अल-कहफ · 81/110
अनुवाद उच्चारण — अल-कहफ
فَأَرَدْنَا أَن يُبْدِلَهُمَا رَبُّهُمَا خَيْرًا مِّنْهُ زَكَاةً وَأَقْرَبَ رُحْمًا ۝٨١
Faradnaa any yubdila humaa Rabbuhumaa khairam minhu zakaatanw wa aqraba ruhmaa
📖 हिंदी अर्थ
तो हमने चाहा कि (हम उसको मार डाले और) उनका परवरदिगार इसके बदले में ऐसा फरज़न्द अता फरमाए जो उससे पाक नफ़सी और पाक कराबत में बेहतर हो
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • يُبْدِلَهُمَا: उन दोनों (माता-पिता) को बदल कर दे।
  • زَكَاةً: पवित्रता, अच्छाई और नेकी।
  • رُحْمًا: रहम, दया और शफ़क़त (माता-पिता के प्रति प्रेम और करुणा)।

तफ़सीर (व्याख्या):

इस आयत में ख़िज़्र (अलैहिस्सलाम) उस बच्चे के क़त्ल के पीछे की हिकमत बयान कर रहे हैं जिसे उन्होंने मारा था। वे फ़रमाते हैं कि हमने यह काम अपनी मर्ज़ी से नहीं किया, बल्कि अल्लाह तआला की तरफ़ से यह हुक्म था। हमारी मंशा यह थी कि अल्लाह उन माँ-बाप को उस नाफ़रमान और सरकश बच्चे के बदले में एक ऐसी औलाद अता फ़रमाए जो उनके लिए ज़रिया-ए-राहत हो — जो पाक-दामन, नेक, परहेज़गार और दीन-दार हो, और जो अपने माँ-बाप के साथ पूरी रहमत, शफ़क़त और नेक सलूक करे। यानी अल्लाह तआला ने उन्हें एक बेहतर और प्यारा बच्चा अता किया, जो उनके लिए दुनिया और आख़िरत दोनों में बेहतर साबित हुआ।

यहाँ से हमें यह सबक़ मिलता है कि अल्लाह तआला जब किसी बंदे से कोई चीज़ छीनता है, तो उसके बदले में उसे उससे बेहतर चीज़ अता कर सकता है। इंसान को चाहिए कि वह अल्लाह के फ़ैसले पर भरोसा रखे और यक़ीन रखे कि अल्लाह जो करता है, बंदे की भलाई के लिए ही करता है। मुसीबत और आज़माइश के वक़्त सब्र और रज़ा-ब-रज़ा (अल्लाह की रज़ा पर राज़ी रहना) इंसान को अल्लाह की मुहब्बत और उसकी रहमत के क़रीब लाता है। यह भी याद रखें कि अल्लाह तआला अपने नेक बंदों को कभी निराश नहीं करता — वह हर दर्द का इलाज, हर ग़म की ख़ुशी और हर तंगी के बाद आसानी अता फ़रमाता है।

🎧 सुनें

📜 आयत 79-83 — अल-कहफ

79أَمَّا السَّفِينَةُ فَكَانَتْ لِمَسَاكِينَ يَعْمَلُونَ فِي الْبَحْرِ فَأَرَدتُّ أَنْ أَعِيبَهَا وَكَانَ وَرَاءَهُم مَّلِكٌ يَأْخُذُ كُلَّ سَفِينَةٍ غَصْبًا
(लीजिए सुनिये) वह कश्ती (जिसमें मैंने सुराख़ कर दिया था) तो चन्द ग़रीबों की थी जो दरिया में मेहनत करके गुज़ारा करते थे मैंने चाहा कि उसे ऐबदार बना दूँ (क्योंकि) उनके पीछे-पीछे एक (ज़ालिम) बादशाह (आता) था कि तमाम कश्तियां ज़बरदस्ती बेगार में पकड़ लेता था
80وَأَمَّا الْغُلَامُ فَكَانَ أَبَوَاهُ مُؤْمِنَيْنِ فَخَشِينَا أَن يُرْهِقَهُمَا طُغْيَانًا وَكُفْرًا
और वह जो लड़का जिसको मैंने मार डाला तो उसके माँ बाप दोनों (सच्चे) ईमानदार हैं तो मुझको ये अन्देशा हुआ कि (ऐसा न हो कि बड़ा होकर) उनको भी अपने सरकशी और कुफ़्र में फँसा दे
81فَأَرَدْنَا أَن يُبْدِلَهُمَا رَبُّهُمَا خَيْرًا مِّنْهُ زَكَاةً وَأَقْرَبَ رُحْمًا
तो हमने चाहा कि (हम उसको मार डाले और) उनका परवरदिगार इसके बदले में ऐसा फरज़न्द अता फरमाए जो उससे पाक नफ़सी और पाक कराबत में बेहतर हो
82وَأَمَّا الْجِدَارُ فَكَانَ لِغُلَامَيْنِ يَتِيمَيْنِ فِي الْمَدِينَةِ وَكَانَ تَحْتَهُ كَنزٌ لَّهُمَا وَكَانَ أَبُوهُمَا صَالِحًا فَأَرَادَ رَبُّكَ أَن يَبْلُغَا أَشُدَّهُمَا وَيَسْتَخْرِجَا كَنزَهُمَا رَحْمَةً مِّن رَّبِّكَ ۚ وَمَا فَعَلْتُهُ عَنْ أَمْرِي ۚ ذَٰلِكَ تَأْوِيلُ مَا لَمْ تَسْطِع عَّلَيْهِ صَبْرًا
और वह जो दीवार थी (जिसे मैंने खड़ा कर दिया) तो वह शहर के दो यतीम लड़कों की थी और उसके नीचे उन्हीं दोनों लड़कों का ख़ज़ाना (गड़ा हुआ था) और उन लड़कों का बाप एक नेक आदमी था तो तुम्हारे परवरदिगार ने चाहा कि दोनों लड़के अपनी जवानी को पहुँचे तो तुम्हारे परवरदिगार की मेहरबानी से अपना ख़ज़ाने निकाल ले और मैंने (जो कुछ किया) कुछ अपने एख्तियार से नहीं किया (बल्कि खुदा के हुक्म से) ये हक़ीक़त है उन वाक़यात की जिन पर आपसे सब्र न हो सका
83وَيَسْأَلُونَكَ عَن ذِي الْقَرْنَيْنِ ۖ قُلْ سَأَتْلُو عَلَيْكُم مِّنْهُ ذِكْرًا
और (ऐ रसूल) तुमसे लोग ज़ुलक़रनैन का हाल (इम्तेहान) पूछा करते हैं तुम उनके जवाब में कह दो कि मैं भी तुम्हें उसका कुछ हाल बता देता हूँ
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अनुवाद — अल-कहफ 81

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Tuesday, August 18, 2026

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