अज़-ज़ुमर · 8/75
अनुवाद उच्चारण — अज़-ज़ुमर
۞ وَإِذَا مَسَّ الْإِنسَانَ ضُرٌّ دَعَا رَبَّهُ مُنِيبًا إِلَيْهِ ثُمَّ إِذَا خَوَّلَهُ نِعْمَةً مِّنْهُ نَسِيَ مَا كَانَ يَدْعُو إِلَيْهِ مِن قَبْلُ وَجَعَلَ لِلَّهِ أَندَادًا لِّيُضِلَّ عَن سَبِيلِهِ ۚ قُلْ تَمَتَّعْ بِكُفْرِكَ قَلِيلًا ۖ إِنَّكَ مِنْ أَصْحَابِ النَّارِ ۝٨
Wa izaa massal insaana durrun da`aa Rabbahoo muneeban ilaihi summa izaa khawwalahoo ni`matam minhu nasiya maa kaana yad`ooo ilaihi min qablu wa ja`ala lillaahi andaadal liyudilla `ansabeelih; qul tamatta` bikufrika qaleelan innaka min Ashaabin Naar
📖 हिंदी अर्थ
और आदमी (की हालत तो ये है कि) जब उसको कोई तकलीफ पहुँचती है तो उसी की तरफ रूजू करके अपने परवरदिगार से दुआ करता है (मगर) फिर जब खुदा अपनी तरफ से उसे नेअमत अता फ़रमा देता है तो जिस काम के लिए पहले उससे दुआ करता था उसे भुला देता है और बल्कि खुदा का शरीक बनाने लगता है ताकि (उस ज़रिए से और लोगों को भी) उसकी राह से गुमराह कर दे (ऐ रसूल ऐसे शख्स से) कह दो कि थोड़े दिनों और अपने कुफ्र (की हालत) में चैन कर लो
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • ضُرٌّ: कष्ट, बीमारी, तंगी या कोई मुसीबत।
  • مُنِيبًا: रुजू करने वाला, अकेले अल्लाह की ओर झुकने वाला।
  • خَوَّلَهُ: उसे अता किया, दिया।
  • أَندَادًا: समकक्ष, साझीदार (जिन्हें अल्लाह के बराबर ठहराया जाए)।
  • لِيُضِلَّ عَن سَبِيلِهِ: ताकि (लोगों को) अल्लाह के रास्ते से भटकाए।

तफसीर:

जब इंसान पर कोई मुसीबत आती है—चाहे वह बीमारी हो, माल का नुकसान हो, डूबने का डर हो या कोई और परेशानी—तो वह अपने रब को पुकारता है, अकेले उसी की ओर रुजू होता है और उसी से मदद माँगता है। लेकिन जब अल्लाह उस पर अपनी रहमत से कोई नेमत डालता है और उसकी मुसीबत दूर कर देता है, तो वह उन दुआओं और गिड़गिड़ाहट को भूल जाता है जो पहले उसने की थीं। न केवल यह, बल्कि वह अल्लाह के साथ दूसरों को साझीदार ठहराने लगता है—मूर्तियों, लोगों या दुनिया की चीज़ों को—ताकि वह खुद भी अल्लाह के रास्ते से भटके और दूसरों को भी भटकाए। यह इंसान की कृतघ्नता और नाइंशुक्री की चरम सीमा है।

अल्लाह तआला इस किस्म के इंसान को नसीहत और चेतावनी के तौर पर कहता है: "ऐ नबी! इससे कह दो कि अपने कुफ्र में थोड़ा सा मज़े ले ले—यह दुनिया की ज़िंदगी बहुत छोटी है, चंद रोज़ की है। जल्द ही तेरी मौत आ जाएगी और तेरी मुद्दत पूरी हो जाएगी। फिर तू आग में जाने वालों में से है, और वहाँ तेरा ठिकाना हमेशा के लिए होगा।"

यह आयत हमें सिखाती है कि इंसान को चाहिए कि वह सिर्फ मुसीबत के वक्त ही अल्लाह को याद न करे, बल्कि खुशहाली और नेमतों के वक्त भी उसका शुक्र अदा करे। अल्लाह वही है जो मुसीबत में काम आता है और नेमत देने वाला भी वही है। उसे भूलकर दूसरों की तरफ मुड़ना सबसे बड़ी नादानी है। याद रखो, यह दुनिया की खुशियाँ और मज़े बहुत थोड़े हैं, लेकिन आख़िरत का अज़ाब बहुत बड़ा और हमेशा रहने वाला है। अल्लाह की रहमत और उसकी पकड़ दोनों ही बेहद करीब हैं—अपने रब से जुड़े रहो, हर हाल में उसी का शुक्र करो, और उसके साथ किसी को साझीदार मत बनाओ। यही कामयाबी की राह है।

