अल-हुजुरात · 3/18
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-हुजुरात
إِنَّ الَّذِينَ يَغُضُّونَ أَصْوَاتَهُمْ عِندَ رَسُولِ اللَّهِ أُولَٰئِكَ الَّذِينَ امْتَحَنَ اللَّهُ قُلُوبَهُمْ لِلتَّقْوَىٰ ۚ لَهُم مَّغْفِرَةٌ وَأَجْرٌ عَظِيمٌ ۝٣
Innal lazeena yaghud doona aswaatahum `inda Rasoolil laahi ulaaa`ikal lazeenam tah anal laahu quloobahum littaqwaa; lahum maghfiratunw waajrun `azeem
📖 हिंदी अर्थ
बेशक जो लोग रसूले ख़ुदा के सामने अपनी आवाज़ें धीमी कर लिया करते हैं यही लोग हैं जिनके दिलों को ख़ुदा ने परहेज़गारी के लिए जाँच लिया है उनके लिए (आख़ेरत में) बख़्शिस और बड़ा अज्र है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • يَغُضُّونَ – अपनी आवाज़ें नीची रखते हैं, धीमी करते हैं।
  • أَصْوَاتَهُمْ – अपनी आवाज़ों को।
  • امْتَحَنَ – परखा, आज़माया, खरा किया।
  • لِلتَّقْوَى – परहेज़गारी के लिए, ईमानदारी और ख़ुदा से डरने के लिए।

तफ़सीर:

यह आयत उन मोमिनों की तारीफ़ कर रही है जो अल्लाह के रसूल ﷺ की बारगाह में पूरे अदब और एहतिराम के साथ पेश आते हैं। जब वे आप ﷺ से बात करते हैं, तो अपनी आवाज़ें नीची रखते हैं, ना चिल्लाते हैं और ना ही आप ﷺ की शान में कोई बेअदबी करते हैं। यह उनके दिल की गहरी मुहब्बत और अक़ीदत का सबूत है।

अल्लाह तआला फ़रमाता है कि ऐसे लोग ही वे हैं जिनके दिलों को अल्लाह ने परखकर तक़वा (परहेज़गारी) के लिए खरा और पाक कर दिया है। यानी अल्लाह ने उनके दिलों को अपनी मुहब्बत, अपने रसूल की ताज़ीम और दीन की सच्चाई से भर दिया है। उनके दिलों में जो नूर और हिदायत है, वह इसी अदब और एहतिराम की बदौलत है।

इसके बाद अल्लाह उन्हें दो बड़ी ख़ुशख़बरी देता है:

  1. मग़फ़िरत – उनके गुनाह माफ़ कर दिए जाएंगे, चाहे वे छोटे हों या बड़े।
  2. अज़ीम अज्र – उनके लिए बहुत बड़ा इनाम है, जो जन्नत है। यह इनाम उनकी इस अदब और तक़वा की बदौलत मिलेगा।

इस आयत से हमें यह सबक मिलता है कि अल्लाह और उसके रसूल ﷺ के सामने अदब और एहतिराम ही असली कसौटी है। जिसके दिल में जितना अदब होगा, उसका दिल उतना ही पाक और तक़वा से भरा होगा। आज हमारे लिए भी यही रास्ता है – रसूलुल्लाह ﷺ की सुन्नत, उनके तरीक़े और उनके अदब को अपनाएं, तो अल्लाह हमारे दिलों को भी साफ़ करेगा और हमें भी मग़फ़िरत और अज़ीम अज्र अता करेगा।

यह आयत हमें सिखाती है कि दीन में अदब और अख़लाक़ की कितनी अहमियत है। जो लोग अल्लाह के रसूल ﷺ की बारगाह में अदब से पेश आते हैं, अल्लाह उन्हें दुनिया और आख़िरत दोनों में इज़्ज़त देता है। हमें भी चाहिए कि अपनी ज़ुबान, अपने अंदाज़ और अपने बर्ताव को नबी ﷺ की सुन्नत के मुताबिक़ बनाएं, ताकि हम भी उन मुबारक लोगों में शामिल हो सकें।



📜 आयत 1-5 — सूरा अल-हुजुरात

1يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تُقَدِّمُوا بَيْنَ يَدَيِ اللَّهِ وَرَسُولِهِ ۖ وَاتَّقُوا اللَّهَ ۚ إِنَّ اللَّهَ سَمِيعٌ عَلِيمٌ
ऐ ईमानदारों ख़ुदा और उसके रसूल के सामने किसी बात में आगे न बढ़ जाया करो और ख़ुदा से डरते रहो बेशक ख़ुदा बड़ा सुनने वाला वाक़िफ़कार है
2يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَرْفَعُوا أَصْوَاتَكُمْ فَوْقَ صَوْتِ النَّبِيِّ وَلَا تَجْهَرُوا لَهُ بِالْقَوْلِ كَجَهْرِ بَعْضِكُمْ لِبَعْضٍ أَن تَحْبَطَ أَعْمَالُكُمْ وَأَنتُمْ لَا تَشْعُرُونَ
ऐ ईमानदारों (बोलने में) अपनी आवाज़े पैग़म्बर की आवाज़ से ऊँची न किया करो और जिस तरह तुम आपस में एक दूसरे से ज़ोर (ज़ोर) से बोला करते हो उनके रूबरू ज़ोर से न बोला करो (ऐसा न हो कि) तुम्हारा किया कराया सब अकारत हो जाए और तुमको ख़बर भी न हो
3إِنَّ الَّذِينَ يَغُضُّونَ أَصْوَاتَهُمْ عِندَ رَسُولِ اللَّهِ أُولَٰئِكَ الَّذِينَ امْتَحَنَ اللَّهُ قُلُوبَهُمْ لِلتَّقْوَىٰ ۚ لَهُم مَّغْفِرَةٌ وَأَجْرٌ عَظِيمٌ
बेशक जो लोग रसूले ख़ुदा के सामने अपनी आवाज़ें धीमी कर लिया करते हैं यही लोग हैं जिनके दिलों को ख़ुदा ने परहेज़गारी के लिए जाँच लिया है उनके लिए (आख़ेरत में) बख़्शिस और बड़ा अज्र है
4إِنَّ الَّذِينَ يُنَادُونَكَ مِن وَرَاءِ الْحُجُرَاتِ أَكْثَرُهُمْ لَا يَعْقِلُونَ
(ऐ रसूल) जो लोग तुमको हुजरों के बाहर से आवाज़ देते हैं उनमें के अक्सर बे अक्ल हैं
5وَلَوْ أَنَّهُمْ صَبَرُوا حَتَّىٰ تَخْرُجَ إِلَيْهِمْ لَكَانَ خَيْرًا لَّهُمْ ۚ وَاللَّهُ غَفُورٌ رَّحِيمٌ
और अगर ये लोग इतना ताम्मुल करते कि तुम ख़ुद निकल कर उनके पास आ जाते (तब बात करते) तो ये उनके लिए बेहतर था और ख़ुदा तो बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है
अल-हुजुरातकुरान सूची
18आयत
मदनीअवतरण स्थान
3आयत

अनुवाद — अल-हुजुरात 3

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Tuesday, September 29, 2026

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