अन-निसा · 96/176
अनुवाद उच्चारण — अन-निसा
دَرَجَاتٍ مِّنْهُ وَمَغْفِرَةً وَرَحْمَةً ۚ وَكَانَ اللَّهُ غَفُورًا رَّحِيمًا ۝٩٦
Darajaatim minhu wa maghfiratanw wa rahmah; wa kaanal laahu Ghafoorar Raheema
📖 हिंदी अर्थ
(यानी उन्हें) अपनी तरफ़ से बड़े बड़े दरजे और बख्शिश और रहमत (अता फ़रमाएगा) और ख़ुदा तो बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • دَرَجَاتٍ: ऊँचे दर्जे, एक से बढ़कर एक स्तर।
  • مَغْفِرَةً: पापों की क्षमा।
  • رَحْمَةً: विशेष दया और करुणा।
  • غَفُورًا: अत्यधिक क्षमा करने वाला।
  • رَحِيمًا: अत्यंत दयालु।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत उन मुजाहिदीन (अल्लाह के मार्ग में जिहाद करने वालों) के लिए उस महान प्रतिफल का वर्णन कर रही है, जो अल्लाह ने उनके लिए तैयार किया है। अल्लाह तआला उन्हें ऊँचे-ऊँचे दर्जे प्रदान करेगा, जो जन्नत में एक-दूसरे से बढ़कर होंगे। ये दर्जे उनकी नीयत, सब्र और कुर्बानी के अनुसार अलग-अलग होंगे। साथ ही, अल्लाह उनके गुनाहों को माफ कर देगा और उन पर अपनी विशेष रहमत बरसाएगा, जिससे वे हर परेशानी और खौफ से महफूज़ रहेंगे।

अल्लाह तआला ने यह भी बताया कि वह ग़फूर (बहुत क्षमा करने वाला) है, यानी वह अपने बंदों की कमियों और चूक को दरगुज़र कर देता है, बशर्ते वे सच्चे दिल से तौबा करें। वह रहीम (अत्यंत दयालु) है, यानी उसकी रहमत उन्हें घेर लेती है जो उसकी इताअत (आज्ञाकारिता) में जान लड़ा देते हैं। यह आयत मुसलमानों को बताती है कि अल्लाह के रास्ते में किया गया हर कदम, हर त्याग और हर मुश्किल बेकार नहीं जाती—बल्कि उसका इनाम अल्लाह के पास सुरक्षित है, जो दुनिया की किसी चीज़ से बेहतर है।

दावती पहलू:

यह आयत हर मोमिन के दिल में जोश और उम्मीद पैदा करती है कि अल्लाह की राह में उठाया गया कष्ट कभी रायगाँ नहीं जाता। जो लोग अपने ईमान, अपने धर्म और अपनी उम्मत की खातिर मेहनत करते हैं, अल्लाह उन्हें न सिर्फ दुनिया में इज़्ज़त देता है, बल्कि आख़िरत में उनके लिए ऐसे दर्जे तैयार हैं जिनका अंदाज़ा कोई नहीं लगा सकता। यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह की रहमत उसके ग़ुस्से से कहीं ज़्यादा है—वह चाहता है कि उसके बंदे उसकी ओर लौटें, उस पर भरोसा करें और उसकी राह में कुर्बानी देने से न हिचकिचाएँ। इसलिए हमें चाहिए कि हम अपनी ज़िंदगी के हर मैदान में—चाहे वह इल्म हो, माल हो, वक़्त हो या ताकत—अल्लाह की राह में लगाएँ, क्योंकि उसका इनाम बेहतरीन और हमेशा रहने वाला है।

