: कोई ज़बरदस्ती नहीं है।
الرُّشْدُ: सीधा रास्ता, हिदायत, सत्य।
الْغَيُّ: गुमराही, पथभ्रष्टता।
الطَّاغُوتُ: हर वह चीज़ जिसकी पूजा अल्लाह के अलावा की जाए, या हर सरकश और बाग़ी।
الْعُرْوَةِ الْوُثْقَى: मज़बूत रस्सी या पक्का सहारा।
انْفِصَامَ: टूटना, अलग होना।
तफ़सीर (व्याख्या):
इस आयत में अल्लाह तआला फ़रमाता है कि दीन (इस्लाम) में किसी को ज़बरदस्ती लाने की कोई ज़रूरत नहीं है। इस्लाम एक स्पष्ट और पूर्ण दीन है, जिसकी दलीलें और सबूत इतने रौशन हैं कि हर समझदार इंसान सच को झूठ से, और हिदायत को गुमराही से आसानी से अलग कर सकता है। जब सत्य इतना उजागर हो चुका है, तो किसी को ज़बरदस्ती मुसलमान बनाने की कोई गुंजाइश नहीं रहती।
फिर अल्लाह फ़रमाता है कि जो व्यक्ति ताग़ूत (अल्लाह के अलावा हर पूज्य, हर बाग़ी और हर झूठी शक्ति) को नकार दे और केवल अल्लाह पर ईमान लाए, तो उसने सबसे मज़बूत सहारा थाम लिया — ऐसा सहारा जो कभी नहीं टूटता। यानी उसका दीन और उसका ईमान इस क़दर मज़बूत है कि कोई चीज़ उसे अल्लाह से अलग नहीं कर सकती। यही वह रास्ता है जो इंसान को क़ियामत के दिन नजात (मुक्ति) तक पहुँचाता है।
आख़िर में अल्लाह फ़रमाता है कि वह सब कुछ सुनने वाला और जानने वाला है। वह जानता है कि कौन सच्चे दिल से ईमान लाया है और कौन सिर्फ़ ज़बरदस्ती की वजह से मुसलमान बना है। वह हर इंसान के अमल और नीयत का हिसाब लेगा।
फ़ायदे (सीख):
इस्लाम एक ऐसा दीन है जो अक़्ल और दलील पर आधारित है, ज़बरदस्ती पर नहीं। इसलिए इस्लाम में किसी को धर्म बदलने के लिए मजबूर करना मना है।
ताग़ूत (हर झूठी पूजा और हर बाग़ी शक्ति) को नकारना ईमान की पहली शर्त है। बिना उसे छोड़े सच्चा ईमान मुमकिन नहीं।
जो व्यक्ति अल्लाह पर सच्चा ईमान लाता है, उसे किसी और सहारे की ज़रूरत नहीं रहती — अल्लाह का सहारा ही सबसे मज़बूत है।
अल्लाह हर इंसान के दिल की नीयत जानता है, इसलिए हमें सच्चे दिल से और साफ़ नीयत के साथ अपने दीन पर चलना चाहिए।
यह आयत हमें सिखाती है कि दूसरों को दीन की दावत प्यार, हिकमत और अच्छे तरीक़े से देनी चाहिए, न कि दबाव या ज़बरदस्ती से।
ऐ ईमानदारों जो कुछ हमने तुमको दिया है उस दिन के आने से पहले (ख़ुदा की राह में) ख़र्च करो जिसमें न तो ख़रीदो फरोख्त होगी और न यारी (और न आशनाई) और न सिफ़ारिश (ही काम आयेगी) और कुफ़्र करने वाले ही तो जुल्म ढाते हैं
ख़ुदा ही वो ज़ाते पाक है कि उसके सिवा कोई माबूद नहीं (वह) ज़िन्दा है (और) सारे जहान का संभालने वाला है उसको न ऊँघ आती है न नींद जो कुछ आसमानो में है और जो कुछ ज़मीन में है (गरज़ सब कुछ) उसी का है कौन ऐसा है जो बग़ैर उसकी इजाज़त के उसके पास किसी की सिफ़ारिश करे जो कुछ उनके सामने मौजूद है (वह) और जो कुछ उनके पीछे (हो चुका) है (खुदा सबको) जानता है और लोग उसके इल्म में से किसी चीज़ पर भी अहाता नहीं कर सकते मगर वह जिसे जितना चाहे (सिखा दे) उसकी कुर्सी सब आसमानॊं और ज़मीनों को घेरे हुये है और उन दोनों (आसमान व ज़मीन) की निगेहदाश्त उसपर कुछ भी मुश्किल नहीं और वह आलीशान बुजुर्ग़ मरतबा है
दीन में किसी तरह की जबरदस्ती नहीं क्योंकि हिदायत गुमराही से (अलग) ज़ाहिर हो चुकी तो जिस शख्स ने झूठे खुदाओं बुतों से इंकार किया और खुदा ही पर ईमान लाया तो उसने वो मज़बूत रस्सी पकड़ी है जो टूट ही नहीं सकती और ख़ुदा सब कुछ सुनता और जानता है
ख़ुदा उन लोगों का सरपरस्त है जो ईमान ला चुके कि उन्हें (गुमराही की) तारीक़ियों से निकाल कर (हिदायत की) रौशनी में लाता है और जिन लोगों ने कुफ़्र इख्तेयार किया उनके सरपरस्त शैतान हैं कि उनको (ईमान की) रौशनी से निकाल कर (कुफ़्र की) तारीकियों में डाल देते हैं यही लोग तो जहन्नुमी हैं (और) यही उसमें हमेशा रहेंगे
(ऐ रसूल) क्या तुम ने उस शख्स (के हाल) पर नज़र नहीं की जो सिर्फ़ इस बिरते पर कि ख़ुदा ने उसे सल्तनत दी थी इब्राहीम से उनके परवरदिगार के बारे में उलझ पड़ा कि जब इब्राहीम ने (उससे) कहा कि मेरा परवरदिगार तो वह है जो (लोगों को) जिलाता और मारता है तो वो भी (शेख़ी में) आकर कहने लगा मैं भी जिलाता और मारता हूं (तुम्हारे ख़ुदा ही में कौन सा कमाल है) इब्राहीम ने कहा (अच्छा) खुदा तो आफ़ताब को पूरब से निकालता है भला तुम उसको पश्चिम से निकालो इस पर वह काफ़िर हक्का बक्का हो कर रह गया (मगर ईमान न लाया) और ख़ुदा ज़ालिमों को मंज़िले मक़सूद तक नहीं पहुंचाया करता
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