सबा · 31/54
अनुवाद उच्चारण — सबा
وَقَالَ الَّذِينَ كَفَرُوا لَن نُّؤْمِنَ بِهَٰذَا الْقُرْآنِ وَلَا بِالَّذِي بَيْنَ يَدَيْهِ ۗ وَلَوْ تَرَىٰ إِذِ الظَّالِمُونَ مَوْقُوفُونَ عِندَ رَبِّهِمْ يَرْجِعُ بَعْضُهُمْ إِلَىٰ بَعْضٍ الْقَوْلَ يَقُولُ الَّذِينَ اسْتُضْعِفُوا لِلَّذِينَ اسْتَكْبَرُوا لَوْلَا أَنتُمْ لَكُنَّا مُؤْمِنِينَ ۝٣١
Wa qaalal lazeena kafaroo lan nu`mina bihaazal Quraani wa laa billazee baina yadayh; wa law taraaa iziz zaalimoona mawqoofoona `inda Rabbihim yarji`u ba`duhum ilaa ba`dinil qawla yaqoolul lazeenas tud`ifoo lillazeenas takbaroo law laaa antum lakunnaa mu`mineen
📖 हिंदी अर्थ
और जो लोग काफिर हों बैठे कहते हैं कि हम तो न इस क़ुरान पर हरगिज़ ईमान लाएँगे और न उस (किताब) पर जो इससे पहले नाज़िल हो चुकी और (ऐ रसूल तुमको बहुत ताज्जुब हो) अगर तुम देखो कि जब ये ज़ालिम क़यामत के दिन अपने परवरदिगार के सामने खड़े किए जायेंगे (और) उनमें का एक दूसरे की तरफ (अपनी) बात को फेरता होगा कि कमज़ोर अदना (दरजे के) लोग बड़े (सरकश) लोगों से कहते होगें कि अगर तुम (हमें) न (बहकाए) होते तो हम ज़रूर ईमानवाले होते (इस मुसीबत में न पड़ते)

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • مَوْقُوفُونَ: रोके गए, खड़े किए गए (हिसाब के लिए)
  • يَرْجِعُ بَعْضُهُمْ إِلَى بَعْضٍ الْقَوْلَ: आपस में बातचीत करना, एक दूसरे पर दोषारोपण करना
  • اسْتُضْعِفُوا: कमज़ोर समझे गए, अधीनस्थ लोग (अनुयायी)
  • اسْتَكْبَرُوا: घमंड करने वाले, बड़े बनने वाले (नेता और सरदार)
  • لَوْلَا أَنتُمْ: अगर तुम न होते

तफ़सीर (व्याख्या):

इस आयत में अल्लाह तआला उन काफ़िरों की हालत बयान कर रहा है जिन्होंने साफ़ लफ़्ज़ों में कह दिया कि "हम न इस क़ुरआन पर ईमान लाएँगे और न उन किताबों पर जो इससे पहले उतरीं" — यानी तौरात, इंजील और ज़बूर। उन्होंने अल्लाह की तमाम रहस्यमयी किताबों को झुठला दिया, क्योंकि जो आख़िरी किताब (क़ुरआन) आई, उसे मानने से इनकार करके उन्होंने दरअसल पहले की सारी किताबों को भी नकार दिया। यह उनकी सख़्त सरकशी और हठधर्मिता थी।

फिर अल्लाह तआला अपने नबी ﷺ से फ़रमाता है: "ऐ नबी! काश तुम देखते उस वक़्त को जब ये ज़ालिम लोग अपने रब के सामने हिसाब के लिए खड़े किए जाएँगे।" उस दिन उनकी क्या हालत होगी? वे आपस में झगड़ने लगेंगे, एक दूसरे पर इल्ज़ाम लगाएँगे। कमज़ोर और अधीनस्थ लोग (जो दुनिया में नेताओं की बात मानते थे) अपने बड़े नेताओं से कहेंगे: "अगर तुम न होते, तो हम ईमान ले आए होते। तुमने ही हमें गुमराह किया, हमें सच्चाई से रोका, हमें धोखे में रखा।"

यह एक बहुत बड़ा सबक़ है हमारे लिए! यह आयत हमें बताती है कि क़ुरआन और अल्लाह की हर किताब पर ईमान लाना कितना ज़रूरी है। जो शख्स क़ुरआन को मानने से इनकार करता है, वह दरअसल अल्लाह की तमाम रहमतों से महरूम हो जाता है। और यह भी सबक़ है कि हमें अंधी पैरवी से बचना चाहिए — किसी नेता या बड़े की बात पर आँख बंद करके नहीं चलना चाहिए, बल्कि खुद सच्चाई को पहचानना चाहिए और उस पर अमल करना चाहिए।