🎧 सुनें

📜 आयत 94-98 — अन-निसा

94يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا إِذَا ضَرَبْتُمْ فِي سَبِيلِ اللَّهِ فَتَبَيَّنُوا وَلَا تَقُولُوا لِمَنْ أَلْقَىٰ إِلَيْكُمُ السَّلَامَ لَسْتَ مُؤْمِنًا تَبْتَغُونَ عَرَضَ الْحَيَاةِ الدُّنْيَا فَعِندَ اللَّهِ مَغَانِمُ كَثِيرَةٌ ۚ كَذَٰلِكَ كُنتُم مِّن قَبْلُ فَمَنَّ اللَّهُ عَلَيْكُمْ فَتَبَيَّنُوا ۚ إِنَّ اللَّهَ كَانَ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرًا
ऐ ईमानदारों जब तुम ख़ुदा की राह में (जेहाद करने को) सफ़र करो तो (किसी के क़त्ल करने में जल्दी न करो बल्कि) अच्छी तरह जॉच कर लिया करो और जो शख्स (इज़हारे इस्लाम की ग़रज़ से) तुम्हे सलाम करे तो तुम बे सोचे समझे न कह दिया करो कि तू ईमानदार नहीं है (इससे ज़ाहिर होता है) कि तुम (फ़क्त) दुनियावी आसाइश की तमन्ना रखते हो मगर इसी बहाने क़त्ल करके लूट लो और ये नहीं समझते कि (अगर यही है) तो ख़ुदा के यहॉ बहुत से ग़नीमतें हैं (मुसलमानों) पहले तुम ख़ुद भी तो ऐसे ही थे फिर ख़ुदा ने तुमपर एहसान किया (कि बेखटके मुसलमान हो गए) ग़रज़ ख़ूब छानबीन कर लिया करो बेशक ख़ुदा तुम्हारे हर काम से ख़बरदार है
95لَّا يَسْتَوِي الْقَاعِدُونَ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ غَيْرُ أُولِي الضَّرَرِ وَالْمُجَاهِدُونَ فِي سَبِيلِ اللَّهِ بِأَمْوَالِهِمْ وَأَنفُسِهِمْ ۚ فَضَّلَ اللَّهُ الْمُجَاهِدِينَ بِأَمْوَالِهِمْ وَأَنفُسِهِمْ عَلَى الْقَاعِدِينَ دَرَجَةً ۚ وَكُلًّا وَعَدَ اللَّهُ الْحُسْنَىٰ ۚ وَفَضَّلَ اللَّهُ الْمُجَاهِدِينَ عَلَى الْقَاعِدِينَ أَجْرًا عَظِيمًا
माज़ूर लोगों के सिवा जेहाद से मुंह छिपा के घर में बैठने वाले और ख़ुदा की राह में अपने जान व माल से जिहाद करने वाले हरगिज़ बराबर नहीं हो सकते (बल्कि) अपने जान व माल से जिहाद करने वालों को घर बैठे रहने वालें पर ख़ुदा ने दरजे के एतबार से बड़ी फ़ज़ीलत दी है (अगरचे) ख़ुदा ने सब ईमानदारों से (ख्वाह जिहाद करें या न करें) भलाई का वायदा कर लिया है मगर ग़ाज़ियों को खाना नशीनों पर अज़ीम सवाब के एतबार से ख़ुदा ने बड़ी फ़ज़ीलत दी है
96دَرَجَاتٍ مِّنْهُ وَمَغْفِرَةً وَرَحْمَةً ۚ وَكَانَ اللَّهُ غَفُورًا رَّحِيمًا
(यानी उन्हें) अपनी तरफ़ से बड़े बड़े दरजे और बख्शिश और रहमत (अता फ़रमाएगा) और ख़ुदा तो बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है
97إِنَّ الَّذِينَ تَوَفَّاهُمُ الْمَلَائِكَةُ ظَالِمِي أَنفُسِهِمْ قَالُوا فِيمَ كُنتُمْ ۖ قَالُوا كُنَّا مُسْتَضْعَفِينَ فِي الْأَرْضِ ۚ قَالُوا أَلَمْ تَكُنْ أَرْضُ اللَّهِ وَاسِعَةً فَتُهَاجِرُوا فِيهَا ۚ فَأُولَٰئِكَ مَأْوَاهُمْ جَهَنَّمُ ۖ وَسَاءَتْ مَصِيرًا
बेशक जिन लोगों की क़ब्जे रूह फ़रिश्ते ने उस वक़त की है कि (दारूल हरब में पड़े) अपनी जानों पर ज़ुल्म कर रहे थे और फ़रिश्ते कब्जे रूह के बाद हैरत से कहते हैं तुम किस (हालत) ग़फ़लत में थे तो वह (माज़ेरत के लहजे में) कहते है कि हम तो रूए ज़मीन में बेकस थे तो फ़रिश्ते कहते हैं कि ख़ुदा की (ऐसी लम्बी चौड़ी) ज़मीन में इतनी सी गुन्जाइश न थी कि तुम (कहीं) हिजरत करके चले जाते पस ऐसे लोगों का ठिकाना जहन्नुम है और वह बुरा ठिकाना है
98إِلَّا الْمُسْتَضْعَفِينَ مِنَ الرِّجَالِ وَالنِّسَاءِ وَالْوِلْدَانِ لَا يَسْتَطِيعُونَ حِيلَةً وَلَا يَهْتَدُونَ سَبِيلًا
मगर जो मर्द और औरतें और बच्चे इस क़दर बेबस हैं कि न तो (दारूल हरब से निकलने की) काई तदबीर कर सकते हैं और उनकी रिहाई की कोई राह दिखाई देती है
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अनुवाद — अन-निसा 96

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Tuesday, August 18, 2026

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