अल-माइदा · 50/120
अनुवाद उच्चारण — अल-माइदा
أَفَحُكْمَ الْجَاهِلِيَّةِ يَبْغُونَ ۚ وَمَنْ أَحْسَنُ مِنَ اللَّهِ حُكْمًا لِّقَوْمٍ يُوقِنُونَ ۝٥٠
Afahukmal jaahiliyyati yabghoon; wa man ahsanu minal laahi hukmal liqawminy yooqinoon
📖 हिंदी अर्थ
क्या ये लोग (ज़मानाए) जाहिलीयत के हुक्म की (तुमसे भी) तमन्ना रखते हैं हालॉकि यक़ीन करने वाले लोगों के वास्ते हुक्मे ख़ुदा से बेहतर कौन होगा
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • أَفَحُكْمَ الْجَاهِلِيَّةِ يَبْغُونَ: क्या वे जाहिलियत (अज्ञानता) का फैसला चाहते हैं? अर्थात, क्या वे इस्लाम से पहले के अरबों के रीति-रिवाजों और अंधविश्वासों पर आधारित निर्णय की इच्छा रखते हैं?
  • يَبْغُونَ: वे चाहते हैं, तलाश करते हैं।
  • يُوقِنُونَ: वे जो विश्वास रखते हैं, पक्का यकीन रखने वाले।

तफसीर (व्याख्या):

यह आयत उन लोगों की स्थिति को उजागर करती है जो अल्लाह के फैसले को छोड़कर दूसरे फैसलों की ओर मुड़ते हैं। अल्लाह तआला पूछते हैं: क्या ये लोग जाहिलियत (अज्ञानता) का फैसला चाहते हैं? यानी, क्या वे उस ज़माने के रीति-रिवाजों, अंधविश्वासों और मनमानी पर आधारित निर्णयों को पसंद करते हैं, जब लोग अपनी इच्छाओं और अहंकार के अनुसार फैसले करते थे, बिना किसी ईश्वरीय मार्गदर्शन के? यह प्रश्न उन लोगों के लिए है जो अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के फैसले से इनकार करते हैं और दूसरे नियमों-कानूनों की तरफ भागते हैं।

फिर अल्लाह तआला फरमाते हैं: "और अल्लाह से बेहतर फैसला करने वाला कौन है, उन लोगों के लिए जो यकीन रखते हैं?" यानी, जो लोग सच्चे दिल से अल्लाह पर ईमान रखते हैं और उसकी रहमत, हिकमत और इंसाफ पर पक्का विश्वास रखते हैं, वे अच्छी तरह जानते हैं कि अल्लाह का फैसला सबसे अच्छा, सबसे न्यायपूर्ण और सबसे सही है। अल्लाह का फैसला इंसानी फैसलों से कहीं बेहतर है, क्योंकि वह सर्वज्ञ है, सब कुछ जानता है, और उसका फैसला पूर्ण न्याय और हिकमत पर आधारित होता है। जो लोग यकीन रखते हैं, वे अल्लाह के फैसले को खुशी से स्वीकार करते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि इसमें उनकी भलाई है।

फायदे (शिक्षाएँ):

  1. अल्लाह का फैसला ही सबसे अच्छा और सबसे न्यायपूर्ण है। इंसानी कानून और नियम चाहे कितने भी अच्छे क्यों न हों, अल्लाह के कानून के सामने वे अधूरे हैं, क्योंकि अल्लाह हर चीज़ का जानने वाला है।
  2. जाहिलियत का फैसला यानी अज्ञानता, अंधविश्वास और मनमानी पर आधारित निर्णय, मुसलमानों के लिए कभी स्वीकार्य नहीं होना चाहिए। हमें हर मामले में अल्लाह और उसके रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की शिक्षाओं को प्राथमिकता देनी चाहिए।
  3. यह आयत हमें सिखाती है कि सच्चा ईमान और यकीन इंसान को अल्लाह के फैसले पर पूरा भरोसा देता है। जब हमें अल्लाह पर पक्का यकीन होता है, तो हम उसके फैसले को खुशी से स्वीकार करते हैं, चाहे वह हमारी इच्छाओं के खिलाफ ही क्यों न हो।
  4. यह आयत मुसलमानों को इस्लामी कानून (शरीयत) पर गर्व करने की शिक्षा देती है, क्योंकि यह अल्लाह की ओर से है, और अल्लाह से बेहतर फैसला करने वाला कोई नहीं है।
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📜 आयत 48-52 — अल-माइदा

