ऐ ईमानदारों तुम्हें क्या हो गया है कि जब तुमसे कहा जाता है कि ख़ुदा की राह में (जिहाद के लिए) निकलो तो तुम लदधड़ (ढीले) हो कर ज़मीन की तरफ झुके पड़ते हो क्या तुम आख़िरत के बनिस्बत दुनिया की (चन्द रोज़ा) जिन्दगी को पसन्द करते थे तो (समझ लो कि) दुनिया की ज़िन्दगी का साज़ो सामान (आख़िर के) ऐश व आराम के मुक़ाबले में बहुत ही थोड़ा है
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مومنو! تمہیں کیا ہوا ہے کہ جب تم سے کہا جاتا ہے کہ خدا کی راہ میں (جہاد کے لیے) نکلو تو تم (کاہلی کے سبب سے) زمین پر گرے جاتے ہو (یعنی گھروں سے نکلنا نہیں چاہتے) کیا تم آخرت (کی نعمتوں) کو چھوڑ کر دینا کی زندگی پر خوش ہو بیٹھے ہو۔ دنیا کی زندگی کے فائدے تو آخرت کے مقابل بہت ہی کم ہیں
انفِرُوا: निकलो, जिहाद के लिए तैयार होकर बाहर जाओ।
اثَّاقَلْتُمْ: भारी होकर पीछे रह गए, काहिली और आलस दिखाई, टालमटोल की।
إِلَى الْأَرْضِ: ज़मीन की तरफ झुक गए, यानी अपने घरों और ठिकानों में बैठना पसंद किया।
مَتَاعُ: अस्थायी सुख-सामग्री, थोड़ा सा लाभ।
तफसीर (व्याख्या):
ऐ ईमान वालों! तुम्हें क्या हो गया है कि जब तुमसे कहा जाता है कि अल्लाह के रास्ते में (जिहाद के लिए) निकलो, तो तुम ज़मीन की तरफ झुक जाते हो, यानी अपने घरों, खेतों और दुनियावी कामों में लगे रहना पसंद करते हो और निकलने में भारीपन महसूस करते हो? क्या तुमने आख़िरत (आने वाले जीवन) के बदले दुनिया की इस फ़ानी (नाशवान) ज़िंदगी को पसंद कर लिया है? यह कितनी बड़ी भूल है! दुनिया का यह सारा सुख-सामान, चाहे वह कितना भी बड़ा क्यों न हो, आख़िरत के सामने बिल्कुल थोड़ा और तुच्छ है। आख़िरत की नेमतें हमेशा रहने वाली हैं, जबकि दुनिया का मज़ा कुछ दिनों के लिए है। जो अक्लमंद है वह इस थोड़े और फ़ानी (नाशवान) को उस चीज़ पर कभी तरजीह नहीं दे सकता जो बहुत बड़ी और हमेशा रहने वाली हो।
यह आयत उस मौके पर उतरी जब अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने ताइफ से वापस आकर रोम (क़ैसर) से जंग के लिए निकलने का हुक्म दिया, और यह ग़ज़वा-ए-तबूक था। उस वक्त गर्मी का मौसम था, फल पक रहे थे, और सफर दूर का था, इसलिए कुछ लोगों ने काहिली दिखाई और पीछे रहना चाहा। अल्लाह ने उन्हें इस आयत के ज़रिए डांटा और समझाया कि दुनिया की चंद रोज़ा आरामत आख़िरत की हमेशा वाली नेमतों के मुकाबले कुछ भी नहीं।
फ़ायदे (सबक):
जिहाद और अल्लाह के रास्ते में निकलना ईमान का तकाज़ा है; जब हुक्म हो तो बिना किसी बहाने के फौरन निकलना चाहिए।
दुनिया की मोहब्बत और आराम-तलबी इंसान को बड़ी से बड़ी नेकी से रोक सकती है, इसलिए दिल को दुनिया की चीज़ों से बचाकर रखना चाहिए।
आख़िरत की नेमतें दुनिया की सारी नेमतों से कहीं बेहतर और हमेशा रहने वाली हैं; अक्लमंद वही है जो इस फ़ानी (नाशवान) दुनिया को आख़िरत पर पसंद न करे।
