अल-अहज़ाब · 35/73
अनुवाद उच्चारण — अल-अहज़ाब
إِنَّ الْمُسْلِمِينَ وَالْمُسْلِمَاتِ وَالْمُؤْمِنِينَ وَالْمُؤْمِنَاتِ وَالْقَانِتِينَ وَالْقَانِتَاتِ وَالصَّادِقِينَ وَالصَّادِقَاتِ وَالصَّابِرِينَ وَالصَّابِرَاتِ وَالْخَاشِعِينَ وَالْخَاشِعَاتِ وَالْمُتَصَدِّقِينَ وَالْمُتَصَدِّقَاتِ وَالصَّائِمِينَ وَالصَّائِمَاتِ وَالْحَافِظِينَ فُرُوجَهُمْ وَالْحَافِظَاتِ وَالذَّاكِرِينَ اللَّهَ كَثِيرًا وَالذَّاكِرَاتِ أَعَدَّ اللَّهُ لَهُم مَّغْفِرَةً وَأَجْرًا عَظِيمًا ۝٣٥
Innal muslimeena wal muslimaati wal mu`mineena wal mu`minaati walqaaniteena walqaanitaati wassaadiqeena wassaadiqaati wassaabireena wassaabiraati walkhaashi`eena walkhaashi`aati walmutasaddiqeena walmutasaddiqaati wassaaa`imeena wassaaa`imaati walhaafizeena furoojahum walhaafizaati waz zaakireenal laaha kaseeranw waz zaakiraati a`addal laahu lahum maghfiratanw wa ajran `azeemaa
📖 हिंदी अर्थ
(दिल लगा के सुनो) मुसलमान मर्द और मुसलमान औरतें और ईमानदार मर्द और ईमानदार औरतें और फरमाबरदार मर्द और फरमाबरदार औरतें और रास्तबाज़ मर्द और रास्तबाज़ औरतें और सब्र करने वाले मर्द और सब्र करने वाली औरतें और फिरौतनी करने वाले मर्द और फिरौतनी करने वाली औरतें और Âैरात करने वाले मर्द और Âैरात करने वाली औरतें और रोज़ादार मर्द और रोज़ादार औरतें और अपनी शर्मगाहों की हिफाज़त करने वाले मर्द और हिफाज़त करने वाली औरतें और खुदा की बकसरत याद करने वाले मर्द और याद करने वाली औरतें बेशक इन सब लोगों के वास्ते खुदा ने मग़फिरत और (बड़ा) सवाब मुहैय्या कर रखा है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • मुस्लिमीन / मुस्लिमात: अल्लाह के आदेशों के सामने आत्मसमर्पण करने वाले पुरुष और स्त्रियाँ।
  • मोमिनीन / मोमिनात: सच्चे दिल से ईमान लाने वाले पुरुष और स्त्रियाँ।
  • क़ानितीन / क़ानितात: अल्लाह के आज्ञाकारी, उसकी इबादत में लीन रहने वाले पुरुष और स्त्रियाँ।
  • ख़ाशि'ईन / ख़ाशि'आत: अल्लाह के भय से दिल में नम्रता और ख़ुशूअत (विनम्रता) रखने वाले पुरुष और स्त्रियाँ।
  • हाफ़िज़ीन / हाफ़िज़ात: अपनी शर्मगाहों (गोपनीय अंगों) की रक्षा करने वाले पुरुष और स्त्रियाँ।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह पवित्र आयत मुस्लिम समाज के लिए एक स्वर्णिम संविधान की तरह है, जिसमें अल्लाह तआला ने उन सभी गुणों का वर्णन किया है जो एक सच्चे मोमिन पुरुष और मोमिना स्त्री में होने चाहिए। यह आयत बताती है कि अल्लाह की दृष्टि में पुरुष और स्त्री दोनों बराबर हैं—दोनों को समान रूप से इनाम और अज्र का अधिकार है, बशर्ते वे इन गुणों को अपनाएँ।

