अल-कहफ · 82/110
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-कहफ
وَأَمَّا الْجِدَارُ فَكَانَ لِغُلَامَيْنِ يَتِيمَيْنِ فِي الْمَدِينَةِ وَكَانَ تَحْتَهُ كَنزٌ لَّهُمَا وَكَانَ أَبُوهُمَا صَالِحًا فَأَرَادَ رَبُّكَ أَن يَبْلُغَا أَشُدَّهُمَا وَيَسْتَخْرِجَا كَنزَهُمَا رَحْمَةً مِّن رَّبِّكَ ۚ وَمَا فَعَلْتُهُ عَنْ أَمْرِي ۚ ذَٰلِكَ تَأْوِيلُ مَا لَمْ تَسْطِع عَّلَيْهِ صَبْرًا ۝٨٢
Wa ammal jidaaru fakaana lighulaamaini yateemaini fil madeenati wa kaana tahtahoo kanzul lahumaa wa kaana aboohumaa saalihan fa araada Rabbuka any yablughaaa ashuddahumaa wa yastakhrijaa kanzahumaa rahmatam mir Rabbik; wa maa fa`altuhoo `an amree; zaalika taaweelu maa lam tasti` `alaihi sabra
📖 हिंदी अर्थ
और वह जो दीवार थी (जिसे मैंने खड़ा कर दिया) तो वह शहर के दो यतीम लड़कों की थी और उसके नीचे उन्हीं दोनों लड़कों का ख़ज़ाना (गड़ा हुआ था) और उन लड़कों का बाप एक नेक आदमी था तो तुम्हारे परवरदिगार ने चाहा कि दोनों लड़के अपनी जवानी को पहुँचे तो तुम्हारे परवरदिगार की मेहरबानी से अपना ख़ज़ाने निकाल ले और मैंने (जो कुछ किया) कुछ अपने एख्तियार से नहीं किया (बल्कि खुदा के हुक्म से) ये हक़ीक़त है उन वाक़यात की जिन पर आपसे सब्र न हो सका

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • कन्ज़: खज़ाना, गड़ा हुआ धन।
  • अशुद्ध: परिपक्वता की आयु, समझदारी और ताकत की पूर्णता।
  • तावील: असली मतलब, वास्तविक व्याख्या।
  • तस्त: सहन करना, धैर्य रखना।

तफसीर (व्याख्या):

फिर ख़िज़र (अलैहिस्सलाम) ने मूसा (अलैहिस्सलाम) को उस दीवार के बारे में बताया जिसे उन्होंने बिना किसी मेहनताने के सीधा कर दिया था। वह दीवार उस शहर के दो अनाथ बच्चों की थी, जिनके पिता का देहांत हो चुका था। उस दीवार के नीचे उन दोनों के लिए एक खज़ाना दफ़न था — सोना और चाँदी। उनके पिता एक नेक और पवित्र इंसान थे, और अल्लाह ने उनकी नेकी की बरकत से उनकी औलाद की हिफ़ाज़त का इंतज़ाम किया।

अल्लाह ने चाहा कि ये दोनों बच्चे अपनी जवानी और समझदारी की पूरी उम्र तक पहुँचें, और फिर अपना खज़ाना अपनी मेहनत और हक़ के साथ निकालें। यह आपके रब की ओर से उन दोनों पर रहमत थी। अगर वह दीवार उस वक़्त गिर जाती, तो खज़ाना ज़ाहिर हो जाता और लोग उसे छीन लेते, या बच्चे उसे सँभाल नहीं पाते। इसलिए अल्लाह ने उसे महफ़ूज़ रखने के लिए यह इंतज़ाम किया।

फिर ख़िज़र (अलैहिस्सलाम) ने साफ़ कहा: "मूसा! मैंने यह सब कुछ अपनी मर्ज़ी या अपनी राय से नहीं किया, बल्कि अल्लाह के हुक्म और उसकी तरफ़ से दिए गए इल्म के अनुसार किया। यही उन सारी बातों की असली तावील (व्याख्या) है जिन पर आप सब्र नहीं कर सके।"

दावती पहलू:

इस आयत से हमें कई अहम सबक़ मिलते हैं:

