अत-तौबा · 123/129
अनुवाद उच्चारण — सूरा अत-तौबा
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا قَاتِلُوا الَّذِينَ يَلُونَكُم مِّنَ الْكُفَّارِ وَلْيَجِدُوا فِيكُمْ غِلْظَةً ۚ وَاعْلَمُوا أَنَّ اللَّهَ مَعَ الْمُتَّقِينَ ۝١٢٣
Yaaa aiyuhal lazeena aamanoo qaatilul lazeena yaloonakum minal kuffaari walyajidoo feekum ghilzah; wa`lamooo annal laaha ma`al muttaqeen
📖 हिंदी अर्थ
ऐ ईमानदारों कुफ्फार में से जो लोग तुम्हारे आस पास के है उन से लड़ों और (इस तरह लड़ना) चाहिए कि वह लोग तुम में करारापन महसूस करें और जान रखो कि बेशुबहा ख़ुदा परहेज़गारों के साथ है

M Mishary Rashid Alafasy ✓
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A Abu Bakr Ash-Shaatree ✓
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A Abdullah Al-Juhani ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • يَلُونَكُم (यलूनकुम): तुम्हारे सबसे निकट हों, तुमसे मिले हुए हों।
  • غِلْظَةً (ग़िल्ज़ा): कठोरता, सख़्ती और शिद्दत।

तफ़सीर (व्याख्या):

ऐ ईमानवालों! अल्लाह तआला तुम्हें आदेश देता है कि कुफ्फ़ार में से उन लोगों से जिहाद करो जो तुम्हारे सबसे नज़दीक हैं, यानी तुम्हारे पड़ोस और आस-पास के काफ़िर। यह आदेश इसलिए है कि जो दुश्मन तुम्हारे सबसे करीब होता है, वही तुम्हारे लिए सबसे बड़ा ख़तरा होता है, क्योंकि उसका हमला अचानक और तेज़ होता है। इसलिए पहले उन्हीं से निपटो, फिर दूर वालों की बारी आएगी। साथ ही अल्लाह तुम्हें यह भी सिखाता है कि उन काफ़िरों को तुममें सख़्ती, कठोरता और शक्ति का एहसास होना चाहिए, ताकि वे तुम पर हमला करने की जुर्रत न कर सकें और तुम्हारे दुश्मनों के दिलों में तुम्हारा रोब बना रहे। यह सख़्ती और शिद्दत उनके ख़िलाफ़ होनी चाहिए, न कि मुसलमानों के आपसी मामलों में। और याद रखो कि अल्लाह तआला उन्हीं लोगों के साथ होता है जो उससे डरते हैं, उसके आदेशों का पालन करते हैं और उसकी नापसंदीदा चीज़ों से बचते हैं। जिसके साथ अल्लाह हो, उसे कभी हार नहीं सकती, चाहे दुश्मन कितने भी ताक़तवर क्यों न हों।

फ़ायदे (सीख):

  1. इस आयत से हमें यह सीख मिलती है कि दुश्मन से निपटने में समझदारी और हिकमत की ज़रूरत है — पहले निकटतम ख़तरे को ख़त्म करना चाहिए, फिर दूर वालों की तरफ़ ध्यान देना चाहिए। यह एक फ़ितरती और अक्लमंदाना उसूल है जो हर मुसलमान के काम आ सकता है।
  2. मुसलमानों को चाहिए कि वे अपने दुश्मनों के सामने कमज़ोरी न दिखाएँ, बल्कि अपनी ताक़त, हिम्मत और सख़्ती का इज़हार करें, ताकि दुश्मन उनसे डरे और उनकी इज़्ज़त करे। यह इस्लाम की सिखाई हुई एक बेहतरीन रणनीति है।
  3. इस आयत में अल्लाह के साथ होने की ख़ुशख़बरी सिर्फ़ उन्हीं के लिए है जो परहेज़गार हैं। यानी तक़वा (अल्लाह का डर) ही असली ताक़त है — जिसके पास तक़वा है, अल्लाह उसका साथी है, और अल्लाह का साथी कभी अकेला और कमज़ोर नहीं होता। यह बात हर मुसलमान के दिल को तसल्ली देती है कि अगर वह अल्लाह से डरता है और उसकी इताअत करता है, तो अल्लाह उसकी हिफ़ाज़त और मदद करेगा।


