Mishary Rashid Alafasy
✓
Mahmoud Khalil Al-Husary
✓
Abdurrahman As-Sudais
✓
Mohamed Siddiq Al-Minshawi
✓
Abdul Basit Abdul Samad
✓
Ali Al-Hudhaify
✓
Ahmed ibn Ali al-Ajamy
✓
Abu Bakr Ash-Shaatree
✓
Muhammad Ayyoub
✓
Abdullah Basfar
✓
Abdullah Al-Juhani
✓
Maher Al Muaiqly
✓
अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- بَدَّلَهُ: उसे बदल दिया, अर्थात वसीयत में परिवर्तन कर दिया।
- سَمِعَهُ: उसे सुना, अर्थात वसीयत करने वाले की बात सुन ली।
- إِثْمُهُ: उसका गुनाह, उसका पाप।
- يُبَدِّلُونَهُ: जो लोग उसे बदलते हैं।
तफसीर (व्याख्या):
जब कोई व्यक्ति अपनी मृत्यु से पहले वसीयत करता है, तो उसे सुनने वालों पर यह ज़िम्मेदारी है कि वे उसे वैसे ही पूरा करें जैसा उसने कहा था। लेकिन अगर कोई व्यक्ति उस वसीयत को सुनने के बाद उसमें बदलाव कर दे — चाहे वह बदलाव बढ़ाने के रूप में हो, घटाने के रूप में हो, या उसे पूरी तरह रोक देने के रूप में — तो इस बदलाव का पूरा गुनाह उसी बदलने वाले व्यक्ति पर होगा, न कि मृतक पर। मृतक अपनी वसीयत के अनुसार बरी हो चुका है, और उसने जो अच्छा काम करने की इच्छा जताई थी, उसका अज्र (पुण्य) उसे मिलेगा। बदलने वाले का यह कृत्य एक बड़ा पाप है, क्योंकि उसने एक अच्छे काम को रोका या बिगाड़ा।
इसके बाद अल्लाह तआला ने ऐसे लोगों को चेतावनी दी है कि अल्लाह सब कुछ सुनने वाला और जानने वाला है। वह उस वसीयत को सुनता है जो मृतक ने की थी, और वह उस बदलाव को भी जानता है जो बदलने वालों ने किया है। उसकी सुनने और जानने की शक्ति से कोई भी बात छिपी नहीं है — न वह बात जो ज़ुबान से कही गई, न वह इरादा जो दिल में छिपा है। वह हर किसी को उसके कर्मों का पूरा-पूरा बदला देगा।
फ़ायदे (लाभ):
- इस आयत से हमें सीख मिलती है कि अमानत (विश्वास) को निभाना कितना बड़ा गुण है। जब कोई व्यक्ति हमें अपनी वसीयत सौंपता है, तो उसे पूरा करना हमारी ज़िम्मेदारी है, और उसमें बदलाव करना धोखा और ख़ियानत है।
- यह आयत हमें सिखाती है कि हर व्यक्ति अपने कर्मों के लिए स्वयं ज़िम्मेदार है। किसी की गलती का बोझ दूसरे पर नहीं डाला जा सकता। मृतक अपनी नीयत के अनुसार फल पाएगा, और बदलने वाला अपने किए की सज़ा भुगतेगा।
- अल्लाह की सुनने और जानने की सिफ़ात (विशेषताओं) पर यक़ीन करना हमारे दिलों में परहेज़गारी (संयम) पैदा करता है। जब हमें यह विश्वास होता है कि अल्लाह हर बात सुनता है और हर नीयत जानता है, तो हम किसी भी काम में धोखा या बेईमानी करने से डरते हैं।
- यह आयत इस्लाम के न्याय और सच्चाई के सिद्धांत को उजागर करती है — कि इस्लाम में किसी कमज़ोर का हक़ छीना नहीं जा सकता, और हर व्यक्ति का हक़ उसे दिया जाएगा, चाहे वह जीवित हो या मृत।
📜 आयत 179-183 — सूरा अल-बकरा
अनुवाद — अल-बकरा 181
सूरा अल-बकरा आयत 181 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : फिर जो सुन चुका उसके बाद उसे कुछ का कुछ…सूरा आयत 181/286 — सूरा अल-बकरा البقرة (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अल-बकरा सुनें, सूरा अल-बकरा अनुवाद, सूरा अल-बकरा mp3, सूरा अल-बकरा pdf. आयत 179–183. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Monday, September 28, 2026
अपनी नेक दुआओं में हमें मत भूलिए


