Wa anih kum bainahum bimaaa anzalal laahu wa laa tattabi` ahwaaa`ahum wahzarhum ai yaftinooka `am ba`di maaa anzalal laahu ilaika fa in tawallaw fa`lam annamaa yureedul laahu ai yuseebahum biba`di zunoobihim; wa inna kaseeram minan naasi lafaasiqoon
📖 अनुवाद (हिंदी अर्थ)
📖 हिंदी अर्थ
तब (उस वक्त) ज़िन बातों में तुम इख्तेलाफ़ करते वह तुम्हें बता देगा और (ऐ रसूल) हम फिर कहते हैं कि जो एहकाम ख़ुदा नाज़िल किए हैं तुम उसके मुताबिक़ फैसला करो और उनकी (बेजा) ख्वाहिशे नफ़सियानी की पैरवी न करो (बल्कि) तुम उनसे बचे रहो (ऐसा न हो) कि किसी हुक्म से जो ख़ुदा ने तुम पर नाज़िल किया है तुमको ये लोग भटका दें फिर अगर ये लोग तुम्हारे हुक्म से मुंह मोड़ें तो समझ लो कि (गोया) ख़ुदा ही की मरज़ी है कि उनके बाज़ गुनाहों की वजह से उन्हें मुसीबत में फॅसा दे और इसमें तो शक ही नहीं कि बहुतेरे लोग बदचलन हैं
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اور (ہم پھر تاکید کرتے ہیں کہ) جو (حکم) خدا نے نازل فرمایا ہے اسی کے مطابق ان میں فیصلہ کرنا اور ان کی خواہشوں کی پیروی نہ کرنا اور ان سے بچتے رہنا کہ کسی حکم سے جو خدا نے تم پر نازل فرمایا ہے یہ کہیں تم کو بہکانہ دیں اگر یہ نہ مانیں تو جان لو کہ خدا چاہتا ہے کہ ان کے بعض گناہوں کے سبب ان پر مصیبت نازل کرے اور اکثر لوگ تو نافرمان ہیں
तब (उस वक्त) ज़िन बातों में तुम इख्तेलाफ़ करते वह तुम्हें बता देगा और (ऐ रसूल) हम फिर कहते हैं कि जो एहकाम ख़ुदा नाज़िल किए हैं तुम उसके मुताबिक़ फैसला करो और उनकी (बेजा) ख्वाहिशे नफ़सियानी की पैरवी न करो (बल्कि) तुम उनसे बचे रहो (ऐसा न हो) कि किसी हुक्म से जो ख़ुदा ने तुम पर नाज़िल किया है तुमको ये लोग भटका दें फिर अगर ये लोग तुम्हारे हुक्म से मुंह मोड़ें तो समझ लो कि (गोया) ख़ुदा ही की मरज़ी है कि उनके बाज़ गुनाहों की वजह से उन्हें मुसीबत में फॅसा दे और इसमें तो शक ही नहीं कि बहुतेरे लोग बदचलन हैं
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
احْكُم: न्याय करो, फ़ैसला करो।
أَهْوَاءَهُمْ: उनकी मनमानी इच्छाएँ, जो हक़ के ख़िलाफ़ हों।
يَفْتِنُوكَ: तुम्हें बहकाएँ, तुम्हें धर्म से भटकाने की कोशिश करें।
تَوَلَّوْا: मुँह मोड़ लें, क़ुबूल करने से इनकार कर दें।
يُصِيبَهُم: उन्हें पहुँचाए, उन पर लाए।
لَفَاسِقُونَ: अवज्ञाकारी, हुक्म से निकल जाने वाले।
तफ़सीर (व्याख्या):
ऐ रसूल! अल्लाह ने तुम्हें हुक्म दिया है कि जब ये यहूदी अपने झगड़े लेकर तुम्हारे पास आएँ, तो तुम उनके बीच उसी क़ानून के अनुसार फ़ैसला करो जो अल्लाह ने तुम पर उतारा है—यानी कुरआन और उसकी शरीअत के मुताबिक़। तुम उनकी मनमानी इच्छाओं और ख्वाहिशों की पैरवी मत करना, क्योंकि वे चाहते हैं कि तुम उनके पक्ष में झुक जाओ। और उनसे सावधान रहो, क्योंकि वे तुम्हें बहकाने और तुम्हें उस हक़ से भटकाने की कोशिश करेंगे जो अल्लाह ने तुम पर उतारा है—चाहे वह किसी एक मामले में ही क्यों न हो। वे इस मामले में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे।