प्यारे भाइयों और बहनों! यह आयत हमें आगाह करती है कि क़ियामत के दिन कोई बहाना क़बूल नहीं होगा। आज हमें जो सच्चाई मिली है — क़ुरआन और सुन्नत — उसे पकड़ लेना चाहिए। अल्लाह तआला ने हम पर बड़ा एहसान किया है कि हमें यह रौशनी अता की। हमें चाहिए कि इस नेमत की क़द्र करें, क़ुरआन को पढ़ें, समझें और उस पर अमल करें। यही हमारी कामयाबी की कुंजी है — दुनिया में भी और आख़िरत में भी। अल्लाह हमें सीधी राह पर चलने की तौफ़ीक़ दे। आमीन।



📜 आयत 29-33 — सबा

29وَيَقُولُونَ مَتَىٰ هَٰذَا الْوَعْدُ إِن كُنتُمْ صَادِقِينَ
और (उलटे) कहते हैं कि अगर तुम (अपने दावे में) सच्चे हो तो (आख़िर) ये क़यामत का वायदा कब पूरा होगा
30قُل لَّكُم مِّيعَادُ يَوْمٍ لَّا تَسْتَأْخِرُونَ عَنْهُ سَاعَةً وَلَا تَسْتَقْدِمُونَ
(ऐ रसूल) तुम उनसे कह दो कि तुम लोगों के वास्ते एक ख़ास दिन की मीयाद मुक़र्रर है कि न तुम उससे एक घड़ी पीछे रह सकते हो और न आगे ही बड़ सकते हो
31وَقَالَ الَّذِينَ كَفَرُوا لَن نُّؤْمِنَ بِهَٰذَا الْقُرْآنِ وَلَا بِالَّذِي بَيْنَ يَدَيْهِ ۗ وَلَوْ تَرَىٰ إِذِ الظَّالِمُونَ مَوْقُوفُونَ عِندَ رَبِّهِمْ يَرْجِعُ بَعْضُهُمْ إِلَىٰ بَعْضٍ الْقَوْلَ يَقُولُ الَّذِينَ اسْتُضْعِفُوا لِلَّذِينَ اسْتَكْبَرُوا لَوْلَا أَنتُمْ لَكُنَّا مُؤْمِنِينَ
और जो लोग काफिर हों बैठे कहते हैं कि हम तो न इस क़ुरान पर हरगिज़ ईमान लाएँगे और न उस (किताब) पर जो इससे पहले नाज़िल हो चुकी और (ऐ रसूल तुमको बहुत ताज्जुब हो) अगर तुम देखो कि जब ये ज़ालिम क़यामत के दिन अपने परवरदिगार के सामने खड़े किए जायेंगे (और) उनमें का एक दूसरे की तरफ (अपनी) बात को फेरता होगा कि कमज़ोर अदना (दरजे के) लोग बड़े (सरकश) लोगों से कहते होगें कि अगर तुम (हमें) न (बहकाए) होते तो हम ज़रूर ईमानवाले होते (इस मुसीबत में न पड़ते)
32قَالَ الَّذِينَ اسْتَكْبَرُوا لِلَّذِينَ اسْتُضْعِفُوا أَنَحْنُ صَدَدْنَاكُمْ عَنِ الْهُدَىٰ بَعْدَ إِذْ جَاءَكُم ۖ بَلْ كُنتُم مُّجْرِمِينَ
तो सरकश लोग कमज़ोरों से (मुख़ातिब होकर) कहेंगे कि जब तुम्हारे पास (खुदा की तरफ़ से) हिदायत आयी तो थी तो क्या उसके आने के बाद हमने तुमको (ज़बरदस्ती अम्ल करने से) रोका था (हरगिज़ नहीं) बल्कि तुम तो खुद मुजरिम थे
33وَقَالَ الَّذِينَ اسْتُضْعِفُوا لِلَّذِينَ اسْتَكْبَرُوا بَلْ مَكْرُ اللَّيْلِ وَالنَّهَارِ إِذْ تَأْمُرُونَنَا أَن نَّكْفُرَ بِاللَّهِ وَنَجْعَلَ لَهُ أَندَادًا ۚ وَأَسَرُّوا النَّدَامَةَ لَمَّا رَأَوُا الْعَذَابَ وَجَعَلْنَا الْأَغْلَالَ فِي أَعْنَاقِ الَّذِينَ كَفَرُوا ۚ هَلْ يُجْزَوْنَ إِلَّا مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ
और कमज़ोर लोग बड़े लोगों से कहेंगे (कि ज़बरदस्ती तो नहीं की मगर हम खुद भी गुमराह नहीं हुए) बल्कि (तुम्हारी) रात-दिन की फरेबदेही ने (गुमराह किया कि) तुम लोग हमको खुदा न मानने और उसका शरीक ठहराने का बराबर हुक्म देते रहे (तो हम क्या करते) और जब ये लोग अज़ाब को (अपनी ऑंखों से) देख लेंगे तो दिल ही दिल में पछताएँगे और जो लोग काफिर हो बैठे हम उनकी गर्दनों में तौक़ डाल देंगे जो कारस्तानियां ये लोग (दुनिया में) करते थे उसी के मुवाफिक़ तो सज़ा दी जाएगी
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अनुवाद — सबा 31

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Tuesday, August 18, 2026

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