Faman khaafa mim moosin janafan aw isman fa aslaha bainahum falaaa ismaa `alayh; innal laaha Ghafooru Raheem
📖 अनुवाद (हिंदी अर्थ)
📖 हिंदी अर्थ
(हाँ अलबत्ता) जो शख्स वसीयत करने वाले से बेजा तरफ़दारी या बे इन्साफी का ख़ौफ रखता है और उन वारिसों में सुलह करा दे तो उस पर बदलने का कुछ गुनाह नहीं है बेशक ख़ुदा बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है
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اگر کسی کو وصیت کرنے والے کی طرف سے (کسی وارث کی) طرفداری یا حق تلفی کا اندیشہ ہو تو اگر وہ (وصیت کو بدل کر) وارثوں میں صلح کرادے تو اس پر کچھ گناہ نہیں۔ بےشک خدا بخشنے والا (اور) رحم والا ہے
(हाँ अलबत्ता) जो शख्स वसीयत करने वाले से बेजा तरफ़दारी या बे इन्साफी का ख़ौफ रखता है और उन वारिसों में सुलह करा दे तो उस पर बदलने का कुछ गुनाह नहीं है बेशक ख़ुदा बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है
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अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
خَافَ: यहाँ इसका अर्थ है 'जान लेना' या 'डर महसूस करना'।
جَنَفًا: सत्य से हटकर अन्याय या पक्षपात करना, इरादतन या भूल से।
إِثْمًا: जानबूझकर किया गया पाप या ज़ुल्म।
فَأَصْلَحَ: सुधार करना, आपस में मेल-मिलाप कराना।
तफसीर (व्याख्या):
यह आयत वसीयत (इच्छा-पत्र) के मामले में न्याय और सुधार का मार्गदर्शन देती है। जब कोई व्यक्ति वसीयत करते समय सत्य से भटक जाए—चाहे वह भूल से हो या जानबूझकर—और किसी वारिस को नुकसान पहुँचाने या किसी को अनुचित लाभ देने की कोशिश करे, तो जो व्यक्ति इस अन्याय को भाँप लेता है, उसे चुप नहीं रहना चाहिए। उसका कर्तव्य है कि वह वसीयत करने वाले को नसीहत करके सही रास्ते पर लाए, और यदि वसीयत हो चुकी हो, तो वारिसों और वसीयत पाने वालों के बीच सुधार करे, वसीयत को न्याय और शरिया के अनुरूप ढाल दे। ऐसा करने पर उस पर कोई पाप नहीं है, बल्कि वह अल्लाह के यहाँ अज्र (पुण्य) का हकदार है। अल्लाह ने अपने बंदों पर बड़ी मेहरबानी और रहमत रखी है—वह उन लोगों को माफ कर देता है जो सुधार के इरादे से कदम उठाते हैं, और उन पर दया करता है। यह आयत उन लोगों के लिए एक खुशखबरी है जो नेकनीयती से लोगों के बीच सुलह कराते हैं, क्योंकि अल्लाह उनके इस अच्छे काम को कभी बेकार नहीं जाने देता।
फ़ायदे (सीख):
इस्लाम न्याय और इंसाफ का इतना पाबंद है कि मरने के बाद की वसीयत में भी किसी को नुकसान पहुँचाने की इजाज़त नहीं देता, और यह सिखाता है कि हर हाल में हक़ अदा होना चाहिए।
एक मुसलमान का फर्ज़ सिर्फ अपनी भलाई नहीं, बल्कि दूसरों के बीच सुधार और सुलह कराना भी है—यह एक बड़ी नेकी है।
अल्लाह की रहमत और माफी का दामन बहुत विस्तृत है; जो लोग नेक इरादे से सुधार करते हैं, उन्हें अल्लाह की पनाह और उसकी मेहरबानी हासिल होती है।
यह आयत हमें सिखाती है कि किसी गलती को देखकर चुप रहना और उसे बढ़ने देना ठीक नहीं, बल्कि हिम्मत करके सच्चाई और न्याय के लिए आवाज़ उठानी चाहिए।
(मुसलमानों) तुम को हुक्म दिया जाता है कि जब तुम में से किसी के सामने मौत आ खड़ी हो बशर्ते कि वह कुछ माल छोड़ जाएं तो माँ बाप और क़राबतदारों के लिए अच्छी वसीयत करें जो ख़ुदा से डरते हैं उन पर ये एक हक़ है
(हाँ अलबत्ता) जो शख्स वसीयत करने वाले से बेजा तरफ़दारी या बे इन्साफी का ख़ौफ रखता है और उन वारिसों में सुलह करा दे तो उस पर बदलने का कुछ गुनाह नहीं है बेशक ख़ुदा बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है
(वह भी हमेशा नहीं बल्कि) गिनती के चन्द रोज़ इस पर भी (रोज़े के दिनों में) जो शख्स तुम में से बीमार हो या सफर में हो तो और दिनों में जितने क़ज़ा हुए हो) गिन के रख ले और जिन्हें रोज़ा रखने की कूवत है और न रखें तो उन पर उस का बदला एक मोहताज को खाना खिला देना है और जो शख्स अपनी ख़ुशी से भलाई करे तो ये उस के लिए ज्यादा बेहतर है और अगर तुम समझदार हो तो (समझ लो कि फिदये से) रोज़ा रखना तुम्हारे हक़ में बहरहाल अच्छा है
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