  1. नेकी की बरकत: एक नेक बाप की नेकी उसकी औलाद के लिए ढाल बनती है। अल्लाह ने उन बच्चों को उनके पिता की नेकी की वजह से महफ़ूज़ रखा। यह हमें सिखाता है कि अपनी नेकी से हम सिर्फ़ अपना ही नहीं, बल्कि अपनी आने वाली नस्लों का भी भला कर सकते हैं।
  2. अल्लाह का इंतज़ाम: अल्लाह जो करता है, उसमें भलाई होती है, चाहे हमें वह पल भर में समझ न आए। कभी-कभी जो बात बुरी लगती है, वही दरअसल हमारे लिए बेहतर होती है।
  3. इल्म और अमल: ख़िज़र (अलैहिस्सलाम) ने अल्लाह के हुक्म से काम किया, और मूसा (अलैहिस्सलाम) ने सब्र का सबक़ सीखा। यह हमें सिखाता है कि इल्म के साथ सब्र ज़रूरी है, और अल्लाह के फ़ैसलों पर भरोसा रखना चाहिए।
  4. यतीमों की हिफ़ाज़त: इस्लाम यतीमों की देखभाल और उनके हक़ों की हिफ़ाज़त पर बहुत ज़ोर देता है। यहाँ अल्लाह ने खुद दो यतीमों की मदद के लिए एक नबी को वसीला बनाया।

यह क़िस्सा हमें बताता है कि अल्लाह का इल्म असीमित है और उसकी रहमत उसके बंदों पर हर पल नाज़िल होती है। हमें चाहिए कि हम उस पर पूरा भरोसा रखें, उसके हुक्मों पर अमल करें, और हर हाल में सब्र और शुक्र का दामन न छोड़ें।



📜 आयत 80-84 — सूरा अल-कहफ

80وَأَمَّا الْغُلَامُ فَكَانَ أَبَوَاهُ مُؤْمِنَيْنِ فَخَشِينَا أَن يُرْهِقَهُمَا طُغْيَانًا وَكُفْرًا
और वह जो लड़का जिसको मैंने मार डाला तो उसके माँ बाप दोनों (सच्चे) ईमानदार हैं तो मुझको ये अन्देशा हुआ कि (ऐसा न हो कि बड़ा होकर) उनको भी अपने सरकशी और कुफ़्र में फँसा दे
81فَأَرَدْنَا أَن يُبْدِلَهُمَا رَبُّهُمَا خَيْرًا مِّنْهُ زَكَاةً وَأَقْرَبَ رُحْمًا
तो हमने चाहा कि (हम उसको मार डाले और) उनका परवरदिगार इसके बदले में ऐसा फरज़न्द अता फरमाए जो उससे पाक नफ़सी और पाक कराबत में बेहतर हो
82وَأَمَّا الْجِدَارُ فَكَانَ لِغُلَامَيْنِ يَتِيمَيْنِ فِي الْمَدِينَةِ وَكَانَ تَحْتَهُ كَنزٌ لَّهُمَا وَكَانَ أَبُوهُمَا صَالِحًا فَأَرَادَ رَبُّكَ أَن يَبْلُغَا أَشُدَّهُمَا وَيَسْتَخْرِجَا كَنزَهُمَا رَحْمَةً مِّن رَّبِّكَ ۚ وَمَا فَعَلْتُهُ عَنْ أَمْرِي ۚ ذَٰلِكَ تَأْوِيلُ مَا لَمْ تَسْطِع عَّلَيْهِ صَبْرًا
और वह जो दीवार थी (जिसे मैंने खड़ा कर दिया) तो वह शहर के दो यतीम लड़कों की थी और उसके नीचे उन्हीं दोनों लड़कों का ख़ज़ाना (गड़ा हुआ था) और उन लड़कों का बाप एक नेक आदमी था तो तुम्हारे परवरदिगार ने चाहा कि दोनों लड़के अपनी जवानी को पहुँचे तो तुम्हारे परवरदिगार की मेहरबानी से अपना ख़ज़ाने निकाल ले और मैंने (जो कुछ किया) कुछ अपने एख्तियार से नहीं किया (बल्कि खुदा के हुक्म से) ये हक़ीक़त है उन वाक़यात की जिन पर आपसे सब्र न हो सका
83وَيَسْأَلُونَكَ عَن ذِي الْقَرْنَيْنِ ۖ قُلْ سَأَتْلُو عَلَيْكُم مِّنْهُ ذِكْرًا
और (ऐ रसूल) तुमसे लोग ज़ुलक़रनैन का हाल (इम्तेहान) पूछा करते हैं तुम उनके जवाब में कह दो कि मैं भी तुम्हें उसका कुछ हाल बता देता हूँ
84إِنَّا مَكَّنَّا لَهُ فِي الْأَرْضِ وَآتَيْنَاهُ مِن كُلِّ شَيْءٍ سَبَبًا
(ख़ुदा फरमाता है कि) बेशक हमने उनको ज़मीन पर कुदरतें हुकूमत अता की थी और हमने उसे हर चीज़ के साज़ व सामान दे रखे थे
अल-कहफकुरान सूची
110आयत
मक्कीअवतरण स्थान
82आयत

अनुवाद — अल-कहफ 82

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Thursday, October 1, 2026

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