सबा · 32/54
अनुवाद उच्चारण — सबा
قَالَ الَّذِينَ اسْتَكْبَرُوا لِلَّذِينَ اسْتُضْعِفُوا أَنَحْنُ صَدَدْنَاكُمْ عَنِ الْهُدَىٰ بَعْدَ إِذْ جَاءَكُم ۖ بَلْ كُنتُم مُّجْرِمِينَ ۝٣٢
Qaalal lazeenas takbaroo lillazeenas tud`ifooo anahnu sadadnaakum `anil hudaa ba`da iz jaaa`akum bal kuntum mujrimeen
📖 हिंदी अर्थ
तो सरकश लोग कमज़ोरों से (मुख़ातिब होकर) कहेंगे कि जब तुम्हारे पास (खुदा की तरफ़ से) हिदायत आयी तो थी तो क्या उसके आने के बाद हमने तुमको (ज़बरदस्ती अम्ल करने से) रोका था (हरगिज़ नहीं) बल्कि तुम तो खुद मुजरिम थे
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • اسْتَكْبَرُوا: जिन्होंने घमंड किया, अहंकार किया
  • اسْتُضْعِفُوا: जिन्हें कमज़ोर समझा गया, दबे-कुचले लोग
  • صَدَدْنَاكُمْ: हमने तुम्हें रोका, हमने तुम्हें बाधा डाली
  • الْهُدَى: सही मार्ग, मार्गदर्शन
  • مُجْرِمِينَ: अपराधी, गुनाहगार

तफ़सीर (व्याख्या):

इस आयत में उस भयानक दृश्य का वर्णन किया गया है जो क़ियामत के दिन घटित होगा, जब नेता और अनुयायी एक-दूसरे से झगड़ेंगे। जिन बड़े-बड़े सरदारों और नेताओं ने दुनिया में घमंड किया और सत्य का अनुसरण करने से इनकार किया, वे उन कमज़ोर लोगों से कहेंगे जिन्होंने उनकी बात मानी थी: "क्या हमने तुम्हें सही मार्ग से रोका था, जबकि सत्य तुम्हारे पास स्पष्ट रूप से आ चुका था?"

यह उनका उत्तर होगा जो अपनी गलती को दूसरों पर थोपने की कोशिश करेंगे। लेकिन वे स्वयं जानते हैं कि उनका यह तर्क झूठा है। इसलिए वे तुरंत कहते हैं: "नहीं, बल्कि तुम स्वयं अपराधी थे।" यानी तुमने अपनी मर्ज़ी और इच्छा से कुफ्र और गुनाह का रास्ता चुना। हमने तुम्हें ज़बरदस्ती गुमराह नहीं किया। तुम्हारे पास सत्य आया, तुमने उसे समझा और जाना, फिर भी तुमने उसे ठुकरा दिया और अपनी इच्छाओं का पालन किया।

यह आयत हमें एक बहुत बड़ी सीख देती है कि हर इंसान अपने कर्मों का स्वयं ज़िम्मेदार है। क़ियामत के दिन कोई बहाना काम नहीं आएगा। जिसने सत्य को जानकर भी उसे नहीं अपनाया, वह स्वयं अपने गुनाह का कारण है। यह हमारे लिए एक चेतावनी है कि हम अपने जीवन में सत्य को पहचानें, उसे अपनाएँ, और किसी की बातों में आकर अपने ईमान को कमज़ोर न पड़ने दें।

अल्लाह तआला ने हमें अक्ल और समझ दी है ताकि हम सत्य और असत्य में अंतर कर सकें। हमें चाहिए कि हम कुरआन और सुन्नत की रोशनी में अपना रास्ता चुनें, क्योंकि यही वह रास्ता है जो हमें जन्नत तक पहुँचाएगा। किसी भी इंसान की बात को सत्य से ऊपर नहीं रखना चाहिए। याद रखें, अल्लाह के पास हर इंसान अपने कर्मों का हिसाब स्वयं देगा, और वहाँ कोई किसी की मदद नहीं कर सकेगा।

