आल-इमरान · 166/200
अनुवाद उच्चारण — आल-इमरान
وَمَا أَصَابَكُمْ يَوْمَ الْتَقَى الْجَمْعَانِ فَبِإِذْنِ اللَّهِ وَلِيَعْلَمَ الْمُؤْمِنِينَ ۝١٦٦
Wa maa asaabakum yawmal taqal jam`aani fabiiznil laahi wa liya`lamal mu`mineen
📖 हिंदी अर्थ
और जिस दिन दो जमाअतें आपस में गुंथ गयीं उस दिन तुम पर जो मुसीबत पड़ी वह तुम्हारी शरारत की वजह से (ख़ुदा के इजाजत की वजह से आयी) और ताकि ख़ुदा सच्चे ईमान वालों को देख ले
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • أَصَابَكُمْ (तुम्हें पहुँचा) — जो कुछ तुम पर आया, जैसे घाव, शहादत, या हार।
  • الْجَمْعَانِ (दोनों समूह) — मुसलमानों का समूह और मुशरिकों (काफिरों) का समूह।
  • بِإِذْنِ اللَّهِ (अल्लाह के आदेश से) — अल्लाह की इच्छा, उसके फैसले और उसकी तकदीर से।
  • وَلِيَعْلَمَ الْمُؤْمِنِينَ (और ताकि अल्लाह मोमिनों को जान ले) — ताकि सच्चे ईमानवाले सामने आ जाएँ और झूठे दावे करने वाले अलग हो जाएँ।

तफसीर (व्याख्या):

ऐ ईमानवालो! जो कुछ भी तुम पर उस दिन आया, जब दोनों समूह (मुसलमान और मुशरिक) उहुद के मैदान में आमने-सामने हुए — चाहे वह ज़ख्म हों, शहादत हो, या पहली जीत के बाद हार का सामना — वह सब कुछ अल्लाह ही के आदेश, उसकी इच्छा और उसकी तकदीर से हुआ। यह कोई इत्तेफ़ाक़ या संयोग नहीं था, बल्कि अल्लाह की गहरी हिकमत (बुद्धिमत्ता) थी।

अल्लाह तआला ने यह सब इसलिए होने दिया ताकि सच्चे मोमिनों को मुशरिकों और मुनाफ़िकों से अलग करके सामने लाए। क्योंकि ईमान का दावा ज़ुबान से आसान है, लेकिन असली ईमान वही है जो मुश्किलों और आज़माइशों में ज़ाहिर हो। जब मुसलमानों को उहुद में घाव और नुकसान पहुँचा, तो सच्चे साबित हुए वे लोग जिन्होंने अल्लाह के रास्ते में जान की परवाह नहीं की, और जो कमज़ोर ईमान वाले थे या मुनाफ़िक थे, वे पीछे हट गए।

यह आयत हमें सिखाती है कि मुसीबतें और परीक्षाएँ अल्लाह की तरफ से हैं, और उनमें हमारे लिए भलाई छिपी होती है। अल्लाह हमें आज़माता है ताकि हमारा ईमान पक्का हो, हमारा सब्र बढ़े, और हम उसकी राह पर और मज़बूती से क़ायम रहें। जब कोई मुसीबत आए, तो हमें यह यक़ीन रखना चाहिए कि यह अल्लाह की तरफ से है, और उसमें हमारे लिए कोई न कोई हिकमत ज़रूर है। यही सच्चे मोमिन की पहचान है — कि वह हर हाल में अल्लाह पर भरोसा रखे और उसके फैसले पर राज़ी रहे।

याद रखो, अल्लाह तआला अपने बंदों से बेहद मुहब्बत करता है, और हर आज़माइश के बाद उनके लिए खुशी और कामयाबी रखता है। उहुद की उस मुसीबत के बाद ही अल्लाह ने मुसलमानों को ताक़त दी, उनके दिलों को साफ़ किया, और उन्हें सिखाया कि सब्र और तक़वा ही असली फतह की कुंजी है। इसलिए हमें भी अपनी ज़िंदगी की हर परेशानी में अल्लाह की रहमत की उम्मीद रखनी चाहिए और यक़ीन करना चाहिए कि अल्लाह हर मुसीबत के बाद राहत ज़रूर देता है।

