मगर जो मर्द और औरतें और बच्चे इस क़दर बेबस हैं कि न तो (दारूल हरब से निकलने की) काई तदबीर कर सकते हैं और उनकी रिहाई की कोई राह दिखाई देती है
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
الْمُسْتَضْعَفِينَ: वे कमज़ोर और दबे-कुचले लोग जिनमें कोई ताकत न हो।
حِيلَةً: कोई उपाय, युक्ति या तरकीब।
يَهْتَدُونَ سَبِيلًا: रास्ता पाना, मार्गदर्शन पाना, यहाँ अर्थ है किसी ऐसे रास्ते का पता होना जिससे वे अपनी मुश्किल से निकल सकें।
तफ़सीर (व्याख्या):
इस आयत में अल्लाह तआला ने उन लोगों को इस कठोर वाद (धमकी) से माफ़ी का वादा किया है, जो सच्चे दिल से ईमान लाए थे और हिजरत (प्रवास) करना चाहते थे, लेकिन उनकी स्थितियाँ उन्हें ऐसा करने से रोक रही थीं। ये वे कमज़ोर लोग हैं — चाहे वे पुरुष हों, स्त्रियाँ हों या बच्चे — जिनके पास न तो कोई ताकत है कि वे अपने ऊपर होने वाले अत्याचार और ज़ुल्म को रोक सकें, और न ही वे कोई उपाय जानते हैं जिससे वे अपनी इस कठिनाई से बच सकें। उन्हें न तो हिजरत का रास्ता मालूम है और न ही उनके पास इसे अंजाम देने की सामर्थ्य है। वे मजबूरी में उसी हाल में रह गए हैं, जबकि उनके दिल ईमान पर साबित हैं। ऐसे लोगों के लिए अल्लाह ने माफ़ी और क्षमा का वादा किया है, क्योंकि अल्लाह उनकी मजबूरी और लाचारी को भली-भाँति जानता है। वह अपने बंदों पर बड़ा दयालु और क्षमाशील है।
फ़ायदे (शिक्षाएँ):
इस आयत से हमें यह सीख मिलती है कि अल्लाह तआला अपने बंदों की मजबूरियों को समझता है और उन पर रहम करता है। वह किसी पर उसकी ताकत से ज़्यादा बोझ नहीं डालता।
यह हमें सिखाती है कि इस्लाम में नीयत और दिल की पवित्रता की बहुत अहमियत है। जो व्यक्ति सच्चे दिल से भलाई चाहता है, लेकिन उसके हाथ में कुछ नहीं है, अल्लाह उसे उसकी नीयत के अनुसार बदला देता है।
यह आयत हमें समाज में कमज़ोर लोगों — महिलाओं, बच्चों और बेबस लोगों — के प्रति हमदर्दी और सहानुभूति रखने की तालीम देती है, और यह कि हमें उनकी मदद के लिए आगे आना चाहिए।
यह हमें यह भी सिखाती है कि अल्लाह की रहमत बहुत विस्तृत है और वह हर उस इंसान को अपनी रहमत से नवाज़ता है जो अपनी सच्ची मजबूरी के कारण कोई अच्छा काम नहीं कर पाता।
बेशक जिन लोगों की क़ब्जे रूह फ़रिश्ते ने उस वक़त की है कि (दारूल हरब में पड़े) अपनी जानों पर ज़ुल्म कर रहे थे और फ़रिश्ते कब्जे रूह के बाद हैरत से कहते हैं तुम किस (हालत) ग़फ़लत में थे तो वह (माज़ेरत के लहजे में) कहते है कि हम तो रूए ज़मीन में बेकस थे तो फ़रिश्ते कहते हैं कि ख़ुदा की (ऐसी लम्बी चौड़ी) ज़मीन में इतनी सी गुन्जाइश न थी कि तुम (कहीं) हिजरत करके चले जाते पस ऐसे लोगों का ठिकाना जहन्नुम है और वह बुरा ठिकाना है
और जो शख्स ख़ुदा की राह में हिजरत करेगा तो वह रूए ज़मीन में बा फ़राग़त (चैन से रहने सहने के) बहुत से कुशादा मक़ाम पाएगा और जो शख्स अपने घर से जिलावतन होके ख़ुदा और उसके रसूल की तरफ़ निकल ख़ड़ा हुआ फिर उसे (मंज़िले मक़सूद) तक पहुंचने से पहले मौत आ जाए तो ख़ुदा पर उसका सवाब लाज़िम हो गया और ख़ुदा तो बड़ा बख्श ने वाला मेहरबान है ही
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