📜 आयत 121-125 — सूरा अत-तौबा

121وَلَا يُنفِقُونَ نَفَقَةً صَغِيرَةً وَلَا كَبِيرَةً وَلَا يَقْطَعُونَ وَادِيًا إِلَّا كُتِبَ لَهُمْ لِيَجْزِيَهُمُ اللَّهُ أَحْسَنَ مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ
और ये लोग (ख़ुदा की राह में) थोड़ा या बहुत माल नहीं खर्च करते और किसी मैदान को नहीं क़तआ करते मगर फौरन (उनके नामाए अमल में) उनके नाम लिख दिया जाता है ताकि ख़ुदा उनकी कारगुज़ारियों का उन्हें अच्छे से अच्छा बदला अता फरमाए
122۞ وَمَا كَانَ الْمُؤْمِنُونَ لِيَنفِرُوا كَافَّةً ۚ فَلَوْلَا نَفَرَ مِن كُلِّ فِرْقَةٍ مِّنْهُمْ طَائِفَةٌ لِّيَتَفَقَّهُوا فِي الدِّينِ وَلِيُنذِرُوا قَوْمَهُمْ إِذَا رَجَعُوا إِلَيْهِمْ لَعَلَّهُمْ يَحْذَرُونَ
और ये भी मुनासिब नहीं कि मोमिननि कुल के कुल (अपने घरों में) निकल खड़े हों उनमें से हर गिरोह की एक जमाअत (अपने घरों से) क्यों नहीं निकलती ताकि इल्मे दीन हासिल करे और जब अपनी क़ौम की तरफ पलट के आवे तो उनको (अज्र व आख़िरत से) डराए ताकि ये लोग डरें
123يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا قَاتِلُوا الَّذِينَ يَلُونَكُم مِّنَ الْكُفَّارِ وَلْيَجِدُوا فِيكُمْ غِلْظَةً ۚ وَاعْلَمُوا أَنَّ اللَّهَ مَعَ الْمُتَّقِينَ
ऐ ईमानदारों कुफ्फार में से जो लोग तुम्हारे आस पास के है उन से लड़ों और (इस तरह लड़ना) चाहिए कि वह लोग तुम में करारापन महसूस करें और जान रखो कि बेशुबहा ख़ुदा परहेज़गारों के साथ है
124وَإِذَا مَا أُنزِلَتْ سُورَةٌ فَمِنْهُم مَّن يَقُولُ أَيُّكُمْ زَادَتْهُ هَٰذِهِ إِيمَانًا ۚ فَأَمَّا الَّذِينَ آمَنُوا فَزَادَتْهُمْ إِيمَانًا وَهُمْ يَسْتَبْشِرُونَ
और जब कोई सूरा नाज़िल किया गया तो उन मुनाफिक़ीन में से (एक दूसरे से) पूछता है कि भला इस सूरे ने तुममें से किसी का ईमान बढ़ा दिया तो जो लोग ईमान ला चुके हैं उनका तो इस सूरे ने ईमान बढ़ा दिया और वह वहां उसकी ख़ुशियाँ मनाते है
125وَأَمَّا الَّذِينَ فِي قُلُوبِهِم مَّرَضٌ فَزَادَتْهُمْ رِجْسًا إِلَىٰ رِجْسِهِمْ وَمَاتُوا وَهُمْ كَافِرُونَ
मगर जिन लोगों के दिल में (निफाक़ की) बीमारी है तो उन (पिछली) ख़बासत पर इस सूरो ने एक ख़बासत और बढ़ा दी और ये लोग कुफ़्र ही की हालत में मर गए
अत-तौबाकुरान सूची
129आयत
मदनीअवतरण स्थान
123आयत

अनुवाद — अत-तौबा 123

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Friday, October 2, 2026

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