अल-हुजुरात · 4/18
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-हुजुरात
إِنَّ الَّذِينَ يُنَادُونَكَ مِن وَرَاءِ الْحُجُرَاتِ أَكْثَرُهُمْ لَا يَعْقِلُونَ ۝٤
Innal lazeena yunaadoo naka minw waraaa`il hujuraati aksaruhum laa ya`qiloon
📖 हिंदी अर्थ
(ऐ रसूल) जो लोग तुमको हुजरों के बाहर से आवाज़ देते हैं उनमें के अक्सर बे अक्ल हैं

M Mishary Rashid Alafasy ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • يُنَادُونَكَ (तुम्हें पुकारते हैं) — ऊँची आवाज़ से पुकारना।
  • مِن وَرَاءِ الْحُجُرَاتِ (कक्षों के पीछे से) — यहाँ से मुराद नबी ﷺ की पवित्र पत्नियों के कक्ष हैं, जो मस्जिद-ए-नबवी के साथ जुड़े हुए थे।
  • الْحُجُرَاتِ — "حُجْرَة" की जमा (बहुवचन), जिसका अर्थ है कमरा या कक्ष।
  • لَا يَعْقِلُونَ (वे समझ नहीं रखते) — अर्थात उनमें अक्ल और समझ की कमी है, जो अदब (शिष्टाचार) का तक़ाज़ा करती।

तफ़सीर (व्याख्या):

इस आयत में अल्लाह तआला अपने नबी ﷺ के अदब (शिष्टाचार) की तालीम देते हुए उन लोगों की मज़म्मत (निंदा) कर रहा है जो नबी ﷺ को उनके कक्षों के पीछे से ऊँची आवाज़ से पुकारते थे। ये लोग आम तौर पर देहाती (बद्दू) थे, जो शहरी तहज़ीब और नबी ﷺ की शान-ओ-मर्तबा के अदब से वाक़िफ़ नहीं थे। वे बे-तकल्लुफ़ी से नबी ﷺ को उनके घर के बाहर से पुकार लेते थे, जबकि अल्लाह के रसूल ﷺ की शान यह है कि उनके साथ पूरे अदब और एहतिराम से पेश आया जाए।

अल्लाह तआला फ़रमाता है कि इनमें से अक्सर लोग अक्ल नहीं रखते, क्योंकि अक्लमंद इंसान अपने रसूल ﷺ के साथ इस तरह की बे-अदबी नहीं कर सकता। अक्ल का तक़ाज़ा है कि इंसान अल्लाह के नबी ﷺ की ताज़ीम करे, उनके सामने आवाज़ पस्त रखे, और उनके आराम और इज़्ज़त का ख़याल रखे। यह आयत उसूल-ए-अदब (शिष्टाचार के सिद्धांत) सिखाती है जो हर मुसलमान के लिए ज़रूरी है — चाहे वह नबी ﷺ के ज़माने में हो या उनकी उम्मत में से हो।

दावती पहलू:

यह आयत हमें सिखाती है कि इस्लाम सिर्फ़ इबादत का नाम नहीं, बल्कि अख़लाक़ और अदब का भी नाम है। जिस तरह हमारे प्यारे नबी ﷺ का अदब करना हमारी ईमान की निशानी है, उसी तरह आज हमें उनकी सुन्नत और उनके तरीक़े का एहतिराम करना चाहिए। अल्लाह तआला हमें अक्ल और समझ दे, ताकि हम अपने नबी ﷺ की मुहब्बत और अदब को अपने दिलों में बसा सकें, और उनके बताए हुए रास्ते पर चलकर दुनिया और आख़िरत की कामयाबी हासिल करें। याद रखिए, जो शख्स नबी ﷺ के अदब का पाबंद होता है, अल्लाह उसे दुनिया में इज़्ज़त देता है और आख़िरत में उसके दर्जे बुलंद करता है।



📜 आयत 2-6 — सूरा अल-हुजुरात

2يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَرْفَعُوا أَصْوَاتَكُمْ فَوْقَ صَوْتِ النَّبِيِّ وَلَا تَجْهَرُوا لَهُ بِالْقَوْلِ كَجَهْرِ بَعْضِكُمْ لِبَعْضٍ أَن تَحْبَطَ أَعْمَالُكُمْ وَأَنتُمْ لَا تَشْعُرُونَ
ऐ ईमानदारों (बोलने में) अपनी आवाज़े पैग़म्बर की आवाज़ से ऊँची न किया करो और जिस तरह तुम आपस में एक दूसरे से ज़ोर (ज़ोर) से बोला करते हो उनके रूबरू ज़ोर से न बोला करो (ऐसा न हो कि) तुम्हारा किया कराया सब अकारत हो जाए और तुमको ख़बर भी न हो
3إِنَّ الَّذِينَ يَغُضُّونَ أَصْوَاتَهُمْ عِندَ رَسُولِ اللَّهِ أُولَٰئِكَ الَّذِينَ امْتَحَنَ اللَّهُ قُلُوبَهُمْ لِلتَّقْوَىٰ ۚ لَهُم مَّغْفِرَةٌ وَأَجْرٌ عَظِيمٌ
बेशक जो लोग रसूले ख़ुदा के सामने अपनी आवाज़ें धीमी कर लिया करते हैं यही लोग हैं जिनके दिलों को ख़ुदा ने परहेज़गारी के लिए जाँच लिया है उनके लिए (आख़ेरत में) बख़्शिस और बड़ा अज्र है
4إِنَّ الَّذِينَ يُنَادُونَكَ مِن وَرَاءِ الْحُجُرَاتِ أَكْثَرُهُمْ لَا يَعْقِلُونَ
(ऐ रसूल) जो लोग तुमको हुजरों के बाहर से आवाज़ देते हैं उनमें के अक्सर बे अक्ल हैं
5وَلَوْ أَنَّهُمْ صَبَرُوا حَتَّىٰ تَخْرُجَ إِلَيْهِمْ لَكَانَ خَيْرًا لَّهُمْ ۚ وَاللَّهُ غَفُورٌ رَّحِيمٌ
और अगर ये लोग इतना ताम्मुल करते कि तुम ख़ुद निकल कर उनके पास आ जाते (तब बात करते) तो ये उनके लिए बेहतर था और ख़ुदा तो बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है
6يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا إِن جَاءَكُمْ فَاسِقٌ بِنَبَإٍ فَتَبَيَّنُوا أَن تُصِيبُوا قَوْمًا بِجَهَالَةٍ فَتُصْبِحُوا عَلَىٰ مَا فَعَلْتُمْ نَادِمِينَ
ऐ ईमानदारों अगर कोई बदकिरदार तुम्हारे पास कोई ख़बर लेकर आए तो ख़ूब तहक़ीक़ कर लिया करो (ऐसा न हो) कि तुम किसी क़ौम को नादानी से नुक़सान पहुँचाओ फिर अपने किए पर नादिम हो
अल-हुजुरातकुरान सूची
18आयत
मदनीअवतरण स्थान
4आयत

अनुवाद — अल-हुजुरात 4

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Monday, September 28, 2026

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