अल-बकरा · 183/286
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-बकरा
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا كُتِبَ عَلَيْكُمُ الصِّيَامُ كَمَا كُتِبَ عَلَى الَّذِينَ مِن قَبْلِكُمْ لَعَلَّكُمْ تَتَّقُونَ ۝١٨٣
Yaa ayyuhal lazeena aamanoo kutiba `alaikumus Siyaamu kamaa kutiba `alal lazeena min qablikum la`allakum tattaqoon
📖 हिंदी अर्थ
ऐ ईमानदारों रोज़ा रखना जिस तरह तुम से पहले के लोगों पर फर्ज था उसी तरफ तुम पर भी फर्ज़ किया गया ताकि तुम उस की वजह से बहुत से गुनाहों से बचो

M Mishary Rashid Alafasy ✓
M Mahmoud Khalil Al-Husary ✓
A Abdurrahman As-Sudais ✓
M Mohamed Siddiq Al-Minshawi ✓
A Abdul Basit Abdul Samad ✓
A Ali Al-Hudhaify ✓
A Ahmed ibn Ali al-Ajamy ✓
A Abu Bakr Ash-Shaatree ✓
M Muhammad Ayyoub ✓
A Abdullah Basfar ✓
A Abdullah Al-Juhani ✓
M Maher Al Muaiqly ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • कुतिबा (كُتِبَ): फ़र्ज़ किया गया, अनिवार्य किया गया।
  • अस-सियाम (الصِّيَام): रोज़ा रखना, यानी सुबह सादिक़ से सूर्यास्त तक खाने-पीने और अन्य रोज़ा तोड़ने वाली चीज़ों से बचना।
  • अल्लज़ीना मिन क़ब्लिकुम (الَّذِينَ مِن قَبْلِكُمْ): वे उम्मतें जो तुमसे पहले गुज़र चुकी हैं, यानी पिछले नबियों और उनकी उम्मतों के लोग।
  • तत्तक़ून (تَتَّقُونَ): तक़वा अपनाना, यानी अल्लाह के अज़ाब से बचने के लिए उसकी नाफ़रमानी से परहेज़ करना और उसकी इताअत करना।

तफ़सीर (व्याख्या):

ऐ ईमान लाने वालों! जिन्होंने अल्लाह और उसके रसूल को दिल से माना और उसके हुक्मों पर अमल करने का अहद किया! अल्लाह ने तुम पर रोज़ा फ़र्ज़ किया है, जैसे उसने तुमसे पहले गुज़री हुई उम्मतों पर फ़र्ज़ किया था। यह कोई नया हुक्म नहीं है, बल्कि यह उसी राह का हिस्सा है जिस पर अल्लाह ने अपने सारे नबियों की उम्मतों को चलाया है। हज़रत आदम से लेकर हमारे नबी मुहम्मद ﷺ तक, रोज़ा हर शरीअत में इबादत का एक अहम हिस्सा रहा है। यह बात ईमानवालों के लिए तसल्ली और हौसले की है कि हम अकेले नहीं हैं, बल्कि अल्लाह की राह पर चलने वालों की एक लंबी क़तार का हिस्सा हैं।

यह फ़र्ज़ इसलिए किया गया ताकि तुम तक़वा हासिल करो। तक़वा यानी अल्लाह की नाराज़गी और अज़ाब से बचने के लिए अपने आपको गुनाहों से रोकना और नेक कामों को अपनाना। रोज़ा तक़वा का सबसे बड़ा ज़रिया है, क्योंकि इससे इंसान की नफ्सानी ख्वाहिशात पर लगाम लगती है। जब इंसान भूखा-प्यासा रहता है तो उसे अपने रब की नज़दीकी का एहसास होता है, उसकी नेअमतों की क़द्र होती है, और वह गुनाहों से दूर रहने की ताक़त पाता है। रोज़ा सिर्फ़ पेट का नहीं, बल्कि आँख, कान, ज़ुबान और दिल का भी रोज़ा है — यानी हर उस चीज़ से बचना जो अल्लाह को नापसंद है।

यह भी याद रखो कि रोज़ा तुम्हारे लिए बोझ नहीं, बल्कि रहमत है। यह तुम्हें पाकीज़गी की तरफ़ ले जाता है, तुम्हारे दिल को नूर से भर देता है, और तुम्हें उस मुक़ाम पर पहुँचाता है जहाँ अल्लाह की मोहब्बत और उसकी रज़ा हासिल होती है। जो शख्स रोज़े की हक़ीक़त को समझकर रोज़ा रखता है, वह दुनिया में भी इज़्ज़त पाता है और आख़िरत में भी कामयाब होता है। अल्लाह ने यह इबादत इसलिए फ़र्ज़ की ताकि तुम उसके करीब आओ, उसकी रहमत के साये में जीओ, और उसकी तरफ से मिलने वाली हिदायत और बरकत से नवाज़े जाओ।



