Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- تَوَفَّاهُمُ الْمَلَائِكَةُ: फ़रिश्ते उनकी रूह क़ब्ज़ करते हैं।
- ظَالِمِي أَنفُسِهِمْ: अपनी आत्माओं पर ज़ुल्म करने वाले (यानी हिजरत न करके अपने आपको नुक़सान में डालने वाले)।
- مُسْتَضْعَفِينَ: कमज़ोर और विवश समझे जाने वाले।
- فِيمَ كُنتُمْ: तुम किस हाल में थे? (तुम्हारा दीन किस स्थिति में था?)
- مَأْوَاهُمْ: उनका ठिकाना और निवास स्थान।
- مَصِيرًا: अंजाम और लौटने की जगह।
तफ़सीर (व्याख्या):
यह आयत उन लोगों के बारे में है जिन्होंने इस्लाम तो क़बूल किया, लेकिन जब हिजरत (प्रवास) फ़र्ज़ थी, तो उन्होंने कुफ़्र के शहर में रहना पसंद किया और दीन की ख़ातिर अपनी जान और माल को ख़तरे में डाला। जब फ़रिश्ते उनकी रूह क़ब्ज़ करते हैं, तो वे उनसे पूछते हैं: "तुम किस हाल में थे? तुमने अपने दीन के बारे में क्या किया?" यह सवाल उन्हें झिड़कने और मलामत करने के लिए होता है।
वे जवाब देते हैं: "हम धरती पर कमज़ोर और विवश थे, हमारे पास कोई ताक़त नहीं थी कि हम अपने दीन पर अमल कर सकें या हिजरत कर सकें।" लेकिन फ़रिश्ते उनके इस बहाने को क़ुबूल नहीं करते और कहते हैं: "क्या अल्लाह की ज़मीन वसीह (विस्तृत) नहीं थी? क्या तुम दूसरे शहर में हिजरत नहीं कर सकते थे, जहाँ तुम अपने दीन पर आज़ादी से अमल कर सकते?" यानी उनके पास हिजरत का रास्ता मौजूद था, लेकिन उन्होंने आलस और दुनियावी मोहब्बत की वजह से उसे अपनाया नहीं।
इसलिए अल्लाह तआला फ़रमाता है कि ऐसे लोगों का ठिकाना जहन्नम है, और वह बहुत बुरा अंजाम है। यह आयत उन लोगों के लिए सख़्त चेतावनी है जो दीन की ख़ातिर क़ुर्बानी देने से कतराते हैं और दुनिया की आसानी को आख़िरत की कामयाबी पर तरजीह देते हैं।
दावती पहलू (प्रेरणादायक संदेश):
यह आयत हमें सिखाती है कि इस्लाम सिर्फ़ ज़ुबान से कहने का नाम नहीं, बल्कि अमल और क़ुर्बानी का नाम है। अल्लाह ने अपने बंदों को ज़मीन पर आज़ादी दी है ताकि वे अपने दीन की हिफ़ाज़त कर सकें। अगर किसी जगह दीन पर अमल मुमकिन न हो, तो हिजरत करना फ़र्ज़ है। यह आयत हमें यह भी सिखाती है कि बहाने बनाने से काम नहीं चलेगा, अल्लाह हर इंसान की हैसियत और उसकी सच्ची मजबूरी को जानता है। जो लोग सच्चे दिल से अल्लाह की राह में निकलते हैं, अल्लाह उनके लिए ज़मीन में गुंजाइश पैदा कर देता है। इसलिए हमें चाहिए कि हम अपने दीन की ख़ातिर हर क़ुर्बानी देने के लिए तैयार रहें, क्योंकि आख़िरत की कामयाबी ही असली कामयाबी है। अल्लाह हमें सच्ची समझ और अमल की तौफ़ीक़ दे। आमीन।
📜 आयत 95-99 — सूरा अन-निसा
अनुवाद — अन-निसा 97
सूरा अन-निसा आयत 97 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : बेशक जिन लोगों की क़ब्जे रूह फ़रिश्ते ने उस वक़त…सूरा आयत 97/176 — सूरा अन-निसा النساء (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अन-निसा सुनें, सूरा अन-निसा अनुवाद, सूरा अन-निसा mp3, सूरा अन-निसा pdf. आयत 95–99. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Tuesday, September 29, 2026
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