अल-अहज़ाब · 34/73
अनुवाद उच्चारण — अल-अहज़ाब
وَاذْكُرْنَ مَا يُتْلَىٰ فِي بُيُوتِكُنَّ مِنْ آيَاتِ اللَّهِ وَالْحِكْمَةِ ۚ إِنَّ اللَّهَ كَانَ لَطِيفًا خَبِيرًا ۝٣٤
Wazkurna maa yutlaa fee bu yootikunna min aayaatil laahi wal Hikmah; innal laaha kaana lateefan Khabeera
📖 हिंदी अर्थ
और (ऐ नबी की बीबियों) तुम्हारे घरों में जो खुदा की आयतें और (अक़ल व हिकमत की बातें) पढ़ी जाती हैं उनको याद रखो कि बेशक ख़ुदा बड़ा बारीक है वाक़िफकार है
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • آيَاتِ اللَّهِ: अल्लाह की आयतें, यानी कुरआन की आयतें।
  • الْحِكْمَةِ: हिकमत, यानी रसूलुल्लाह ﷺ की सुन्नत और उनके मुबारक अक़वाल व अफ़आल।
  • لَطِيفًا: बड़ा मेहरबान और बारीकबीन, जो अपने बंदों के हाल से पूरी तरह वाक़िफ हो और उन पर कृपा करने वाला हो।
  • خَبِيرًا: ख़बर रखने वाला, जो हर चीज़ की हक़ीक़त से बाख़बर हो।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला ने इस आयत में नबी ﷺ की पाक बीवियों को ख़िताब करके उन्हें एक बड़ी नेमत की याद दिलाई है। वह फ़रमाते हैं: "और याद करो उसे जो तुम्हारे घरों में पढ़ा जाता है, अल्लाह की आयतें और हिकमत।" यानी तुम्हारे घर वो मुबारक घर हैं जहाँ अल्लाह का कलाम (कुरआन) उतरता था, और रसूलुल्लाह ﷺ की सुन्नत और हिकमत का नुज़ूल होता था। यह एक बहुत बड़ा शरफ़ और एहसान है जो अल्लाह ने उन्हें अता किया।

इस आयत में "याद करो" का मतलब सिर्फ़ ज़ुबान से याद करना नहीं है, बल्कि इसे अपने दिल में बसाना, उस पर अमल करना, उसकी क़द्र करना और उसे दूसरों तक पहुँचाना भी है। क्योंकि जिस घर में अल्लाह की आयतें पढ़ी जाती हैं, वह घर नूर से भर जाता है, और वहाँ रहने वालों को चाहिए कि वे इस नेमत की शुक्रगुज़ारी करें और इसकी क़द्र करें।

फिर अल्लाह फ़रमाता है: "बेशक अल्लाह लतीफ़ और ख़बीर है।" यानी अल्लाह अपने बंदों पर बड़ा मेहरबान है, वह जानता है कि उसने यह नेमत किसे देनी है और किसे नहीं। उसने इन पाक बीवियों को चुना, क्योंकि वह जानता था कि ये इस शरफ़ की हक़दार हैं। वह उनके हाल से बाख़बर था, इसलिए उसने उन्हें नबी ﷺ की ज़ौजियत का शरफ़ अता किया और उन्हें उम्मत की माओं का दर्जा दिया।

दावती पहलू:

यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह की नेमतों को याद रखना और उनकी क़द्र करना कितना अहम है। जिस घर में कुरआन पढ़ा जाता है और सुन्नत पर अमल होता है, वह घर दुनिया और आख़िरत दोनों में बरकत वाला होता है। हमें भी अपने घरों को कुरआन और सुन्नत की रौशनी से मुनव्वर करना चाहिए, ताकि हमारे घर भी उन मुबारक घरों की तरह बन सकें जिनका ज़िक्र अल्लाह ने कुरआन में किया है। अल्लाह लतीफ़ है, वह अपने बंदों पर मेहरबानी करता है और उन्हें तौफ़ीक़ देता है, बशर्ते वे उसकी तरफ़ रुजू करें और उसके कलाम को अपनी ज़िंदगी में नफ़ाज़ दें।

