अल-माइदा · 40/120
अनुवाद उच्चारण — अल-माइदा
أَلَمْ تَعْلَمْ أَنَّ اللَّهَ لَهُ مُلْكُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ يُعَذِّبُ مَن يَشَاءُ وَيَغْفِرُ لِمَن يَشَاءُ ۗ وَاللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ ۝٤٠
Alam ta`lam annal laaha lahoo mulkus samaawaati wal ardi yu`az zibu many-yashaa`u wa yaghfiru limany-yashaaa`; wallaahu `alaa kulli shai`in Qadeer
📖 हिंदी अर्थ
ऐ शख्स क्या तू नहीं जानता कि सारे आसमान व ज़मीन (ग़रज़ दुनिया जहान) में ख़ास ख़ुदा की हुकूमत है जिसे चाहे अज़ाब करे और जिसे चाहे माफ़ कर दे और ख़ुदा तो हर चीज़ पर क़ादिर है
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • مُلْكُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ: आकाशों और धरती का स्वामित्व और पूर्ण प्रशासन।
  • يُعَذِّبُ مَن يَشَاءُ: जिसे चाहे दंड देता है (अपने न्याय के अनुसार)।
  • وَيَغْفِرُ لِمَن يَشَاءُ: और जिसे चाहे क्षमा कर देता है (अपने अनुग्रह और कृपा से)।
  • قَدِيرٌ: हर चीज़ पर पूर्ण सामर्थ्य रखने वाला।

विस्तृत व्याख्या:

हे नबी! क्या तुम्हें यह ज्ञात नहीं कि अकेले अल्लाह ही का आकाशों और धरती पर पूर्ण स्वामित्व है? वही इनका रचयिता, पालनहार और प्रशासक है। उसकी सत्ता के आगे कोई शक्ति नहीं चलती, और न ही उसके फैसले को टालने वाला कोई है। वह अपने न्याय और हिकमत के अनुसार जिसे चाहे दंड देता है—चाहे वह छोटा गुनाह हो या बड़ा—और अपने दयालु अनुग्रह से जिसे चाहे क्षमा कर देता है, चाहे उसका गुनाह कितना ही बड़ा क्यों न हो। उसकी क्षमा और दंड किसी के दबाव या सिफारिश से नहीं, बल्कि उसकी इच्छा और ज्ञान के अनुसार होते हैं। अल्लाह हर चीज़ पर पूर्ण सामर्थ्य रखता है—उसके लिए कोई कार्य कठिन नहीं, कोई चीज़ असंभव नहीं। वह जिसे चाहे मार्गदर्शन दे, जिसे चाहे पथभ्रष्ट करे, जिसे चाहे क्षमा करे और जिसे चाहे पकड़े। उसकी शक्ति और अधिकार से बाहर कुछ भी नहीं है।

शिक्षाएँ और लाभ:

  1. यह आयत हमें सिखाती है कि सारी बादशाही और अधिकार केवल अल्लाह के हाथ में है, इसलिए हमें किसी इंसान या ताकत से नहीं डरना चाहिए, बल्कि केवल अल्लाह से डरना चाहिए और उसी से उम्मीद रखनी चाहिए।
  2. अल्लाह की क्षमा का द्वार सबके लिए खुला है—चाहे गुनाह कितने ही बड़े हों, जब तक इंसान सच्चे दिल से तौबा करे, अल्लाह उसे माफ कर सकता है। यह हमें निराशा से बचाता है और तौबा की ओर प्रेरित करता है।
  3. अल्लाह की शक्ति असीमित है, इसलिए हमें अपनी कमजोरी और सीमाओं का एहसास करते हुए उसी पर भरोसा करना चाहिए। जो चीज़ें हमारे लिए असंभव लगती हैं, वे अल्लाह के लिए बिल्कुल आसान हैं।
  4. यह आयत हमें यह भी सिखाती है कि अल्लाह का फैसला न्याय और हिकमत पर आधारित है—वह कभी ज़ुल्म नहीं करता, बल्कि उसका दंड भी उसकी रहमत का ही एक पहलू है, जो इंसान को सुधारने के लिए आता है।
  5. इस आयत से मुसलमान को यह विश्वास मिलता है कि चाहे दुनिया में कितनी भी मुश्किलें और साजिशें क्यों न हों, अल्लाह ही सब कुछ करने पर कादिर है, और वही अपने बंदों की मदद करने वाला है।
🎧 सुनें