फिर अगर वे तुम्हारे फ़ैसले को क़ुबूल करने से मुँह मोड़ लें और उसे न मानें, तो तुम यह जान लो कि अल्लाह उन्हें उनके कुछ गुनाहों की सज़ा दुनिया में ही देना चाहता है—यानी यह मुँह मोड़ना और हक़ से इनकार करना उनके लिए एक आज़माइश और सज़ा है। और आख़िरत में उन्हें उनके सारे गुनाहों की पूरी सज़ा मिलेगी। बेशक बहुत से लोग—और ख़ासकर ये यहूदी—अल्लाह की इताअत से निकल जाने वाले और उसके हुक्म की अवज्ञा करने वाले हैं। वे कुफ़्र में सरकशी और ज़्यादती करते हैं।
फ़ायदे (सबक़):
एक हाकिम और इंसाफ़ करने वाले के लिए यह ज़रूरी है कि वह अल्लाह की उतारी हुई शरीअत के अनुसार ही फ़ैसला करे, न कि अपनी राय, रिवाज या दूसरों की ख्वाहिश के अनुसार।
हक़ और इंसाफ़ की राह पर क़ायम रहने के लिए लोगों की मनमानी इच्छाओं से बचना ज़रूरी है—चाहे वे कितने ही करीबी या ताक़तवर क्यों न हों।
दुश्मनों की चालों से सावधान रहना चाहिए; वे किसी भी तरह से इंसान को उसके दीन से भटकाने की कोशिश करते हैं, इसलिए हर वक़्त चौकन्ना रहना हिकमत है।
जब लोग हक़ को क़ुबूल नहीं करते, तो यह उनके लिए अल्लाह की तरफ़ से एक तनबीह और सज़ा होती है—यह जानकर मुसलमान को तसल्ली होती है कि हक़ की मदद अल्लाह करता है।
यह आयत मुसलमानों को सिखाती है कि इंसाफ़ में किसी की परवाह नहीं करनी चाहिए, और अल्लाह का हुक्म ही सबसे बड़ा है। जो लोग इससे मुँह मोड़ते हैं, वे अल्लाह की रहमत से दूर हो जाते हैं और फ़ासिक़ कहलाते हैं।
और इन्जील वालों (नसारा) को जो कुछ ख़ुदा ने (उसमें) नाज़िल किया है उसके मुताबिक़ हुक्म करना चाहिए और जो शख्स ख़ुदा की नाज़िल की हुई (किताब के मुआफ़िक) हुक्म न दे तो ऐसे ही लोग बदकार हैं
और (ऐ रसूल) हमने तुम पर भी बरहक़ किताब नाज़िल की जो किताब (उसके पहले से) उसके वक्त में मौजूद है उसकी तसदीक़ करती है और उसकी निगेहबान (भी) है जो कुछ तुम पर ख़ुदा ने नाज़िल किया है उसी के मुताबिक़ तुम भी हुक्म दो और जो हक़ बात ख़ुदा की तरफ़ से आ चुकी है उससे कतरा के उन लोगों की ख्वाहिशे नफ़सियानी की पैरवी न करो और हमने तुम में हर एक के वास्ते (हस्बे मसलेहते वक्त) एक एक शरीयत और ख़ास तरीक़े पर मुक़र्रर कर दिया और अगर ख़ुदा चाहता तो तुम सब के सब को एक ही (शरीयत की) उम्मत बना देता मगर (मुख़तलिफ़ शरीयतों से) ख़ुदा का मतलब यह था कि जो कुछ तुम्हें दिया है उसमें तुम्हारा इमतेहान करे बस तुम नेकी में लपक कर आगे बढ़ जाओ और (यक़ीन जानो कि) तुम सब को ख़ुदा ही की तरफ़ लौट कर जाना है
तब (उस वक्त) ज़िन बातों में तुम इख्तेलाफ़ करते वह तुम्हें बता देगा और (ऐ रसूल) हम फिर कहते हैं कि जो एहकाम ख़ुदा नाज़िल किए हैं तुम उसके मुताबिक़ फैसला करो और उनकी (बेजा) ख्वाहिशे नफ़सियानी की पैरवी न करो (बल्कि) तुम उनसे बचे रहो (ऐसा न हो) कि किसी हुक्म से जो ख़ुदा ने तुम पर नाज़िल किया है तुमको ये लोग भटका दें फिर अगर ये लोग तुम्हारे हुक्म से मुंह मोड़ें तो समझ लो कि (गोया) ख़ुदा ही की मरज़ी है कि उनके बाज़ गुनाहों की वजह से उन्हें मुसीबत में फॅसा दे और इसमें तो शक ही नहीं कि बहुतेरे लोग बदचलन हैं
ऐ ईमानदारों यहूदियों और नसरानियों को अपना सरपरस्त न बनाओ (क्योंकि) ये लोग (तुम्हारे मुख़ालिफ़ हैं मगर) बाहम एक दूसरे के दोस्त हैं और (याद रहे कि) तुममें से जिसने उनको अपना सरपरस्त बनाया पस फिर वह भी उन्हीं लोगों में से हो गया बेशक ख़ुदा ज़ालिम लोगों को राहे रास्त पर नहीं लाता
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