🎧 सुनें

📜 आयत 32-36 — अल-अहज़ाब

32يَا نِسَاءَ النَّبِيِّ لَسْتُنَّ كَأَحَدٍ مِّنَ النِّسَاءِ ۚ إِنِ اتَّقَيْتُنَّ فَلَا تَخْضَعْنَ بِالْقَوْلِ فَيَطْمَعَ الَّذِي فِي قَلْبِهِ مَرَضٌ وَقُلْنَ قَوْلًا مَّعْرُوفًا
ऐ नबी की बीवियों तुम और मामूली औरतों की सी तो हो वही (बस) अगर तुम को परहेज़गारी मंजूर रहे तो (अजनबी आदमी से) बात करने में नरम नरम (लगी लिपटी) बात न करो ताकि जिसके दिल में (शहवते ज़िना का) मर्ज़ है वह (कुछ और) इरादा (न) करे
33وَقَرْنَ فِي بُيُوتِكُنَّ وَلَا تَبَرَّجْنَ تَبَرُّجَ الْجَاهِلِيَّةِ الْأُولَىٰ ۖ وَأَقِمْنَ الصَّلَاةَ وَآتِينَ الزَّكَاةَ وَأَطِعْنَ اللَّهَ وَرَسُولَهُ ۚ إِنَّمَا يُرِيدُ اللَّهُ لِيُذْهِبَ عَنكُمُ الرِّجْسَ أَهْلَ الْبَيْتِ وَيُطَهِّرَكُمْ تَطْهِيرًا
और (साफ-साफ) उनवाने शाइस्ता से बात किया करो और अपने घरों में निचली बैठी रहो और अगले ज़माने जाहिलियत की तरह अपना बनाव सिंगार न दिखाती फिरो और पाबन्दी से नमाज़ पढ़ा करो और (बराबर) ज़कात दिया करो और खुदा और उसके रसूल की इताअत करो ऐ (पैग़म्बर के) अहले बैत खुदा तो बस ये चाहता है कि तुमको (हर तरह की) बुराई से दूर रखे और जो पाक व पाकीज़ा दिखने का हक़ है वैसा पाक व पाकीज़ा रखे
34وَاذْكُرْنَ مَا يُتْلَىٰ فِي بُيُوتِكُنَّ مِنْ آيَاتِ اللَّهِ وَالْحِكْمَةِ ۚ إِنَّ اللَّهَ كَانَ لَطِيفًا خَبِيرًا
और (ऐ नबी की बीबियों) तुम्हारे घरों में जो खुदा की आयतें और (अक़ल व हिकमत की बातें) पढ़ी जाती हैं उनको याद रखो कि बेशक ख़ुदा बड़ा बारीक है वाक़िफकार है
35إِنَّ الْمُسْلِمِينَ وَالْمُسْلِمَاتِ وَالْمُؤْمِنِينَ وَالْمُؤْمِنَاتِ وَالْقَانِتِينَ وَالْقَانِتَاتِ وَالصَّادِقِينَ وَالصَّادِقَاتِ وَالصَّابِرِينَ وَالصَّابِرَاتِ وَالْخَاشِعِينَ وَالْخَاشِعَاتِ وَالْمُتَصَدِّقِينَ وَالْمُتَصَدِّقَاتِ وَالصَّائِمِينَ وَالصَّائِمَاتِ وَالْحَافِظِينَ فُرُوجَهُمْ وَالْحَافِظَاتِ وَالذَّاكِرِينَ اللَّهَ كَثِيرًا وَالذَّاكِرَاتِ أَعَدَّ اللَّهُ لَهُم مَّغْفِرَةً وَأَجْرًا عَظِيمًا
(दिल लगा के सुनो) मुसलमान मर्द और मुसलमान औरतें और ईमानदार मर्द और ईमानदार औरतें और फरमाबरदार मर्द और फरमाबरदार औरतें और रास्तबाज़ मर्द और रास्तबाज़ औरतें और सब्र करने वाले मर्द और सब्र करने वाली औरतें और फिरौतनी करने वाले मर्द और फिरौतनी करने वाली औरतें और Âैरात करने वाले मर्द और Âैरात करने वाली औरतें और रोज़ादार मर्द और रोज़ादार औरतें और अपनी शर्मगाहों की हिफाज़त करने वाले मर्द और हिफाज़त करने वाली औरतें और खुदा की बकसरत याद करने वाले मर्द और याद करने वाली औरतें बेशक इन सब लोगों के वास्ते खुदा ने मग़फिरत और (बड़ा) सवाब मुहैय्या कर रखा है
36وَمَا كَانَ لِمُؤْمِنٍ وَلَا مُؤْمِنَةٍ إِذَا قَضَى اللَّهُ وَرَسُولُهُ أَمْرًا أَن يَكُونَ لَهُمُ الْخِيَرَةُ مِنْ أَمْرِهِمْ ۗ وَمَن يَعْصِ اللَّهَ وَرَسُولَهُ فَقَدْ ضَلَّ ضَلَالًا مُّبِينًا
और न किसी ईमानदार मर्द को ये मुनासिब है और न किसी ईमानदार औरत को जब खुदा और उसके रसूल किसी काम का हुक्म दें तो उनको अपने उस काम (के करने न करने) अख़तेयार हो और (याद रहे कि) जिस शख्स ने खुदा और उसके रसूल की नाफरमानी की वह यक़ीनन खुल्लम खुल्ला गुमराही में मुब्तिला हो चुका
अल-अहज़ाबकुरान सूची
73आयत
मदनीRevelation
34आयत

अनुवाद — अल-अहज़ाब 34

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Tuesday, August 18, 2026

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