सबा · 19/54
अनुवाद उच्चारण — सबा
فَقَالُوا رَبَّنَا بَاعِدْ بَيْنَ أَسْفَارِنَا وَظَلَمُوا أَنفُسَهُمْ فَجَعَلْنَاهُمْ أَحَادِيثَ وَمَزَّقْنَاهُمْ كُلَّ مُمَزَّقٍ ۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَاتٍ لِّكُلِّ صَبَّارٍ شَكُورٍ ۝١٩
Faqaaloo Rabbanaa baa`id baina asfaarinaa wa zalamooo anfusahum faja`alnaahum ahaadeesa wa mazzaq naahum kulla mumazzaq; inna fee zaalika la Aayaatil likulli sabbaarin shakoor
📖 हिंदी अर्थ
तो वह लोग ख़ुद कहने लगे परवरदिगार (क़रीब के सफर में लुत्फ नहीं) तो हमारे सफ़रों में दूरी पैदा कर दे और उन लोगों ने खुद अपने ऊपर ज़ुल्म किया तो हमने भी उनको (तबाह करके उनके) अफसाने बना दिए - और उनकी धज्जियाँ उड़ा के उनको तितिर बितिर कर दिया बेशक उनमें हर सब्र व शुक्र करने वालोंके वास्ते बड़ी इबरते हैं

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • بَاعِدْ بَيْنَ أَسْفَارِنَا: हमारी यात्राओं के बीच की दूरी बढ़ा दे।
  • أَحَادِيثَ: (लोगों की) कहानियाँ और चर्चा का विषय।
  • مَزَّقْنَاهُمْ كُلَّ مُمَزَّقٍ: हमने उन्हें हर तरह से टुकड़े-टुकड़े करके बिखेर दिया।
  • صَبَّارٍ شَكُورٍ: बहुत सब्र करने वाला और बहुत शुक्र करने वाला।

तफ़सीर (व्याख्या):

जब अल्लाह ने सबा (शीबा) के लोगों को अपनी ढेरों नेमतें दीं—उनके शहरों को आपस में इस क़दर करीब-करीब बना दिया कि उनकी यात्राएँ आरामदायक और सुरक्षित थीं, और उन्हें हर तरफ़ से भरपूर रिज़्क़ अता किया—तो उन्होंने इस नेमत की क़द्र न की। वे इतने बद-अख़्लाक़ और नाशुक्रे हो गए कि उन्होंने कहा: "ऐ हमारे रब! हमारी यात्राओं के बीच की दूरी बढ़ा दे।" यानी उन्होंने उस आसानी और सुकून से ऊबकर दूरियाँ माँग लीं, ताकि वे ऊँटों पर सवारी करने और ज़ाद-ए-राह (सफ़र का सामान) लेकर चलने का दिखावा कर सकें और ग़रीबों पर अपनी बड़ाई जता सकें। यह उनकी नाशुक्री और अक्ल की कमी थी, क्योंकि उन्होंने अपनी भलाई को ही बुराई समझ लिया।

इसके बाद अल्लाह फ़रमाता है: "और उन्होंने अपनी जानों पर ज़ुल्म किया"—यानी उन्होंने अपने रब की नेमतों का शुक्र न करके और उसकी नेमत को ठुकराकर अपने ही ऊपर सितम ढाया। फिर अल्लाह ने उनकी दुआ (जो उनकी सज़ा का सबब बनी) को क़ुबूल किया और उनके शहरों को उजाड़ दिया, और उन्हें आपस में इतना बिखेर दिया कि वे दुनिया भर में फैल गए। वे लोगों के लिए एक सबक़ और कहानी बन गए—लोग उनके हालात पर अचरज करते और उनके अंजाम से इबरत हासिल करते।

अल्लाह तआला फ़रमाता है: "इसमें हर उस शख्स के लिए बड़ी निशानियाँ हैं जो बहुत सब्र करने वाला और बहुत शुक्र करने वाला हो।" यानी इस क़िस्से में उन लोगों के लिए बड़ी इबरत है जो मुसीबतों पर सब्र करते हैं और नेमतों पर अल्लाह का शुक्र अदा करते हैं। वे जानते हैं कि नेमत की क़द्र करना और शुक्र अदा करना ही सच्ची भलाई है, और नाशुक्री और बद-अख़्लाक़ी अल्लाह के अज़ाब को न्योता देती है।