📜 आयत 181-185 — सूरा अल-बकरा

181فَمَن بَدَّلَهُ بَعْدَمَا سَمِعَهُ فَإِنَّمَا إِثْمُهُ عَلَى الَّذِينَ يُبَدِّلُونَهُ ۚ إِنَّ اللَّهَ سَمِيعٌ عَلِيمٌ
फिर जो सुन चुका उसके बाद उसे कुछ का कुछ कर दे तो उस का गुनाह उन्हीं लोगों की गरदन पर है जो उसे बदल डालें बेशक ख़ुदा सब कुछ जानता और सुनता है
182فَمَنْ خَافَ مِن مُّوصٍ جَنَفًا أَوْ إِثْمًا فَأَصْلَحَ بَيْنَهُمْ فَلَا إِثْمَ عَلَيْهِ ۚ إِنَّ اللَّهَ غَفُورٌ رَّحِيمٌ
(हाँ अलबत्ता) जो शख्स वसीयत करने वाले से बेजा तरफ़दारी या बे इन्साफी का ख़ौफ रखता है और उन वारिसों में सुलह करा दे तो उस पर बदलने का कुछ गुनाह नहीं है बेशक ख़ुदा बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है
183يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا كُتِبَ عَلَيْكُمُ الصِّيَامُ كَمَا كُتِبَ عَلَى الَّذِينَ مِن قَبْلِكُمْ لَعَلَّكُمْ تَتَّقُونَ
ऐ ईमानदारों रोज़ा रखना जिस तरह तुम से पहले के लोगों पर फर्ज था उसी तरफ तुम पर भी फर्ज़ किया गया ताकि तुम उस की वजह से बहुत से गुनाहों से बचो
184أَيَّامًا مَّعْدُودَاتٍ ۚ فَمَن كَانَ مِنكُم مَّرِيضًا أَوْ عَلَىٰ سَفَرٍ فَعِدَّةٌ مِّنْ أَيَّامٍ أُخَرَ ۚ وَعَلَى الَّذِينَ يُطِيقُونَهُ فِدْيَةٌ طَعَامُ مِسْكِينٍ ۖ فَمَن تَطَوَّعَ خَيْرًا فَهُوَ خَيْرٌ لَّهُ ۚ وَأَن تَصُومُوا خَيْرٌ لَّكُمْ ۖ إِن كُنتُمْ تَعْلَمُونَ
(वह भी हमेशा नहीं बल्कि) गिनती के चन्द रोज़ इस पर भी (रोज़े के दिनों में) जो शख्स तुम में से बीमार हो या सफर में हो तो और दिनों में जितने क़ज़ा हुए हो) गिन के रख ले और जिन्हें रोज़ा रखने की कूवत है और न रखें तो उन पर उस का बदला एक मोहताज को खाना खिला देना है और जो शख्स अपनी ख़ुशी से भलाई करे तो ये उस के लिए ज्यादा बेहतर है और अगर तुम समझदार हो तो (समझ लो कि फिदये से) रोज़ा रखना तुम्हारे हक़ में बहरहाल अच्छा है
185شَهْرُ رَمَضَانَ الَّذِي أُنزِلَ فِيهِ الْقُرْآنُ هُدًى لِّلنَّاسِ وَبَيِّنَاتٍ مِّنَ الْهُدَىٰ وَالْفُرْقَانِ ۚ فَمَن شَهِدَ مِنكُمُ الشَّهْرَ فَلْيَصُمْهُ ۖ وَمَن كَانَ مَرِيضًا أَوْ عَلَىٰ سَفَرٍ فَعِدَّةٌ مِّنْ أَيَّامٍ أُخَرَ ۗ يُرِيدُ اللَّهُ بِكُمُ الْيُسْرَ وَلَا يُرِيدُ بِكُمُ الْعُسْرَ وَلِتُكْمِلُوا الْعِدَّةَ وَلِتُكَبِّرُوا اللَّهَ عَلَىٰ مَا هَدَاكُمْ وَلَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ
(रोज़ों का) महीना रमज़ान है जिस में क़ुरान नाज़िल किया गया जो लोगों का रहनुमा है और उसमें रहनुमाई और (हक़ व बातिल के) तमीज़ की रौशन निशानियाँ हैं (मुसलमानों) तुम में से जो शख्स इस महीनें में अपनी जगह पर हो तो उसको चाहिए कि रोज़ा रखे और जो शख्स बीमार हो या फिर सफ़र में हो तो और दिनों में रोज़े की गिनती पूरी करे ख़ुदा तुम्हारे साथ आसानी करना चाहता है और तुम्हारे साथ सख्ती करनी नहीं चाहता और (शुमार का हुक्म इस लिए दिया है) ताकि तुम (रोज़ो की) गिनती पूरी करो और ताकि ख़ुदा ने जो तुम को राह पर लगा दिया है उस नेअमत पर उस की बड़ाई करो और ताकि तुम शुक्र गुज़ार बनो
अल-बकराकुरान सूची
286आयत
मदनीअवतरण स्थान
183आयत

अनुवाद — अल-बकरा 183

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Monday, September 28, 2026

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