अल्लाह तआला फ़रमाता है कि जो पुरुष और स्त्रियाँ इस्लाम लाए (अर्थात अल्लाह के हुक्म के आगे सर झुका दिया), जो ईमान लाए (सच्चे दिल से अल्लाह और उसके रसूल पर यक़ीन किया), जो क़ानित हैं (अल्लाह की इबादत में मशगूल रहते हैं और उसके आदेशों का पालन करते हैं), जो सच्चे हैं (अपने ईमान, वचन और व्यवहार में सच्चाई रखते हैं), जो सब्र करने वाले हैं (तकलीफ़ों, मुसीबतों और गुनाहों से बचने में धैर्य रखते हैं), जो ख़ुशूअत रखते हैं (अल्लाह के भय से उनके दिल नम्र और उनके अंदाज़ विनम्र होते हैं), जो दान देते हैं (फ़र्ज़ ज़कात भी और नफ़्ली सदक़ा भी), जो रोज़े रखते हैं (रमज़ान के फ़र्ज़ रोज़े और नफ़्ली रोज़े भी), जो अपनी शर्मगाहों की रक्षा करते हैं (हराम कामों, ज़िना और उसके मुक़द्दमात से बचते हैं, और अपने जिस्म को नामहरम से छिपाते हैं), और जो अल्लाह को बहुत ज़्यादा याद करते हैं (दिल से और ज़ुबान से, चुपके और खुले तौर पर)—इन सबके लिए अल्लाह ने मग़फ़िरत (गुनाहों की माफ़ी) और बड़ा अज्र (जन्नत) तैयार कर रखा है।

यह आयत हमें सिखाती है कि इस्लाम में स्त्री और पुरुष की कोई ऊँच-नीच नहीं है। अल्लाह के यहाँ वही इज़्ज़त पाता है जो इन गुणों को अपनाता है। यह आयत हर मुसलमान के लिए एक प्रेरणा है कि वह अपनी ज़िंदगी को इन्हीं गुणों से सजाए—इस्लाम, ईमान, इबादत, सच्चाई, सब्र, ख़ुशूअत, दान, रोज़े, पाकदामनी और ज़िक्र—ताकि अल्लाह की रहमत और उसका अज़ीम इनाम उसे हासिल हो। यह वादा अल्लाह का है, और अल्लाह का वादा कभी नहीं टूटता।