🎧 सुनें

📜 आयत 30-34 — सबा

30قُل لَّكُم مِّيعَادُ يَوْمٍ لَّا تَسْتَأْخِرُونَ عَنْهُ سَاعَةً وَلَا تَسْتَقْدِمُونَ
(ऐ रसूल) तुम उनसे कह दो कि तुम लोगों के वास्ते एक ख़ास दिन की मीयाद मुक़र्रर है कि न तुम उससे एक घड़ी पीछे रह सकते हो और न आगे ही बड़ सकते हो
31وَقَالَ الَّذِينَ كَفَرُوا لَن نُّؤْمِنَ بِهَٰذَا الْقُرْآنِ وَلَا بِالَّذِي بَيْنَ يَدَيْهِ ۗ وَلَوْ تَرَىٰ إِذِ الظَّالِمُونَ مَوْقُوفُونَ عِندَ رَبِّهِمْ يَرْجِعُ بَعْضُهُمْ إِلَىٰ بَعْضٍ الْقَوْلَ يَقُولُ الَّذِينَ اسْتُضْعِفُوا لِلَّذِينَ اسْتَكْبَرُوا لَوْلَا أَنتُمْ لَكُنَّا مُؤْمِنِينَ
और जो लोग काफिर हों बैठे कहते हैं कि हम तो न इस क़ुरान पर हरगिज़ ईमान लाएँगे और न उस (किताब) पर जो इससे पहले नाज़िल हो चुकी और (ऐ रसूल तुमको बहुत ताज्जुब हो) अगर तुम देखो कि जब ये ज़ालिम क़यामत के दिन अपने परवरदिगार के सामने खड़े किए जायेंगे (और) उनमें का एक दूसरे की तरफ (अपनी) बात को फेरता होगा कि कमज़ोर अदना (दरजे के) लोग बड़े (सरकश) लोगों से कहते होगें कि अगर तुम (हमें) न (बहकाए) होते तो हम ज़रूर ईमानवाले होते (इस मुसीबत में न पड़ते)
32قَالَ الَّذِينَ اسْتَكْبَرُوا لِلَّذِينَ اسْتُضْعِفُوا أَنَحْنُ صَدَدْنَاكُمْ عَنِ الْهُدَىٰ بَعْدَ إِذْ جَاءَكُم ۖ بَلْ كُنتُم مُّجْرِمِينَ
तो सरकश लोग कमज़ोरों से (मुख़ातिब होकर) कहेंगे कि जब तुम्हारे पास (खुदा की तरफ़ से) हिदायत आयी तो थी तो क्या उसके आने के बाद हमने तुमको (ज़बरदस्ती अम्ल करने से) रोका था (हरगिज़ नहीं) बल्कि तुम तो खुद मुजरिम थे
33وَقَالَ الَّذِينَ اسْتُضْعِفُوا لِلَّذِينَ اسْتَكْبَرُوا بَلْ مَكْرُ اللَّيْلِ وَالنَّهَارِ إِذْ تَأْمُرُونَنَا أَن نَّكْفُرَ بِاللَّهِ وَنَجْعَلَ لَهُ أَندَادًا ۚ وَأَسَرُّوا النَّدَامَةَ لَمَّا رَأَوُا الْعَذَابَ وَجَعَلْنَا الْأَغْلَالَ فِي أَعْنَاقِ الَّذِينَ كَفَرُوا ۚ هَلْ يُجْزَوْنَ إِلَّا مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ
और कमज़ोर लोग बड़े लोगों से कहेंगे (कि ज़बरदस्ती तो नहीं की मगर हम खुद भी गुमराह नहीं हुए) बल्कि (तुम्हारी) रात-दिन की फरेबदेही ने (गुमराह किया कि) तुम लोग हमको खुदा न मानने और उसका शरीक ठहराने का बराबर हुक्म देते रहे (तो हम क्या करते) और जब ये लोग अज़ाब को (अपनी ऑंखों से) देख लेंगे तो दिल ही दिल में पछताएँगे और जो लोग काफिर हो बैठे हम उनकी गर्दनों में तौक़ डाल देंगे जो कारस्तानियां ये लोग (दुनिया में) करते थे उसी के मुवाफिक़ तो सज़ा दी जाएगी
34وَمَا أَرْسَلْنَا فِي قَرْيَةٍ مِّن نَّذِيرٍ إِلَّا قَالَ مُتْرَفُوهَا إِنَّا بِمَا أُرْسِلْتُم بِهِ كَافِرُونَ
और हमने किसी बस्ती में कोई डराने वाला पैग़म्बर नहीं भेजा मगर वहाँ के लोग ये ज़रूर बोल उठेंगे कि जो एहकाम देकर तुम भेजे गए हो हम उनको नहीं मानते
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अनुवाद — सबा 32

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Tuesday, August 18, 2026

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