अल-आराफ · 206/206
अनुवाद उच्चारण — अल-आराफ
إِنَّ الَّذِينَ عِندَ رَبِّكَ لَا يَسْتَكْبِرُونَ عَنْ عِبَادَتِهِ وَيُسَبِّحُونَهُ وَلَهُ يَسْجُدُونَ ۩ ۝٢٠٦
Innal lazeena `inda Rabbika laa yastakbiroona `an `ibaadatihee wa yusabbihoonahoo wa lahoo yasjudoon
📖 हिंदी अर्थ
बेशक जो लोग (फरिशते बग़ैरह) तुम्हारे परवरदिगार के पास मुक़र्रिब हैं और वह उसकी इबादत से सर कशी नही करते और उनकी तसबीह करते हैं और उसका सजदा करते हैं (206) सजदा
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • لَا يَسْتَكْبِرُونَ: अभिमान नहीं करते, घमंड नहीं करते।
  • عِبَادَتِهِ: उसकी इबादत (बंदगी) से।
  • يُسَبِّحُونَهُ: उसकी तस्बीह करते हैं, यानी उसे हर ऐब और कमी से पाक (पवित्र) बताते हैं।
  • يَسْجُدُونَ: सजदा करते हैं।

तफसीर (व्याख्या):

हे नबी! जो फ़रिश्ते तेरे रब की बारगाह में हैं, वे उसकी इबादत से कभी अभिमान नहीं करते। वे उसके हुक्म के आगे पूरी तरह सरेंडर (आत्मसमर्पण) कर चुके हैं, और न तो उसकी इबादत में कोई कसर रखते हैं और न ही उससे ऊबते हैं। वे दिन-रात उसकी तस्बीह करते हैं, यानी उसे हर उस चीज़ से पाक और मुबर्रा (पवित्र) ठहराते हैं जो उसके शान के लायक़ नहीं है। और वे सिर्फ़ उसी के लिए सजदा करते हैं, किसी और के आगे नहीं। यह बात उन लोगों के लिए एक तनबीह (चेतावनी) है जो इबादत से सरकशी (विद्रोह) करते हैं और अभिमान की वजह से सजदे से इनकार करते हैं। फ़रिश्ते, जो अल्लाह के सबसे क़रीबी और मुकर्रब (सम्मानित) हैं, इस हाल में हैं कि वे हुक्म की तामील (पालन) में सजदा करते हैं, तो इंसान को चाहिए कि वह उनसे बढ़कर अल्लाह के आगे झुके और उसकी इबादत में कोई कमी न करे। इसी लिए जब यह आयत पढ़ी जाए तो सजदा करना सुन्नत है, क्योंकि यहाँ सजदे का हुक्म दिया गया है।

फ़ायदे (सबक़):

  1. फ़रिश्ते अल्लाह के सबसे नेक और पाक बंदे हैं, और उनकी सबसे बड़ी सिफ़त (गुण) यह है कि वे इबादत में अभिमान नहीं करते। इससे हमें सबक़ मिलता है कि इंसान को चाहिए कि वह अल्लाह की इबादत में पूरी फ़रमाँबरदारी (आज्ञाकारिता) अपनाए और घमंड से बचे।
  2. तस्बीह (अल्लाह की पाकी बयान करना) एक ऐसा ज़िक्र है जो फ़रिश्ते लगातार करते हैं। हमें भी चाहिए कि अपनी ज़ुबान को अल्लाह की तस्बीह और हम्द (प्रशंसा) से तर रखें।
  3. सजदा इंसान की अल्लाह से सबसे क़रीबी हालत है। फ़रिश्तों का सजदा करना हमें बताता है कि हमें भी अल्लाह के आगे झुकने में कोई शर्म या अभिमान नहीं करना चाहिए, बल्कि इसे अपनी इज़्ज़त और सरबुलंदी (ऊँचाई) समझना चाहिए।
  4. यह आयत हमें यह भी सिखाती है कि अल्लाह की इबादत में कोई भी इंसान, चाहे वह कितना भी बड़ा हो, अभिमान नहीं कर सकता। जो लोग इबादत से मुँह मोड़ते हैं, वे फ़रिश्तों से भी बदतर हैं, क्योंकि फ़रिश्ते तो हमेशा इबादत में मशगूल रहते हैं।
🎧 सुनें

📜 आयत 204-206 — अल-आराफ

204وَإِذَا قُرِئَ الْقُرْآنُ فَاسْتَمِعُوا لَهُ وَأَنصِتُوا لَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَ
और ईमानदार लोगों के वास्ते हिदायत और रहमत हैं (लोगों) जब क़ुरान पढ़ा जाए तो कान लगाकर सुनो और चुपचाप रहो ताकि (इसी बहाने) तुम पर रहम किया जाए
205وَاذْكُر رَّبَّكَ فِي نَفْسِكَ تَضَرُّعًا وَخِيفَةً وَدُونَ الْجَهْرِ مِنَ الْقَوْلِ بِالْغُدُوِّ وَالْآصَالِ وَلَا تَكُن مِّنَ الْغَافِلِينَ
और अपने परवरदिगार को अपने जी ही में गिड़गिड़ा के और डर के और बहुत चीख़ के नहीं (धीमी) आवाज़ से सुबह व शाम याद किया करो और (उसकी याद से) ग़ाफिल बिल्कुल न हो जाओ
206إِنَّ الَّذِينَ عِندَ رَبِّكَ لَا يَسْتَكْبِرُونَ عَنْ عِبَادَتِهِ وَيُسَبِّحُونَهُ وَلَهُ يَسْجُدُونَ ۩
बेशक जो लोग (फरिशते बग़ैरह) तुम्हारे परवरदिगार के पास मुक़र्रिब हैं और वह उसकी इबादत से सर कशी नही करते और उनकी तसबीह करते हैं और उसका सजदा करते हैं (206) सजदा
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अनुवाद — अल-आराफ 206

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Tuesday, August 18, 2026

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