अन-नमल · 40/93
अनुवाद उच्चारण — अन-नमल
قَالَ الَّذِي عِندَهُ عِلْمٌ مِّنَ الْكِتَابِ أَنَا آتِيكَ بِهِ قَبْلَ أَن يَرْتَدَّ إِلَيْكَ طَرْفُكَ ۚ فَلَمَّا رَآهُ مُسْتَقِرًّا عِندَهُ قَالَ هَٰذَا مِن فَضْلِ رَبِّي لِيَبْلُوَنِي أَأَشْكُرُ أَمْ أَكْفُرُ ۖ وَمَن شَكَرَ فَإِنَّمَا يَشْكُرُ لِنَفْسِهِ ۖ وَمَن كَفَرَ فَإِنَّ رَبِّي غَنِيٌّ كَرِيمٌ ۝٤٠
Qaalal lazee indahoo `ilmum minal Kitaabi ana aateeka bihee qabla ai yartadda ilaika tarfuk; falammaa ra aahu mustaqirran `indahoo qaala haazaa min fadli Rabbee li yabluwaneee `a-ashkuru am akfuru wa man shakara fa innamaa yashkuru linafsihee wa man kafara fa inna Rabbee Ghaniyyun Kareem
📖 हिंदी अर्थ
इस पर अभी सुलेमान कुछ कहने न पाए थे कि वह शख्स (आसिफ़ बिन बरख़िया) जिसके पास किताबे (ख़ुदा) का किस कदर इल्म था बोला कि मै आप की पलक झपकने से पहले तख्त को आप के पास हाज़िर किए देता हूँ (बस इतने ही में आ गया) तो जब सुलेमान ने उसे अपने पास मौजूद पाया तो कहने लगे ये महज़ मेरे परवरदिगार का फज़ल व करम है ताकि वह मेरा इम्तेहान ले कि मै उसका शुक्र करता हूँ या नाशुक्री करता हूँ और जो कोई शुक्र करता है वह अपनी ही भलाई के लिए शुक्र करता है और जो शख्स ना शुक्री करता है तो (याद रखिए) मेरा परवरदिगार यक़ीनन बेपरवा और सख़ी है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • عِلْمٌ مِّنَ الْكِتَابِ: पवित्र किताब (लौह-ए-महफूज़) का ज्ञान रखने वाला।
  • يَرْتَدَّ إِلَيْكَ طَرْفُكَ: तुम्हारी पलक झपकने से पहले (यानी आँख के झपकते ही)।
  • مُسْتَقِرًّا: सामने स्थिर और विद्यमान।
  • لِيَبْلُوَنِي: ताकि मेरी परीक्षा ले।
  • غَنِيٌّ كَرِيمٌ: बेनियाज़ (आत्मनिर्भर) और बड़ा दानी।

तफसीर:

जब हज़रत सुलेमान (अलैहिस्सलाम) ने बल्किस (रानी शीबा) का सिंहासन माँगा, तो उनके दरबार में एक ऐसा व्यक्ति था जिसे किताब (लौह-ए-महफूज़) का विशेष ज्ञान प्राप्त था। उसने कहा: "मैं इसे आपके पास ला सकता हूँ इससे पहले कि आपकी पलक झपके।" यह वही व्यक्ति था — आसिफ़ बिन बरखिया — जिसे अल्लाह का महान नाम (इस्म-ए-आज़म) मालूम था, जिसके ज़रिए दुआ ज़रूर क़बूल होती है। उसने अल्लाह से दुआ की और अल्लाह की क़ुदरत से वह सिंहासन पलक झपकते ही हज़रत सुलेमान के सामने आ गया।

जब हज़रत सुलेमान (अलैहिस्सलाम) ने वह सिंहासन अपने सामने स्थिर देखा, तो उन्होंने फ़ौरन अल्लाह का शुक्र अदा किया और कहा: "यह मेरे रब का फज़ल (कृपा) है, ताकि वह मेरी परीक्षा ले कि मैं शुक्र करता हूँ या कुफ़्रान (नाशुक्री) करता हूँ।" यह एक बहुत बड़ा सबक़ है — नेमत मिलने पर इंसान को चाहिए कि वह अल्लाह का शुक्र अदा करे, क्योंकि यह नेमत अल्लाह की तरफ़ से इम्तिहान है।

फिर हज़रत सुलेमान ने फ़रमाया: "जो शुक्र करता है, उसका शुक्र उसी के भले के लिए है — क्योंकि शुक्र करने से नेमत बरकत के साथ बढ़ती है और इंसान का दिल अल्लाह की मोहब्बत से भर जाता है। और जो कुफ़्रान (नाशुक्री) करता है, तो मेरा रब उसके शुक्र से बेनियाज़ है — वह ग़नी (आत्मनिर्भर) है और करीम (दानी) है। वह शुक्र करने वाले और न करने वाले दोनों को दुनिया में रिज़्क़ देता है, लेकिन आख़िरत में हर एक को उसके अमल के हिसाब से जज़ा देगा।"


दावती पहलू:

यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह की नेमतें कितनी बड़ी हैं — वह पलक झपकते ही दूर की चीज़ें हाज़िर कर सकता है। जिस अल्लाह की क़ुदरत यह है, उस पर भरोसा करना चाहिए और उसकी नेमतों का शुक्र अदा करना चाहिए। शुक्र करने से नेमतें बढ़ती हैं और दिल को सुकून मिलता है। यह भी सीख है कि इल्म (ज्ञान) बहुत बड़ी नेमत है — जिसे अल्लाह ने ज्ञान दिया, वह बड़े से बड़े काम कर सकता है। हमें भी चाहिए कि हम इल्म हासिल करें और उसे अल्लाह की राह में इस्तेमाल करें। अल्लाह ग़नी और करीम है — वह अपने बंदों से भलाई चाहता है, चाहे वे शुक्र करें या न करें, लेकिन शुक्र करने वालों के लिए उसके पास बेहतरीन इनाम हैं।



📜 आयत 38-42 — अन-नमल

38قَالَ يَا أَيُّهَا الْمَلَأُ أَيُّكُمْ يَأْتِينِي بِعَرْشِهَا قَبْلَ أَن يَأْتُونِي مُسْلِمِينَ
(जब वह जा चुका) तो सुलेमान ने अपने अहले दरबार से कहा ऐ मेरे दरबार के सरदारो तुममें से कौन ऐसा है कि क़ब्ल इसके वह लोग मेरे सामने फरमाबरदार बनकर आयें
39قَالَ عِفْرِيتٌ مِّنَ الْجِنِّ أَنَا آتِيكَ بِهِ قَبْلَ أَن تَقُومَ مِن مَّقَامِكَ ۖ وَإِنِّي عَلَيْهِ لَقَوِيٌّ أَمِينٌ
मलिका का तख्त मेरे पास ले आए (इस पर) जिनों में से एक दियो बोल उठा कि क़ब्ल इसके कि हुज़ूर (दरबार बरख़ास्त करके) अपनी जगह से उठे मै तख्त आपके पास ले आऊँगा और यक़ीनन उस पर क़ाबू रखता हूँ (और) ज़िम्मेदार हूँ
40قَالَ الَّذِي عِندَهُ عِلْمٌ مِّنَ الْكِتَابِ أَنَا آتِيكَ بِهِ قَبْلَ أَن يَرْتَدَّ إِلَيْكَ طَرْفُكَ ۚ فَلَمَّا رَآهُ مُسْتَقِرًّا عِندَهُ قَالَ هَٰذَا مِن فَضْلِ رَبِّي لِيَبْلُوَنِي أَأَشْكُرُ أَمْ أَكْفُرُ ۖ وَمَن شَكَرَ فَإِنَّمَا يَشْكُرُ لِنَفْسِهِ ۖ وَمَن كَفَرَ فَإِنَّ رَبِّي غَنِيٌّ كَرِيمٌ
इस पर अभी सुलेमान कुछ कहने न पाए थे कि वह शख्स (आसिफ़ बिन बरख़िया) जिसके पास किताबे (ख़ुदा) का किस कदर इल्म था बोला कि मै आप की पलक झपकने से पहले तख्त को आप के पास हाज़िर किए देता हूँ (बस इतने ही में आ गया) तो जब सुलेमान ने उसे अपने पास मौजूद पाया तो कहने लगे ये महज़ मेरे परवरदिगार का फज़ल व करम है ताकि वह मेरा इम्तेहान ले कि मै उसका शुक्र करता हूँ या नाशुक्री करता हूँ और जो कोई शुक्र करता है वह अपनी ही भलाई के लिए शुक्र करता है और जो शख्स ना शुक्री करता है तो (याद रखिए) मेरा परवरदिगार यक़ीनन बेपरवा और सख़ी है
41قَالَ نَكِّرُوا لَهَا عَرْشَهَا نَنظُرْ أَتَهْتَدِي أَمْ تَكُونُ مِنَ الَّذِينَ لَا يَهْتَدُونَ
(उसके बाद) सुलेमान ने कहा कि उसके तख्त में (उसकी अक्ल के इम्तिहान के लिए) तग़य्युर तबददुल कर दो ताकि हम देखें कि फिर भी वह समझ रखती है या उन लोगों में है जो कुछ समझ नहीं रखते
42فَلَمَّا جَاءَتْ قِيلَ أَهَٰكَذَا عَرْشُكِ ۖ قَالَتْ كَأَنَّهُ هُوَ ۚ وَأُوتِينَا الْعِلْمَ مِن قَبْلِهَا وَكُنَّا مُسْلِمِينَ
(चुनान्चे ऐसा ही किया गया) फिर जब बिलक़ीस (सुलेमान के पास) आयी तो पूछा गया कि तुम्हारा तख्त भी ऐसा ही है वह बोली गोया ये वही है (फिर कहने लगी) हमको तो उससे पहले ही (आपकी नुबूवत) मालूम हो गयी थी और हम तो आपके फ़रमाबरदार थे ही
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अनुवाद — अन-नमल 40

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Tuesday, August 18, 2026

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