यह आयत मुसलमानों को सिखाती है कि जब अल्लाह और उसके रसूल की पुकार हो, तो अपने घर, माल और आराम को छोड़कर उसकी तरफ दौड़ना चाहिए, क्योंकि अल्लाह के पास जो कुछ है वह सबसे बेहतर और बाकी रहने वाला है।
ऐ ईमानदारों तुम्हें क्या हो गया है कि जब तुमसे कहा जाता है कि ख़ुदा की राह में (जिहाद के लिए) निकलो तो तुम लदधड़ (ढीले) हो कर ज़मीन की तरफ झुके पड़ते हो क्या तुम आख़िरत के बनिस्बत दुनिया की (चन्द रोज़ा) जिन्दगी को पसन्द करते थे तो (समझ लो कि) दुनिया की ज़िन्दगी का साज़ो सामान (आख़िर के) ऐश व आराम के मुक़ाबले में बहुत ही थोड़ा है
इसमें तो शक़ ही नहीं कि ख़ुदा ने जिस दिन आसमान व ज़मीन को पैदा किया (उसी दिन से) ख़ुदा के नज़दीक ख़ुदा की किताब (लौहे महफूज़) में महीनों की गिनती बारह महीने है उनमें से चार महीने (अदब व) हुरमत के हैं यही दीन सीधी राह है तो उन चार महीनों में तुम अपने ऊपर (कुश्त व ख़ून (मार काट) करके) ज़ुल्म न करो और मुशरेकीन जिस तरह तुम से सबके बस मिलकर लड़ते हैं तुम भी उसी तरह सबके सब मिलकर उन से लड़ों और ये जान लो कि ख़ुदा तो यक़ीनन परहेज़गारों के साथ है
महीनों का आगे पीछे कर देना भी कुफ़्र ही की ज्यादती है कि उनकी बदौलत कुफ्फ़ार (और) बहक जाते हैं एक बरस तो उसी एक महीने को हलाल समझ लेते हैं और (दूसरे) साल उसी महीने को हराम कहते हैं ताकि ख़ुदा ने जो (चार महीने) हराम किए हैं उनकी गिनती ही पूरी कर लें और ख़ुदा की हराम की हुई चीज़ को हलाल कर लें उनकी बुरी (बुरी) कारस्तानियॉ उन्हें भली कर दिखाई गई हैं और खुदा काफिर लोगो को मंज़िले मक़सूद तक नहीं पहुँचाया करता
ऐ ईमानदारों तुम्हें क्या हो गया है कि जब तुमसे कहा जाता है कि ख़ुदा की राह में (जिहाद के लिए) निकलो तो तुम लदधड़ (ढीले) हो कर ज़मीन की तरफ झुके पड़ते हो क्या तुम आख़िरत के बनिस्बत दुनिया की (चन्द रोज़ा) जिन्दगी को पसन्द करते थे तो (समझ लो कि) दुनिया की ज़िन्दगी का साज़ो सामान (आख़िर के) ऐश व आराम के मुक़ाबले में बहुत ही थोड़ा है
अगर (अब भी) तुम न निकलोगे तो ख़ुदा तुम पर दर्दनाक अज़ाब नाज़िल फरमाएगा और (ख़ुदा कुछ मजबरू तो है नहीं) तुम्हारे बदले किसी दूसरी क़ौम को ले आएगा और तुम उसका कुछ भी बिगाड़ नहीं सकते और ख़ुदा हर चीज़ पर क़ादिर है
अगर तुम उस रसूल की मदद न करोगे तो (कुछ परवाह् नहीं ख़ुदा मददगार है) उसने तो अपने रसूल की उस वक्त मदद की जब उसकी कुफ्फ़ार (मक्का) ने (घर से) निकल बाहर किया उस वक्त सिर्फ (दो आदमी थे) दूसरे रसूल थे जब वह दोनो ग़ार (सौर) में थे जब अपने साथी को (उसकी गिरिया व ज़ारी (रोने) पर) समझा रहे थे कि घबराओ नहीं ख़ुदा यक़ीनन हमारे साथ है तो ख़ुदा ने उन पर अपनी (तरफ से) तसकीन नाज़िल फरमाई और (फ़रिश्तों के) ऐसे लश्कर से उनकी मदद की जिनको तुम लोगों ने देखा तक नहीं और ख़ुदा ने काफिरों की बात नीची कर दिखाई और ख़ुदा ही का बोल बाला है और ख़ुदा तो ग़ालिब हिकमत वाला है
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