📜 आयत 33-37 — अल-अहज़ाब

33وَقَرْنَ فِي بُيُوتِكُنَّ وَلَا تَبَرَّجْنَ تَبَرُّجَ الْجَاهِلِيَّةِ الْأُولَىٰ ۖ وَأَقِمْنَ الصَّلَاةَ وَآتِينَ الزَّكَاةَ وَأَطِعْنَ اللَّهَ وَرَسُولَهُ ۚ إِنَّمَا يُرِيدُ اللَّهُ لِيُذْهِبَ عَنكُمُ الرِّجْسَ أَهْلَ الْبَيْتِ وَيُطَهِّرَكُمْ تَطْهِيرًا
और (साफ-साफ) उनवाने शाइस्ता से बात किया करो और अपने घरों में निचली बैठी रहो और अगले ज़माने जाहिलियत की तरह अपना बनाव सिंगार न दिखाती फिरो और पाबन्दी से नमाज़ पढ़ा करो और (बराबर) ज़कात दिया करो और खुदा और उसके रसूल की इताअत करो ऐ (पैग़म्बर के) अहले बैत खुदा तो बस ये चाहता है कि तुमको (हर तरह की) बुराई से दूर रखे और जो पाक व पाकीज़ा दिखने का हक़ है वैसा पाक व पाकीज़ा रखे
34وَاذْكُرْنَ مَا يُتْلَىٰ فِي بُيُوتِكُنَّ مِنْ آيَاتِ اللَّهِ وَالْحِكْمَةِ ۚ إِنَّ اللَّهَ كَانَ لَطِيفًا خَبِيرًا
और (ऐ नबी की बीबियों) तुम्हारे घरों में जो खुदा की आयतें और (अक़ल व हिकमत की बातें) पढ़ी जाती हैं उनको याद रखो कि बेशक ख़ुदा बड़ा बारीक है वाक़िफकार है
35إِنَّ الْمُسْلِمِينَ وَالْمُسْلِمَاتِ وَالْمُؤْمِنِينَ وَالْمُؤْمِنَاتِ وَالْقَانِتِينَ وَالْقَانِتَاتِ وَالصَّادِقِينَ وَالصَّادِقَاتِ وَالصَّابِرِينَ وَالصَّابِرَاتِ وَالْخَاشِعِينَ وَالْخَاشِعَاتِ وَالْمُتَصَدِّقِينَ وَالْمُتَصَدِّقَاتِ وَالصَّائِمِينَ وَالصَّائِمَاتِ وَالْحَافِظِينَ فُرُوجَهُمْ وَالْحَافِظَاتِ وَالذَّاكِرِينَ اللَّهَ كَثِيرًا وَالذَّاكِرَاتِ أَعَدَّ اللَّهُ لَهُم مَّغْفِرَةً وَأَجْرًا عَظِيمًا
(दिल लगा के सुनो) मुसलमान मर्द और मुसलमान औरतें और ईमानदार मर्द और ईमानदार औरतें और फरमाबरदार मर्द और फरमाबरदार औरतें और रास्तबाज़ मर्द और रास्तबाज़ औरतें और सब्र करने वाले मर्द और सब्र करने वाली औरतें और फिरौतनी करने वाले मर्द और फिरौतनी करने वाली औरतें और Âैरात करने वाले मर्द और Âैरात करने वाली औरतें और रोज़ादार मर्द और रोज़ादार औरतें और अपनी शर्मगाहों की हिफाज़त करने वाले मर्द और हिफाज़त करने वाली औरतें और खुदा की बकसरत याद करने वाले मर्द और याद करने वाली औरतें बेशक इन सब लोगों के वास्ते खुदा ने मग़फिरत और (बड़ा) सवाब मुहैय्या कर रखा है
36وَمَا كَانَ لِمُؤْمِنٍ وَلَا مُؤْمِنَةٍ إِذَا قَضَى اللَّهُ وَرَسُولُهُ أَمْرًا أَن يَكُونَ لَهُمُ الْخِيَرَةُ مِنْ أَمْرِهِمْ ۗ وَمَن يَعْصِ اللَّهَ وَرَسُولَهُ فَقَدْ ضَلَّ ضَلَالًا مُّبِينًا
और न किसी ईमानदार मर्द को ये मुनासिब है और न किसी ईमानदार औरत को जब खुदा और उसके रसूल किसी काम का हुक्म दें तो उनको अपने उस काम (के करने न करने) अख़तेयार हो और (याद रहे कि) जिस शख्स ने खुदा और उसके रसूल की नाफरमानी की वह यक़ीनन खुल्लम खुल्ला गुमराही में मुब्तिला हो चुका
37وَإِذْ تَقُولُ لِلَّذِي أَنْعَمَ اللَّهُ عَلَيْهِ وَأَنْعَمْتَ عَلَيْهِ أَمْسِكْ عَلَيْكَ زَوْجَكَ وَاتَّقِ اللَّهَ وَتُخْفِي فِي نَفْسِكَ مَا اللَّهُ مُبْدِيهِ وَتَخْشَى النَّاسَ وَاللَّهُ أَحَقُّ أَن تَخْشَاهُ ۖ فَلَمَّا قَضَىٰ زَيْدٌ مِّنْهَا وَطَرًا زَوَّجْنَاكَهَا لِكَيْ لَا يَكُونَ عَلَى الْمُؤْمِنِينَ حَرَجٌ فِي أَزْوَاجِ أَدْعِيَائِهِمْ إِذَا قَضَوْا مِنْهُنَّ وَطَرًا ۚ وَكَانَ أَمْرُ اللَّهِ مَفْعُولًا
और (ऐ रसूल वह वक्त याद करो) जब तुम उस शख्स (ज़ैद) से कह रहे थे जिस पर खुदा ने एहसान (अलग) किया था और तुमने उस पर (अलग) एहसान किया था कि अपनी बीबी (ज़ैनब) को अपनी ज़ौज़ियत में रहने दे और खुदा से डेर खुद तुम इस बात को अपने दिल में छिपाते थे जिसको (आख़िरकार) खुदा ज़ाहिर करने वाला था और तुम लोगों से डरते थे हालॉकि खुदा इसका ज्यादा हक़दार है कि तुम उस से डरो ग़रज़ जब ज़ैद अपनी हाजत पूरी कर चुका (तलाक़ दे दी) तो हमने (हुक्म देकर) उस औरत (ज़ैनब) का निकाह तुमसे कर दिया ताकि आम मोमिनीन को अपने ले पालक लड़कों की बीवियों (से निकाह करने) में जब वह अपना मतलब उन औरतों से पूरा कर चुकें (तलाक़ दे दें) किसी तरह की तंगी न रहे और खुदा का हुक्म तो किया कराया हुआ (क़तई) होता है
अल-अहज़ाबकुरान सूची
73आयत
मदनीRevelation
35आयत

अनुवाद — अल-अहज़ाब 35

सूरा अल-अहज़ाब आयत 35 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : (दिल लगा के सुनो) मुसलमान मर्द और मुसलमान औरतें और…

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पवित्र क़ुरआन


Tuesday, August 18, 2026

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