🎧 सुनें

📜 आयत 164-168 — आल-इमरान

164لَقَدْ مَنَّ اللَّهُ عَلَى الْمُؤْمِنِينَ إِذْ بَعَثَ فِيهِمْ رَسُولًا مِّنْ أَنفُسِهِمْ يَتْلُو عَلَيْهِمْ آيَاتِهِ وَيُزَكِّيهِمْ وَيُعَلِّمُهُمُ الْكِتَابَ وَالْحِكْمَةَ وَإِن كَانُوا مِن قَبْلُ لَفِي ضَلَالٍ مُّبِينٍ
ख़ुदा ने तो ईमानदारों पर बड़ा एहसान किया कि उनके वास्ते उन्हीं की क़ौम का एक रसूल भेजा जो उन्हें खुदा की आयतें पढ़ पढ़ के सुनाता है और उनकी तबीयत को पाकीज़ा करता है और उन्हें किताबे (ख़ुदा) और अक्ल की बातें सिखाता है अगरचे वह पहले खुली हुई गुमराही में पडे थे
165أَوَلَمَّا أَصَابَتْكُم مُّصِيبَةٌ قَدْ أَصَبْتُم مِّثْلَيْهَا قُلْتُمْ أَنَّىٰ هَٰذَا ۖ قُلْ هُوَ مِنْ عِندِ أَنفُسِكُمْ ۗ إِنَّ اللَّهَ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ
मुसलमानों क्या जब तुमपर (जंगे ओहद) में वह मुसीबत पड़ी जिसकी दूनी मुसीबत तुम (कुफ्फ़ार पर) डाल चुके थे तो (घबरा के) कहने लगे ये (आफ़त) कहॉ से आ गयी (ऐ रसूल) तुम कह दो कि ये तो खुद तुम्हारी ही तरफ़ से है (न रसूल की मुख़ालेफ़त करते न सज़ा होती) बेशक ख़ुदा हर चीज़ पर क़ादिर है
166وَمَا أَصَابَكُمْ يَوْمَ الْتَقَى الْجَمْعَانِ فَبِإِذْنِ اللَّهِ وَلِيَعْلَمَ الْمُؤْمِنِينَ
और जिस दिन दो जमाअतें आपस में गुंथ गयीं उस दिन तुम पर जो मुसीबत पड़ी वह तुम्हारी शरारत की वजह से (ख़ुदा के इजाजत की वजह से आयी) और ताकि ख़ुदा सच्चे ईमान वालों को देख ले
167وَلِيَعْلَمَ الَّذِينَ نَافَقُوا ۚ وَقِيلَ لَهُمْ تَعَالَوْا قَاتِلُوا فِي سَبِيلِ اللَّهِ أَوِ ادْفَعُوا ۖ قَالُوا لَوْ نَعْلَمُ قِتَالًا لَّاتَّبَعْنَاكُمْ ۗ هُمْ لِلْكُفْرِ يَوْمَئِذٍ أَقْرَبُ مِنْهُمْ لِلْإِيمَانِ ۚ يَقُولُونَ بِأَفْوَاهِهِم مَّا لَيْسَ فِي قُلُوبِهِمْ ۗ وَاللَّهُ أَعْلَمُ بِمَا يَكْتُمُونَ
और मुनाफ़िक़ों को देख ले (कि कौन है) और मुनाफ़िक़ों से कहा गया कि आओ ख़ुदा की राह में जेहाद करो या (ये न सही अपने दुशमन को) हटा दो तो कहने लगे (हाए क्या कहीं) अगर हम लड़ना जानते तो ज़रूर तुम्हारा साथ देते ये लोग उस दिन बनिस्बते ईमान के कुफ़्र के ज्यादा क़रीब थे अपने मुंह से वह बातें कह देते हैं जो उनके दिल में (ख़ाक) नहीं होतीं और जिसे वह छिपाते हैं ख़ुदा उसे ख़ूब जानता है
168الَّذِينَ قَالُوا لِإِخْوَانِهِمْ وَقَعَدُوا لَوْ أَطَاعُونَا مَا قُتِلُوا ۗ قُلْ فَادْرَءُوا عَنْ أَنفُسِكُمُ الْمَوْتَ إِن كُنتُمْ صَادِقِينَ
(ये वही लोग हैं) जो (आप चैन से घरों में बैठे रहते है और अपने शहीद) भाईयों के बारे में कहने लगे काश हमारी पैरवी करते तो न मारे जाते (ऐ रसूल) उनसे कहो (अच्छा) अगर तुम सच्चे हो तो ज़रा अपनी जान से मौत को टाल दो
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अनुवाद — आल-इमरान 166

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Tuesday, August 18, 2026

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