अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- النَّسِيءُ (नसी'): अर्थात हराम महीनों के हुक्म को टालना और बदलना, यानी किसी हराम महीने की हुरमत (हराम होने की पवित्रता) को हटाकर उसके बदले किसी और महीने को हराम ठहराना। यह अरब के जाहिलिया काल के लोगों की एक बुरी प्रथा थी।
- لِّيُوَاطِئُوا: अर्थात मिलान करने के लिए, यानी गिनती को पूरा रखने के लिए।
- عِدَّةَ مَا حَرَّمَ اللَّهُ: अल्लाह द्वारा हराम किए गए महीनों की संख्या (चार महीने)।
तफ़सीर (व्याख्या):
यह आयत उस बुरी प्रथा की ओर इशारा करती है जो अरब के जाहिलिया काल में रिवाज थी। वे लोग अल्लाह द्वारा निर्धारित चार हराम (पवित्र) महीनों — ज़ुल-क़ादा, ज़ुल-हिज्जा, मुहर्रम और रजब — की पवित्रता को अपनी स्वार्थी इच्छाओं के अनुसार बदल देते थे। जब उन्हें युद्ध या लूट-पाट की आवश्यकता होती, तो वे किसी हराम महीने को हलाल घोषित कर देते और उसके बदले किसी और महीने को हराम ठहरा देते। इस तरह वे महीनों की गिनती तो चार रखते, लेकिन उनके नाम और समय बदल देते।
अल्लाह तआला फरमाता है कि यह "नसी'" (महीनों को आगे-पीछे करना) उनके कुफ्र में एक और अधिक वृद्धि है। यह उनके कुफ्र को और बढ़ाता है, क्योंकि वे अल्लाह के हुक्म को बदलने की जुर्रत करते हैं। शैतान उन्हें इस काम में भटकाता है, और वे एक साल किसी महीने को हलाल कर लेते हैं तो अगले साल उसे हराम कर देते हैं — सिर्फ इसलिए ताकि वे अल्लाह द्वारा हराम किए गए महीनों की संख्या (चार) को पूरा रख सकें, लेकिन असल में वे अल्लाह के हुक्म की अवहेलना करते हैं और उसे बदल देते हैं।
यह सब उनके बुरे कर्मों का परिणाम था, जिन्हें शैतान ने उनकी नज़रों में खूबसूरत बना दिया था। वे सोचते थे कि वे सही कर रहे हैं, जबकि वे अल्लाह की अवज्ञा में डूबे हुए थे। अल्लाह तआला ऐसे काफिरों को हिदायत नहीं देता, जो अपने कुफ्र पर अड़े रहें और अल्लाह के हुक्मों को बदलने की कोशिश करें।
दावती पहलू (आमंत्रण का पहलू):
यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह के हुक्मों को अपनी इच्छाओं के अनुसार बदलना कितना बड़ा गुनाह है। आज भी कुछ लोग अपनी सुविधा के लिए अल्लाह के हुक्मों में हेर-फेर करने की कोशिश करते हैं — हलाल को हराम और हराम को हलाल ठहरा देते हैं। यह आयत हमें चेतावनी देती है कि अल्लाह का दीन (धर्म) पूर्ण और स्पष्ट है, उसमें किसी भी प्रकार का बदलाव या संशोधन नहीं किया जा सकता। हमें चाहिए कि हम अल्लाह के हुक्मों को पूरी तरह स्वीकार करें, उन्हें अपनी इच्छाओं के अधीन न करें। याद रखें, अल्लाह ही सच्चा मार्गदर्शक है, और वही अपने बंदों को सीधा रास्ता दिखाता है। जो लोग उसके हुक्मों को मानेंगे, वे सफल होंगे, और जो उन्हें बदलने की कोशिश करेंगे, वे भटक जाएंगे। आइए, हम अल्लाह के हुक्मों को पूरे दिल से कबूल करें और उन पर अमल करें, ताकि हम दुनिया और आखिरत दोनों में कामयाब हों।
📜 आयत 35-39 — अत-तौबा
अनुवाद — अत-तौबा 37
सूरा अत-तौबा आयत 37 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : महीनों का आगे पीछे कर देना भी कुफ़्र ही की…सूरा आयत 37/129 — अत-तौबा التوبة (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अत-तौबा सुनें, अत-तौबा अनुवाद, अत-तौबा mp3, अत-तौबा pdf. आयत 35–39. हिंदी अर्थ: اردو.
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Tuesday, August 18, 2026
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