अल-हुजुरात · 2/18
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-हुजुरात
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَرْفَعُوا أَصْوَاتَكُمْ فَوْقَ صَوْتِ النَّبِيِّ وَلَا تَجْهَرُوا لَهُ بِالْقَوْلِ كَجَهْرِ بَعْضِكُمْ لِبَعْضٍ أَن تَحْبَطَ أَعْمَالُكُمْ وَأَنتُمْ لَا تَشْعُرُونَ ۝٢
Yaa ayyuhal lazeena aamanoo laa tarfa`ooo aswaatakum fawqa sawtin Nabiyi wa laa tajharoo lahoo bilqawli kajahri ba`dikum liba `din an tahbata a `maalukum wa antum laa tash`uroon
📖 हिंदी अर्थ
ऐ ईमानदारों (बोलने में) अपनी आवाज़े पैग़म्बर की आवाज़ से ऊँची न किया करो और जिस तरह तुम आपस में एक दूसरे से ज़ोर (ज़ोर) से बोला करते हो उनके रूबरू ज़ोर से न बोला करो (ऐसा न हो कि) तुम्हारा किया कराया सब अकारत हो जाए और तुमको ख़बर भी न हो

M Mishary Rashid Alafasy ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • لا تَرْفَعُوا أَصْوَاتَكُمْ: अपनी आवाज़ें ऊँची न करो।
  • فَوْقَ صَوْتِ النَّبِيِّ: नबी (ﷺ) की आवाज़ से ऊपर।
  • وَلا تَجْهَرُوا لَهُ بِالْقَوْلِ: और उनसे बात करते समय ऊँची आवाज़ में बात न करो।
  • كَجَهْرِ بَعْضِكُمْ لِبَعْضٍ: जिस तरह तुम आपस में एक-दूसरे से ऊँची आवाज़ में बात करते हो।
  • أَن تَحْبَطَ أَعْمَالُكُمْ: (इसलिए) कि तुम्हारे (नेक) काम बेकार न हो जाएँ।
  • وَأَنتُمْ لَا تَشْعُرُونَ: और तुम्हें (इसका) पता भी न चले।

तफ़सीर (व्याख्या):

ऐ ईमान लाने वालों! जो अल्लाह और उसके रसूल (ﷺ) पर ईमान लाए और उनके बताए हुए कानूनों पर अमल करते हो! तुम्हें अपने नबी (ﷺ) के साथ पूरे आदाब (शिष्टाचार) से पेश आना चाहिए। जब तुम उनसे बात करो तो अपनी आवाज़ें उनकी आवाज़ से ऊँची न करो, और न ही उन्हें उस तरह पुकारो जिस तरह तुम आपस में एक-दूसरे को ऊँची आवाज़ से पुकारते हो। उनके साथ हमेशा नर्मी, अदब और इज़्ज़त से बात करो। उन्हें उनके नाम से न पुकारो (जैसे "या मुहम्मद" या "या अहमद"), बल्कि उन्हें "या रसूलल्लाह" (ऐ अल्लाह के रसूल!) और "या नबिय्यल्लाह" (ऐ अल्लाह के नबी!) कहकर पुकारो, और उनकी बात को पूरे तसल्ली (ध्यान) से सुनो।

यह आदाब इसलिए ज़रूरी है कि कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारे नेक कामों का सवाब (अज्र) इस बेअदबी की वजह से बेकार हो जाए और तुम्हें इसका एहसास भी न हो। यह बहुत बड़ा नुक़सान है कि इंसान नेकियाँ करता रहे, लेकिन एक बेअदबी की वजह से उसकी सारी मेहनत अकारथ चली जाए और उसे पता भी न चले।

यह आदाब सिर्फ़ उस वक़्त के लिए नहीं था, बल्कि हर ज़माने के मुसलमानों के लिए यह सबक़ है कि वे अपने नबी (ﷺ) की शान में पूरा अदब रखें, उनके तरीक़े (सुन्नत) को अपनाएँ, उनके हुक्मों को सिर झुकाकर क़बूल करें, और उनके साथ अपनी मुहब्बत और इज़्ज़त का इज़हार करें। यही ईमान की निशानी है कि इंसान अपने नबी (ﷺ) को अपनी जान से भी ज़्यादा प्यारा समझे।

याद रखिए! नबी (ﷺ) की मुहब्बत और उनके आदाब का ख़याल रखना ईमान की बुनियाद है। जिसने उनके साथ अदब किया, अल्लाह ने उसे इज़्ज़त दी, और जिसने उनके साथ बेअदबी की, उसके आमाल (कर्म) बेकार हो गए। इसलिए हमें चाहिए कि हम अपने नबी (ﷺ) के तरीक़े पर चलें, उनकी सुन्नत को अपनाएँ, और उनके बताए हुए रास्ते पर साबित-क़दम रहें, ताकि हमारी नेकियाँ क़बूल हों और हमें पूरा अज्र मिले। यही हमारी कामयाबी है, दुनिया में भी और आख़िरत में भी।



📜 आयत 1-4 — सूरा अल-हुजुरात

1يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تُقَدِّمُوا بَيْنَ يَدَيِ اللَّهِ وَرَسُولِهِ ۖ وَاتَّقُوا اللَّهَ ۚ إِنَّ اللَّهَ سَمِيعٌ عَلِيمٌ
ऐ ईमानदारों ख़ुदा और उसके रसूल के सामने किसी बात में आगे न बढ़ जाया करो और ख़ुदा से डरते रहो बेशक ख़ुदा बड़ा सुनने वाला वाक़िफ़कार है
2يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَرْفَعُوا أَصْوَاتَكُمْ فَوْقَ صَوْتِ النَّبِيِّ وَلَا تَجْهَرُوا لَهُ بِالْقَوْلِ كَجَهْرِ بَعْضِكُمْ لِبَعْضٍ أَن تَحْبَطَ أَعْمَالُكُمْ وَأَنتُمْ لَا تَشْعُرُونَ
ऐ ईमानदारों (बोलने में) अपनी आवाज़े पैग़म्बर की आवाज़ से ऊँची न किया करो और जिस तरह तुम आपस में एक दूसरे से ज़ोर (ज़ोर) से बोला करते हो उनके रूबरू ज़ोर से न बोला करो (ऐसा न हो कि) तुम्हारा किया कराया सब अकारत हो जाए और तुमको ख़बर भी न हो
3إِنَّ الَّذِينَ يَغُضُّونَ أَصْوَاتَهُمْ عِندَ رَسُولِ اللَّهِ أُولَٰئِكَ الَّذِينَ امْتَحَنَ اللَّهُ قُلُوبَهُمْ لِلتَّقْوَىٰ ۚ لَهُم مَّغْفِرَةٌ وَأَجْرٌ عَظِيمٌ
बेशक जो लोग रसूले ख़ुदा के सामने अपनी आवाज़ें धीमी कर लिया करते हैं यही लोग हैं जिनके दिलों को ख़ुदा ने परहेज़गारी के लिए जाँच लिया है उनके लिए (आख़ेरत में) बख़्शिस और बड़ा अज्र है
4إِنَّ الَّذِينَ يُنَادُونَكَ مِن وَرَاءِ الْحُجُرَاتِ أَكْثَرُهُمْ لَا يَعْقِلُونَ
(ऐ रसूल) जो लोग तुमको हुजरों के बाहर से आवाज़ देते हैं उनमें के अक्सर बे अक्ल हैं
अल-हुजुरातकुरान सूची
18आयत
मदनीअवतरण स्थान
2आयत

अनुवाद — अल-हुजुरात 2

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Monday, September 28, 2026

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