अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- لِيَنفِرُوا كَافَّةً: सभी मिलकर (जिहाद के लिए) निकल पड़ें।
- فَلَوْلَا: ऐसा क्यों नहीं होता? (यहाँ प्रोत्साहन और आवश्यकता के अर्थ में है)
- فِرْقَةٍ: समूह, गिरोह, बस्ती या क़बीला।
- طَائِفَةٌ: एक गिरोह, एक समूह (जो कुछ लोग हों)।
- لِيَتَفَقَّهُوا: ताकि वे गहरी समझ हासिल करें (धर्म की समझ)।
- لِيُنذِرُوا: ताकि वे डराएँ, सावधान करें।
- يَحْذَرُونَ: वे डरें (अल्लाह के अज़ाब से) और बचें।
तफ़सीर (व्याख्या):
अल्लाह तआला इस आयत में मोमिनीन को एक बहुत ही अहम और हिकमत भरा तरीक़ा सिखा रहे हैं। यह आयत उस वक़्त नाज़िल हुई जब ग़ज़वा-ए-तबूक के दौरान कुछ मुसलमान जिहाद के लिए निकलते थे और नबी करीम ﷺ को अकेला छोड़ देते थे, या फिर सब मिलकर एक साथ निकल पड़ते थे। अल्लाह ने फ़रमाया: मोमिनीन के लिए यह मुनासिब नहीं कि वे सब के सब (एक साथ) निकल पड़ें। यह न तो उनके लिए बेहतर है और न ही मुनासिब। बल्कि चाहिए कि हर गिरोह और हर बस्ती में से कुछ लोग जिहाद के लिए निकलें, और कुछ लोग पीछे रहकर नबी ﷺ की संगत में रहें, ताकि वे धर्म की गहरी समझ (तफ़क़्क़ुह) हासिल करें।
यानी जो लोग पीछे रहते हैं, वह नबी ﷺ से क़ुरआन, हदीस और इस्लामी अहकाम सीखते हैं, और जब जिहाद के लिए निकले हुए लोग वापस लौटते हैं, तो यह पीछे रहने वाले लोग उन्हें धर्म की बातें सिखाते हैं, उन्हें अल्लाह के अज़ाब से डराते हैं और अच्छे अमल की तरफ़ रहनुमाई करते हैं। इस तरह दीन की तालीम और तफ़हीम का सिलसिला जारी रहता है, और पूरी उम्मत इल्म और अमल दोनों में मज़बूत होती है।
इस आयत में एक बुनियादी उसूल बताया गया है कि दीन की तालीम हासिल करना और दूसरों तक पहुँचाना फ़र्ज़-ए-किफ़ाया है। यानी अगर कुछ लोग यह ज़िम्मेदारी निभा दें, तो सब पर से फ़र्ज़ उतर जाता है, लेकिन अगर कोई न करे, तो पूरी उम्मत गुनाहगार होगी। यही वजह है कि इस्लाम में इल्म हासिल करने और सिखाने को बहुत बड़ी फ़ज़ीलत हासिल है।
दावती पहलू (प्रेरणादायक संदेश):
यह आयत हमें सिखाती है कि इस्लाम सिर्फ़ जिहाद और लड़ाई का दीन नहीं, बल्कि इल्म, समझ और तालीम का दीन है। अल्लाह ने मोमिनीन को दो ज़िम्मेदारियाँ दीं: एक जिहाद (अपने दीन की हिफ़ाज़त) और दूसरी तफ़क़्क़ुह (दीन की समझ) और तबलीग़ (दूसरों तक पहुँचाना)। यह आयत हमें बताती है कि हर मुसलमान को चाहिए कि वह दीन की तालीम हासिल करे, और जो कुछ सीखे, उसे अपने घर, अपने मोहल्ले और अपनी बस्ती में फैलाए। अगर हम सब इल्म हासिल करने और दूसरों को सिखाने की कोशिश करें, तो हमारी उम्मत दुनिया में इज़्ज़त और कामयाबी हासिल करेगी। याद रखिए, इल्म वह नूर है जो दिलों को रौशन करता है और इंसान को अल्लाह की रहमत के क़रीब लाता है।
📜 आयत 120-124 — अत-तौबा
अनुवाद — अत-तौबा 122
सूरा अत-तौबा आयत 122 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : और ये भी मुनासिब नहीं कि मोमिननि कुल के कुल…सूरा आयत 122/129 — अत-तौबा التوبة (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अत-तौबा सुनें, अत-तौबा अनुवाद, अत-तौबा mp3, अत-तौबा pdf. आयत 120–124. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Tuesday, August 18, 2026
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