Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- تَضَرُّعًا: अत्यधिक विनम्रता, गिड़गिड़ाहट और आजिज़ी के साथ।
- خِيفَةً: डर और खौफ के साथ (अल्लाह के सामने दिल में उसका भय)।
- دُونَ الْجَهْرِ مِنَ الْقَوْلِ: ऊँची आवाज़ से कम, यानी मध्यम स्वर में, न बहुत धीमा और न बहुत ऊँचा।
- بِالْغُدُوِّ: सुबह के समय (सुबह की शुरुआत में)।
- وَالْآصَالِ: शाम के समय (असर के बाद से मग़रिब तक का वक़्त) — यह "أَصِيل" का बहुवचन है।
- الْغَافِلِينَ: वे लोग जो अल्लाह की याद से बेखबर और लापरवाह हों।
तफ़सीर (व्याख्या):
ऐ नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम)! अपने रब को अपने दिल में याद करो — सिर्फ ज़ुबान से नहीं, बल्कि पूरे वजूद के साथ। यह याद ऐसी हो जिसमें गिड़गिड़ाहट और विनम्रता हो, और दिल में अल्लाह का खौफ़ और डर हो। यानी तुम्हारी याद सिर्फ एक रस्म न हो, बल्कि दिल की गहराइयों से निकली हुई हो, जिसमें तुम अपनी कमज़ोरी और अल्लाह की अज़मत का एहसास करो।
साथ ही, अपनी दुआ और ज़िक्र में आवाज़ को मध्यम रखो — न इतना ऊँचा कि शोर हो, और न इतना धीमा कि सुनाई ही न दे। बल्कि बीच का रास्ता अपनाओ। और इस याद के लिए सबसे अच्छा वक़्त सुबह और शाम है — दिन की शुरुआत और दिन का अंत — क्योंकि इन दोनों वक़्तों में दिल और दिमाग़ ज़्यादा सकून की हालत में होते हैं और इबादत के लिए बेहतर होते हैं।
और खबरदार! उन लोगों में मत होना जो अल्लाह की याद से ग़ाफ़िल हैं — जो दिन भर की मशरूफ़ियात में खोकर अपने रब को भूल जाते हैं। यह आदेश सिर्फ नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के लिए नहीं, बल्कि हर मोमिन के लिए है कि वह अपने जीवन के हर पल में अल्लाह को याद रखे।
फ़ायदे (सबक़ और नसीहतें):
- दिल से जुड़ी याद की अहमियत: अल्लाह की याद सिर्फ ज़ुबान से नहीं, बल्कि दिल और दिमाग़ से होनी चाहिए। जब दिल अल्लाह की याद में डूब जाता है, तो इंसान की पूरी ज़िंदगी में सुकून और रहमत आती है।
- खौफ़ और उम्मीद का तवाज़ुन: मोमिन को अल्लाह से मुहब्बत भी करनी चाहिए और उसका खौफ़ भी दिल में रखना चाहिए। यही वह नाज़ुक संतुलन है जो इंसान को गुनाहों से रोकता है और नेकियों की तरफ़ बढ़ाता है।
- आवाज़ का एतिदाल: इस्लाम हर मामले में बीच का रास्ता सिखाता है — चाहे इबादत हो या ज़िंदगी का कोई और पहलू। ज़्यादा ऊँची आवाज़ में दुआ करना और बिल्कुल ख़ामोश रहना — दोनों के बीच संतुलन ही बेहतरीन तरीक़ा है।
- सुबह-शाम की याद की बरकत: सुबह और शाम का वक़्त अल्लाह की याद के लिए बहुत अफ़ज़ल है। यही वजह है कि इस्लाम में सुबह-शाम की दुआएँ और अज़कार बहुत ज़ोर दिए गए हैं — ये इंसान को पूरे दिन अल्लाह की हिफ़ाज़त में रखते हैं।
- ग़फ़लत से बचाव: यह आयत हमें सिखाती है कि दुनिया की मशरूफ़ियात हमें अल्लाह की याद से ग़ाफ़िल न करें। जो इंसान अल्लाह को याद रखता है, अल्लाह भी उसे याद रखता है और उसकी हर मुश्किल में उसका साथ देता है।
📜 आयत 203-206 — सूरा अल-आराफ
अनुवाद — अल-आराफ 205
सूरा अल-आराफ आयत 205 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : और अपने परवरदिगार को अपने जी ही में गिड़गिड़ा के…सूरा आयत 205/206 — सूरा अल-आराफ الأعراف (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अल-आराफ सुनें, सूरा अल-आराफ अनुवाद, सूरा अल-आराफ mp3, सूरा अल-आराफ pdf. आयत 203–206. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Sunday, October 4, 2026
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