दावती पहलू:

यह क़िस्सा हमें सिखाता है कि अल्लाह की नेमतें जितनी बड़ी होती हैं, उनका शुक्र उतना ही ज़रूरी होता है। जो लोग नेमतों को ठुकराते हैं या उनसे ऊब जाते हैं, वे अपने लिए तबाही का रास्ता खुद चुन लेते हैं। इसलिए हमें चाहिए कि हम हर हाल में अल्लाह का शुक्र अदा करें—चाहे हालात आसान हों या मुश्किल। सब्र और शुक्र दो ऐसी सिफ़ात हैं जो इंसान को अल्लाह की मुहब्बत और उसकी रहमत के क़रीब लाती हैं। याद रखें, अल्लाह उन लोगों के साथ है जो सब्र करते हैं और शुक्र अदा करते हैं, और वह उन्हें दुनिया और आख़िरत में कामयाबी अता करता है।



📜 आयत 17-21 — सबा

17ذَٰلِكَ جَزَيْنَاهُم بِمَا كَفَرُوا ۖ وَهَلْ نُجَازِي إِلَّا الْكَفُورَ
ये हमने उनकी नाशुक्री की सज़ा दी और हम तो बड़े नाशुक्रों ही की सज़ा किया करते हैं
18وَجَعَلْنَا بَيْنَهُمْ وَبَيْنَ الْقُرَى الَّتِي بَارَكْنَا فِيهَا قُرًى ظَاهِرَةً وَقَدَّرْنَا فِيهَا السَّيْرَ ۖ سِيرُوا فِيهَا لَيَالِيَ وَأَيَّامًا آمِنِينَ
और हम अहले सबा और (शाम) की उन बस्तियों के दरमियान जिनमें हमने बरकत अता की थी और चन्द बस्तियाँ (सरे राह) आबाद की थी जो बाहम नुमाया थीं और हमने उनमें आमद व रफ्त की राह मुक़र्रर की थी कि उनमें रातों को दिनों को (जब जी चाहे) बेखटके चलो फिरो
19فَقَالُوا رَبَّنَا بَاعِدْ بَيْنَ أَسْفَارِنَا وَظَلَمُوا أَنفُسَهُمْ فَجَعَلْنَاهُمْ أَحَادِيثَ وَمَزَّقْنَاهُمْ كُلَّ مُمَزَّقٍ ۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَاتٍ لِّكُلِّ صَبَّارٍ شَكُورٍ
तो वह लोग ख़ुद कहने लगे परवरदिगार (क़रीब के सफर में लुत्फ नहीं) तो हमारे सफ़रों में दूरी पैदा कर दे और उन लोगों ने खुद अपने ऊपर ज़ुल्म किया तो हमने भी उनको (तबाह करके उनके) अफसाने बना दिए - और उनकी धज्जियाँ उड़ा के उनको तितिर बितिर कर दिया बेशक उनमें हर सब्र व शुक्र करने वालोंके वास्ते बड़ी इबरते हैं
20وَلَقَدْ صَدَّقَ عَلَيْهِمْ إِبْلِيسُ ظَنَّهُ فَاتَّبَعُوهُ إِلَّا فَرِيقًا مِّنَ الْمُؤْمِنِينَ
और शैतान ने अपने ख्याल को (जो उनके बारे में किया था) सच कर दिखाया तो उन लोगों ने उसकी पैरवी की मगर ईमानवालों का एक गिरोह (न भटका)
21وَمَا كَانَ لَهُ عَلَيْهِم مِّن سُلْطَانٍ إِلَّا لِنَعْلَمَ مَن يُؤْمِنُ بِالْآخِرَةِ مِمَّنْ هُوَ مِنْهَا فِي شَكٍّ ۗ وَرَبُّكَ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ حَفِيظٌ
और शैतान का उन लोगों पर कुछ क़ाबू तो था नहीं मगर ये (मतलब था) कि हम उन लोगों को जो आख़ेरत का यक़ीन रखते हैं उन लोगों से अलग देख लें जो उसके बारे में शक में (पड़े) हैं और तुम्हारा परवरदिगार तो हर चीज़ का निगरॉ है
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अनुवाद — सबा 19

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Tuesday, August 18, 2026

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