📜 आयत 38-42 — अल-माइदा

38وَالسَّارِقُ وَالسَّارِقَةُ فَاقْطَعُوا أَيْدِيَهُمَا جَزَاءً بِمَا كَسَبَا نَكَالًا مِّنَ اللَّهِ ۗ وَاللَّهُ عَزِيزٌ حَكِيمٌ
और चोर ख्वाह मर्द हो या औरत तुम उनके करतूत की सज़ा में उनका (दाहिना) हाथ काट डालो ये (उनकी सज़ा) ख़ुदा की तरफ़ से है और ख़ुदा (तो) बड़ा ज़बरदस्त हिकमत वाला है
39فَمَن تَابَ مِن بَعْدِ ظُلْمِهِ وَأَصْلَحَ فَإِنَّ اللَّهَ يَتُوبُ عَلَيْهِ ۗ إِنَّ اللَّهَ غَفُورٌ رَّحِيمٌ
हॉ जो अपने गुनाह के बाद तौबा कर ले और अपने चाल चलन दुरूस्त कर लें तो बेशक ख़ुदा भी तौबा कुबूल कर लेता है क्योंकि ख़ुदा तो बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है
40أَلَمْ تَعْلَمْ أَنَّ اللَّهَ لَهُ مُلْكُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ يُعَذِّبُ مَن يَشَاءُ وَيَغْفِرُ لِمَن يَشَاءُ ۗ وَاللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ
ऐ शख्स क्या तू नहीं जानता कि सारे आसमान व ज़मीन (ग़रज़ दुनिया जहान) में ख़ास ख़ुदा की हुकूमत है जिसे चाहे अज़ाब करे और जिसे चाहे माफ़ कर दे और ख़ुदा तो हर चीज़ पर क़ादिर है
41۞ يَا أَيُّهَا الرَّسُولُ لَا يَحْزُنكَ الَّذِينَ يُسَارِعُونَ فِي الْكُفْرِ مِنَ الَّذِينَ قَالُوا آمَنَّا بِأَفْوَاهِهِمْ وَلَمْ تُؤْمِن قُلُوبُهُمْ ۛ وَمِنَ الَّذِينَ هَادُوا ۛ سَمَّاعُونَ لِلْكَذِبِ سَمَّاعُونَ لِقَوْمٍ آخَرِينَ لَمْ يَأْتُوكَ ۖ يُحَرِّفُونَ الْكَلِمَ مِن بَعْدِ مَوَاضِعِهِ ۖ يَقُولُونَ إِنْ أُوتِيتُمْ هَٰذَا فَخُذُوهُ وَإِن لَّمْ تُؤْتَوْهُ فَاحْذَرُوا ۚ وَمَن يُرِدِ اللَّهُ فِتْنَتَهُ فَلَن تَمْلِكَ لَهُ مِنَ اللَّهِ شَيْئًا ۚ أُولَٰئِكَ الَّذِينَ لَمْ يُرِدِ اللَّهُ أَن يُطَهِّرَ قُلُوبَهُمْ ۚ لَهُمْ فِي الدُّنْيَا خِزْيٌ ۖ وَلَهُمْ فِي الْآخِرَةِ عَذَابٌ عَظِيمٌ
ऐ रसूल जो लोग कुफ़्र की तरफ़ लपक के चले जाते हैं तुम उनका ग़म न खाओ उनमें बाज़ तो ऐसे हैं कि अपने मुंह से बे तकल्लुफ़ कह देते हैं कि हम ईमान लाए हालॉकि उनके दिल बेईमान हैं और बाज़ यहूदी ऐसे हैं कि (जासूसी की ग़रज़ से) झूठी बातें बहुत (शौक से) सुनते हैं ताकि कुफ्फ़ार के दूसरे गिरोह को जो (अभी तक) तुम्हारे पास नहीं आए हैं सुनाएं ये लोग (तौरैत के) अल्फ़ाज़ की उनके असली मायने (मालूम होने) के बाद भी तहरीफ़ करते हैं (और लोगों से) कहते हैं कि (ये तौरैत का हुक्म है) अगर मोहम्मद की तरफ़ से (भी) तुम्हें यही हुक्म दिया जाय तो उसे मान लेना और अगर यह हुक्म तुमको न दिया जाए तो उससे अलग ही रहना और (ऐ रसूल) जिसको ख़ुदा ख़राब करना चाहता है तो उसके वास्ते ख़ुदा से तुम्हारा कुछ ज़ोर नहीं चल सकता यह लोग तो वही हैं जिनके दिलों को ख़ुदा ने (गुनाहों से) पाक करने का इरादा ही नहीं किया (बल्कि) उनके लिए तो दुनिया में भी रूसवाई है और आख़ेरत में भी (उनके लिए) बड़ा (भारी) अज़ाब होगा
42سَمَّاعُونَ لِلْكَذِبِ أَكَّالُونَ لِلسُّحْتِ ۚ فَإِن جَاءُوكَ فَاحْكُم بَيْنَهُمْ أَوْ أَعْرِضْ عَنْهُمْ ۖ وَإِن تُعْرِضْ عَنْهُمْ فَلَن يَضُرُّوكَ شَيْئًا ۖ وَإِنْ حَكَمْتَ فَاحْكُم بَيْنَهُم بِالْقِسْطِ ۚ إِنَّ اللَّهَ يُحِبُّ الْمُقْسِطِينَ
ये (कम्बख्त) झूठी बातों को बड़े शौक़ से सुनने वाले और बड़े ही हरामख़ोर हैं तो (ऐ रसूल) अगर ये लोग तुम्हारे पास (कोई मामला लेकर) आए तो तुमको इख्तेयार है ख्वाह उनके दरमियान फैसला कर दो या उनसे किनाराकशी करो और अगर तुम किनाराकश रहोगे तो (कुछ ख्याल न करो) ये लोग तुम्हारा हरगिज़ कुछ बिगाड़ नहीं सकते और अगर उनमें फैसला करो तो इन्साफ़ से फैसला करो क्योंकि ख़ुदा इन्साफ़ करने वालों को दोस्त रखता है
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अनुवाद — अल-माइदा 40

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Tuesday, August 18, 2026

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