अल-हज · 32/78
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-हज
ذَٰلِكَ وَمَن يُعَظِّمْ شَعَائِرَ اللَّهِ فَإِنَّهَا مِن تَقْوَى الْقُلُوبِ ۝٣٢
Zaalika wa mai yu`azzim sha`aaa`iral laahi fa innahaa min taqwal quloob
📖 हिंदी अर्थ
ये (याद रखो) और जिस शख्स ने खुदा की निशानियों की ताज़ीम की तो कुछ शक नहीं कि ये भी दिलों की परहेज़गारी से हासिल होती है

M Mishary Rashid Alafasy ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • شَعَائِرَ اللهِ: अल्लाह के निशान और चिह्न, यानी धार्मिक प्रतीक और अनुष्ठान। विशेष रूप से हज के स्थान, कुर्बानी के जानवर, और अन्य धार्मिक कर्म।
  • تَقْوَى الْقُلُوبِ: दिलों का परहेज़गारी, यानी दिल का अल्लाह के प्रति डर, सम्मान और उसकी आज्ञाओं का पालन करने की भावना।

तफसीर (व्याख्या):

यह आयत उन आदेशों की ओर इशारा करती है जो अल्लाह ने दिए हैं—एकेश्वरवाद (तौहीद) को अपनाना, अल्लाह की इबादत को खालिस करना, और हर उस चीज़ से बचना जो अल्लाह की नाराज़गी का कारण बने, जैसे मूर्तियों की पूजा और झूठ बोलना। फिर अल्लाह तआला कहते हैं कि जो कोई अल्लाह के धार्मिक चिह्नों (शआइर) की ताज़ीम करे—यानी उन्हें सम्मान दे, उनकी कद्र करे, और उन्हें अच्छे दिल से अपनाए—जैसे हज के स्थानों की पवित्रता का ख्याल रखना, कुर्बानी के जानवरों को अच्छा और मोटा चुनना, और उन्हें खुशी से अल्लाह के नाम पर ज़बह करना—तो यह ताज़ीम उस दिल की परहेज़गारी का सबूत है जो अल्लाह के डर से भरा हुआ है। यह सिर्फ ज़ाहिरी कर्म नहीं है, बल्कि दिल की गहराई से निकलने वाला एहतिराम है, क्योंकि असली तक़वा दिल में होता है, और यही दिल अच्छे कर्मों की प्रेरणा देता है।

दावती पहलू:

यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह की इबादत और उसके धार्मिक प्रतीकों का सम्मान हमारे ईमान की गहराई को दर्शाता है। जब हम हज, उमरा, या कुर्बानी जैसे कर्मों को पूरे दिल से और अच्छी नीयत से करते हैं, तो हमारा दिल अल्लाह की रोशनी से जगमगा उठता है। यह तक़वा ही है जो हमें जीवन के हर कदम पर सही रास्ता दिखाता है और हमें अल्लाह की रहमत के करीब लाता है। आइए, हम अपने दिलों को अल्लाह के डर और उसकी मोहब्बत से भरें, ताकि हर अच्छा काम हमारे लिए जन्नत की तरफ एक कदम बने। याद रखें, अल्लाह हमारे ज़ाहिरी कर्मों को नहीं, बल्कि दिल के इरादों और उसकी ताज़ीम को देखता है।



📜 आयत 30-34 — सूरा अल-हज

30ذَٰلِكَ وَمَن يُعَظِّمْ حُرُمَاتِ اللَّهِ فَهُوَ خَيْرٌ لَّهُ عِندَ رَبِّهِ ۗ وَأُحِلَّتْ لَكُمُ الْأَنْعَامُ إِلَّا مَا يُتْلَىٰ عَلَيْكُمْ ۖ فَاجْتَنِبُوا الرِّجْسَ مِنَ الْأَوْثَانِ وَاجْتَنِبُوا قَوْلَ الزُّورِ
और इसके अलावा जो शख्स खुदा की हुरमत वाली चीज़ों की ताज़ीम करेगा तो ये उसके पवरदिगार के यहाँ उसके हक़ में बेहतर है और उन जानवरों के अलावा जो तुमसे बयान किए जाँएगे कुल चारपाए तुम्हारे वास्ते हलाल किए गए तो तुम नापाक बुतों से बचे रहो और लग़ो बातें गाने वग़ैरह से बचे रहो
31حُنَفَاءَ لِلَّهِ غَيْرَ مُشْرِكِينَ بِهِ ۚ وَمَن يُشْرِكْ بِاللَّهِ فَكَأَنَّمَا خَرَّ مِنَ السَّمَاءِ فَتَخْطَفُهُ الطَّيْرُ أَوْ تَهْوِي بِهِ الرِّيحُ فِي مَكَانٍ سَحِيقٍ
निरे खरे अल्लाह के होकर (रहो) उसका किसी को शरीक न बनाओ और जिस शख्स ने (किसी को) खुदा का शरीक बनाया तो गोया कि वह आसमान से गिर पड़ा फिर उसको (या तो दरमियान ही से) कोई (मुरदा ख्ववार) चिड़िया उचक ले गई या उसे हवा के झोंके ने बहुत दूर जा फेंका
32ذَٰلِكَ وَمَن يُعَظِّمْ شَعَائِرَ اللَّهِ فَإِنَّهَا مِن تَقْوَى الْقُلُوبِ
ये (याद रखो) और जिस शख्स ने खुदा की निशानियों की ताज़ीम की तो कुछ शक नहीं कि ये भी दिलों की परहेज़गारी से हासिल होती है
33لَكُمْ فِيهَا مَنَافِعُ إِلَىٰ أَجَلٍ مُّسَمًّى ثُمَّ مَحِلُّهَا إِلَى الْبَيْتِ الْعَتِيقِ
और इन चार पायों में एक मुअय्युन मुद्दत तक तुम्हार लिये बहुत से फायदें हैं फिर उनके ज़िबाह होने की जगह क़दीम (इबादत) ख़ानए काबा है
34وَلِكُلِّ أُمَّةٍ جَعَلْنَا مَنسَكًا لِّيَذْكُرُوا اسْمَ اللَّهِ عَلَىٰ مَا رَزَقَهُم مِّن بَهِيمَةِ الْأَنْعَامِ ۗ فَإِلَٰهُكُمْ إِلَٰهٌ وَاحِدٌ فَلَهُ أَسْلِمُوا ۗ وَبَشِّرِ الْمُخْبِتِينَ
और हमने तो हर उम्मत के वास्ते क़ुरबानी का तरीक़ा मुक़र्रर कर दिया है ताकि जो मवेशी चारपाए खुदा ने उन्हें अता किए हैं उन पर (ज़िबाह के वक्त) ख़ुदा का नाम ले ग़रज़ तुम लोगों का माबूद (वही) यकता खुदा है तो उसी के फरमाबरदार बन जाओ
अल-हजकुरान सूची
78आयत
मदनीअवतरण स्थान
32आयत

अनुवाद — अल-हज 32

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Thursday, October 1, 2026

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