🎧 सुनें

📜 आयत 6-10 — अज़-ज़ुमर

6خَلَقَكُم مِّن نَّفْسٍ وَاحِدَةٍ ثُمَّ جَعَلَ مِنْهَا زَوْجَهَا وَأَنزَلَ لَكُم مِّنَ الْأَنْعَامِ ثَمَانِيَةَ أَزْوَاجٍ ۚ يَخْلُقُكُمْ فِي بُطُونِ أُمَّهَاتِكُمْ خَلْقًا مِّن بَعْدِ خَلْقٍ فِي ظُلُمَاتٍ ثَلَاثٍ ۚ ذَٰلِكُمُ اللَّهُ رَبُّكُمْ لَهُ الْمُلْكُ ۖ لَا إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ ۖ فَأَنَّىٰ تُصْرَفُونَ
उसी ने तुम सबको एक ही शख्स से पैदा किया फिर उस (की बाक़ी मिट्टी) से उसकी बीबी (हौव्वा) को पैदा किया और उसी ने तुम्हारे लिए आठ क़िस्म के चारपाए पैदा किए वही तुमको तुम्हारी माँओं के पेट में एक क़िस्म की पैदाइश के बाद दूसरी क़िस्म (नुत्फे जमा हुआ खून लोथड़ा) की पैदाइश से तेहरे तेहरे अंधेरों (पेट) रहम और झिल्ली में पैदा करता है वही अल्लाह तुम्हारा परवरदिगार है उसी की बादशाही है उसके सिवा माबूद नहीं तो तुम लोग कहाँ फिरे जाते हो
7إِن تَكْفُرُوا فَإِنَّ اللَّهَ غَنِيٌّ عَنكُمْ ۖ وَلَا يَرْضَىٰ لِعِبَادِهِ الْكُفْرَ ۖ وَإِن تَشْكُرُوا يَرْضَهُ لَكُمْ ۗ وَلَا تَزِرُ وَازِرَةٌ وِزْرَ أُخْرَىٰ ۗ ثُمَّ إِلَىٰ رَبِّكُم مَّرْجِعُكُمْ فَيُنَبِّئُكُم بِمَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ ۚ إِنَّهُ عَلِيمٌ بِذَاتِ الصُّدُورِ
अगर तुमने उसकी नाशुक्री की तो (याद रखो कि) खुदा तुमसे बिल्कुल बेपरवाह है और अपने बन्दों से कुफ्र और नाशुक्री को पसन्द नहीं करता और अगर तुम शुक्र करोगे तो वह उसको तुम्हारे वास्ते पसन्द करता है और (क़यामत में) कोई किसी (के गुनाह) का बोझ (अपनी गर्दन पर) नहीं उठाएगा फिर तुमको अपने परवरदिगार की तरफ लौटना है तो (दुनिया में) जो कुछ (भला बुरा) करते थे वह तुम्हें बता देगा वह यक़ीनन दिलों के राज़ (तक) से खूब वाक़िफ है
8۞ وَإِذَا مَسَّ الْإِنسَانَ ضُرٌّ دَعَا رَبَّهُ مُنِيبًا إِلَيْهِ ثُمَّ إِذَا خَوَّلَهُ نِعْمَةً مِّنْهُ نَسِيَ مَا كَانَ يَدْعُو إِلَيْهِ مِن قَبْلُ وَجَعَلَ لِلَّهِ أَندَادًا لِّيُضِلَّ عَن سَبِيلِهِ ۚ قُلْ تَمَتَّعْ بِكُفْرِكَ قَلِيلًا ۖ إِنَّكَ مِنْ أَصْحَابِ النَّارِ
और आदमी (की हालत तो ये है कि) जब उसको कोई तकलीफ पहुँचती है तो उसी की तरफ रूजू करके अपने परवरदिगार से दुआ करता है (मगर) फिर जब खुदा अपनी तरफ से उसे नेअमत अता फ़रमा देता है तो जिस काम के लिए पहले उससे दुआ करता था उसे भुला देता है और बल्कि खुदा का शरीक बनाने लगता है ताकि (उस ज़रिए से और लोगों को भी) उसकी राह से गुमराह कर दे (ऐ रसूल ऐसे शख्स से) कह दो कि थोड़े दिनों और अपने कुफ्र (की हालत) में चैन कर लो
9أَمَّنْ هُوَ قَانِتٌ آنَاءَ اللَّيْلِ سَاجِدًا وَقَائِمًا يَحْذَرُ الْآخِرَةَ وَيَرْجُو رَحْمَةَ رَبِّهِ ۗ قُلْ هَلْ يَسْتَوِي الَّذِينَ يَعْلَمُونَ وَالَّذِينَ لَا يَعْلَمُونَ ۗ إِنَّمَا يَتَذَكَّرُ أُولُو الْأَلْبَابِ
(आख़िर) तू यक़ीनी जहन्नुमियों में होगा क्या जो शख्स रात के अवक़ात में सजदा करके और खड़े-खड़े (खुदा की) इबादत करता हो और आख़ेरत से डरता हो अपने परवरदिगार की रहमत का उम्मीदवार हो (नाशुक्रे) काफिर के बराबर हो सकता है (ऐ रसूल) तुम पूछो तो कि भला कहीं जानने वाले और न जाननेवाले लोग बराबर हो सकते हैं (मगर) नसीहत इबरतें तो बस अक्लमन्द ही लोग मानते हैं
10قُلْ يَا عِبَادِ الَّذِينَ آمَنُوا اتَّقُوا رَبَّكُمْ ۚ لِلَّذِينَ أَحْسَنُوا فِي هَٰذِهِ الدُّنْيَا حَسَنَةٌ ۗ وَأَرْضُ اللَّهِ وَاسِعَةٌ ۗ إِنَّمَا يُوَفَّى الصَّابِرُونَ أَجْرَهُم بِغَيْرِ حِسَابٍ
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि ऐ मेरे ईमानदार बन्दों अपने परवरदिगार (ही) से डरते रहो (क्योंकि) जिन लोगों ने इस दुनिया में नेकी की उन्हीं के लिए (आख़ेरत में) भलाई है और खुदा की ज़मीन तो कुशादा है (जहाँ इबादत न कर सको उसे छोड़ दो) सब्र करने वालों ही की तो उनका भरपूर बेहिसाब बदला दिया जाएगा
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अनुवाद — अज़-ज़ुमर 8

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Tuesday, August 18, 2026

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