अल-हज · 33/78
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-हज
لَكُمْ فِيهَا مَنَافِعُ إِلَىٰ أَجَلٍ مُّسَمًّى ثُمَّ مَحِلُّهَا إِلَى الْبَيْتِ الْعَتِيقِ ۝٣٣
Lakum feehaa manaafi`u ilaaa ajalim musamman summa mahilluhaaa ilal Baitil `Ateeq
📖 हिंदी अर्थ
और इन चार पायों में एक मुअय्युन मुद्दत तक तुम्हार लिये बहुत से फायदें हैं फिर उनके ज़िबाह होने की जगह क़दीम (इबादत) ख़ानए काबा है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • لَكُمْ فِيهَا مَنَافِعُ: इन (क़ुरबानी के जानवरों) में तुम्हारे लिए फ़ायदे हैं।
  • إِلَىٰ أَجَلٍ مُّسَمًّى: एक निश्चित समय तक।
  • مَحِلُّهَا: इनके ज़बह करने का स्थान।
  • الْبَيْتِ الْعَتِيقِ: प्राचीन घर (काबा), जिसे अल्लाह ने आज़ाद किया है।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला अपने बंदों पर अपनी असीम रहमत और एहसान का ज़िक्र करते हुए फ़रमाता है कि क़ुरबानी के जानवरों (ऊँट, गाय, बकरी आदि) में तुम्हारे लिए कई फ़ायदे रखे गए हैं। इन फ़ायदों में दूध, ऊन, बाल, बच्चे (नस्ल) और सवारी करना शामिल है। तुम इनसे एक निश्चित समय तक यानी जब तक इन्हें हदी (क़ुरबानी) के लिए मख़सूस (नियत) न किया जाए, फ़ायदा उठा सकते हो। लेकिन जब तुम इन्हें अल्लाह के लिए हदी के तौर पर नियत कर दो, तो उसके बाद इनसे किसी भी प्रकार का फ़ायदा उठाना जायज़ नहीं है, सिवाय इसके कि ज़रूरत के वक़्त सवारी कर ली जाए, बशर्ते कि जानवर को कोई नुक़्सान न पहुँचे।

फिर अल्लाह फ़रमाता है कि इन जानवरों के ज़बह करने का स्थान "बैतुल अतीक" (काबा) तक है, यानी पूरा हरम (मक्का का पवित्र क्षेत्र) उनके ज़बह के लिए जायज़ है। यह बैतुल अतीक वह पवित्र घर है जिसे अल्लाह ने ज़ालिमों और सरकशों के क़ब्ज़े से आज़ाद किया है, और इसे हमेशा के लिए अपनी इबादत के लिए मख़सूस किया है।

यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह ने अपने बंदों पर कितने एहसान किए हैं। उसने हमें ऐसे जानवर दिए जिनसे हमें कई तरह के फ़ायदे पहुँचते हैं, और साथ ही उन्हें क़ुरबानी के ज़रिए उसकी रज़ा हासिल करने का ज़रिया भी बनाया। यह इस बात की दलील है कि इस्लाम में न तो दुनिया को छोड़ना है और न ही आख़िरत को भूलना है, बल्कि दोनों का ही सही तालमेल रखना है। हमें चाहिए कि अल्लाह के इन एहसानों का शुक्र अदा करें और अपनी ज़िंदगी के हर पहलू में उसकी रज़ा को मद्देनज़र रखें, ताकि दुनिया भी अच्छी हो और आख़िरत भी।



📜 आयत 31-35 — सूरा अल-हज

31حُنَفَاءَ لِلَّهِ غَيْرَ مُشْرِكِينَ بِهِ ۚ وَمَن يُشْرِكْ بِاللَّهِ فَكَأَنَّمَا خَرَّ مِنَ السَّمَاءِ فَتَخْطَفُهُ الطَّيْرُ أَوْ تَهْوِي بِهِ الرِّيحُ فِي مَكَانٍ سَحِيقٍ
निरे खरे अल्लाह के होकर (रहो) उसका किसी को शरीक न बनाओ और जिस शख्स ने (किसी को) खुदा का शरीक बनाया तो गोया कि वह आसमान से गिर पड़ा फिर उसको (या तो दरमियान ही से) कोई (मुरदा ख्ववार) चिड़िया उचक ले गई या उसे हवा के झोंके ने बहुत दूर जा फेंका
32ذَٰلِكَ وَمَن يُعَظِّمْ شَعَائِرَ اللَّهِ فَإِنَّهَا مِن تَقْوَى الْقُلُوبِ
ये (याद रखो) और जिस शख्स ने खुदा की निशानियों की ताज़ीम की तो कुछ शक नहीं कि ये भी दिलों की परहेज़गारी से हासिल होती है
33لَكُمْ فِيهَا مَنَافِعُ إِلَىٰ أَجَلٍ مُّسَمًّى ثُمَّ مَحِلُّهَا إِلَى الْبَيْتِ الْعَتِيقِ
और इन चार पायों में एक मुअय्युन मुद्दत तक तुम्हार लिये बहुत से फायदें हैं फिर उनके ज़िबाह होने की जगह क़दीम (इबादत) ख़ानए काबा है
34وَلِكُلِّ أُمَّةٍ جَعَلْنَا مَنسَكًا لِّيَذْكُرُوا اسْمَ اللَّهِ عَلَىٰ مَا رَزَقَهُم مِّن بَهِيمَةِ الْأَنْعَامِ ۗ فَإِلَٰهُكُمْ إِلَٰهٌ وَاحِدٌ فَلَهُ أَسْلِمُوا ۗ وَبَشِّرِ الْمُخْبِتِينَ
और हमने तो हर उम्मत के वास्ते क़ुरबानी का तरीक़ा मुक़र्रर कर दिया है ताकि जो मवेशी चारपाए खुदा ने उन्हें अता किए हैं उन पर (ज़िबाह के वक्त) ख़ुदा का नाम ले ग़रज़ तुम लोगों का माबूद (वही) यकता खुदा है तो उसी के फरमाबरदार बन जाओ
35الَّذِينَ إِذَا ذُكِرَ اللَّهُ وَجِلَتْ قُلُوبُهُمْ وَالصَّابِرِينَ عَلَىٰ مَا أَصَابَهُمْ وَالْمُقِيمِي الصَّلَاةِ وَمِمَّا رَزَقْنَاهُمْ يُنفِقُونَ
और (ऐ रसूल हमारे) गिड़गिड़ाने वाले बन्दों को (बेहश्त की) खुशख़बरी दे दो ये वह हैं कि जब (उनके सामने) खुदा का नाम लिया जाता है तो उनके दिल सहम जाते हैं और जब उनपर कोई मुसीबत आ पड़े तो सब्र करते हैं और नमाज़ पाबन्दी से अदा करते हैं और जो कुछ हमने उन्हें दे रखा है उसमें से (राहे खुदा में) ख़र्च करते हैं
अल-हजकुरान सूची
78आयत
मदनीअवतरण स्थान
33आयत

अनुवाद — अल-हज 33

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Wednesday, September 30, 2026

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