48وَأَنزَلْنَا إِلَيْكَ الْكِتَابَ بِالْحَقِّ مُصَدِّقًا لِّمَا بَيْنَ يَدَيْهِ مِنَ الْكِتَابِ وَمُهَيْمِنًا عَلَيْهِ ۖ فَاحْكُم بَيْنَهُم بِمَا أَنزَلَ اللَّهُ ۖ وَلَا تَتَّبِعْ أَهْوَاءَهُمْ عَمَّا جَاءَكَ مِنَ الْحَقِّ ۚ لِكُلٍّ جَعَلْنَا مِنكُمْ شِرْعَةً وَمِنْهَاجًا ۚ وَلَوْ شَاءَ اللَّهُ لَجَعَلَكُمْ أُمَّةً وَاحِدَةً وَلَٰكِن لِّيَبْلُوَكُمْ فِي مَا آتَاكُمْ ۖ فَاسْتَبِقُوا الْخَيْرَاتِ ۚ إِلَى اللَّهِ مَرْجِعُكُمْ جَمِيعًا فَيُنَبِّئُكُم بِمَا كُنتُمْ فِيهِ تَخْتَلِفُونَ
और (ऐ रसूल) हमने तुम पर भी बरहक़ किताब नाज़िल की जो किताब (उसके पहले से) उसके वक्त में मौजूद है उसकी तसदीक़ करती है और उसकी निगेहबान (भी) है जो कुछ तुम पर ख़ुदा ने नाज़िल किया है उसी के मुताबिक़ तुम भी हुक्म दो और जो हक़ बात ख़ुदा की तरफ़ से आ चुकी है उससे कतरा के उन लोगों की ख्वाहिशे नफ़सियानी की पैरवी न करो और हमने तुम में हर एक के वास्ते (हस्बे मसलेहते वक्त) एक एक शरीयत और ख़ास तरीक़े पर मुक़र्रर कर दिया और अगर ख़ुदा चाहता तो तुम सब के सब को एक ही (शरीयत की) उम्मत बना देता मगर (मुख़तलिफ़ शरीयतों से) ख़ुदा का मतलब यह था कि जो कुछ तुम्हें दिया है उसमें तुम्हारा इमतेहान करे बस तुम नेकी में लपक कर आगे बढ़ जाओ और (यक़ीन जानो कि) तुम सब को ख़ुदा ही की तरफ़ लौट कर जाना है
49وَأَنِ احْكُم بَيْنَهُم بِمَا أَنزَلَ اللَّهُ وَلَا تَتَّبِعْ أَهْوَاءَهُمْ وَاحْذَرْهُمْ أَن يَفْتِنُوكَ عَن بَعْضِ مَا أَنزَلَ اللَّهُ إِلَيْكَ ۖ فَإِن تَوَلَّوْا فَاعْلَمْ أَنَّمَا يُرِيدُ اللَّهُ أَن يُصِيبَهُم بِبَعْضِ ذُنُوبِهِمْ ۗ وَإِنَّ كَثِيرًا مِّنَ النَّاسِ لَفَاسِقُونَ
तब (उस वक्त) ज़िन बातों में तुम इख्तेलाफ़ करते वह तुम्हें बता देगा और (ऐ रसूल) हम फिर कहते हैं कि जो एहकाम ख़ुदा नाज़िल किए हैं तुम उसके मुताबिक़ फैसला करो और उनकी (बेजा) ख्वाहिशे नफ़सियानी की पैरवी न करो (बल्कि) तुम उनसे बचे रहो (ऐसा न हो) कि किसी हुक्म से जो ख़ुदा ने तुम पर नाज़िल किया है तुमको ये लोग भटका दें फिर अगर ये लोग तुम्हारे हुक्म से मुंह मोड़ें तो समझ लो कि (गोया) ख़ुदा ही की मरज़ी है कि उनके बाज़ गुनाहों की वजह से उन्हें मुसीबत में फॅसा दे और इसमें तो शक ही नहीं कि बहुतेरे लोग बदचलन हैं
50أَفَحُكْمَ الْجَاهِلِيَّةِ يَبْغُونَ ۚ وَمَنْ أَحْسَنُ مِنَ اللَّهِ حُكْمًا لِّقَوْمٍ يُوقِنُونَ
क्या ये लोग (ज़मानाए) जाहिलीयत के हुक्म की (तुमसे भी) तमन्ना रखते हैं हालॉकि यक़ीन करने वाले लोगों के वास्ते हुक्मे ख़ुदा से बेहतर कौन होगा
51۞ يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَتَّخِذُوا الْيَهُودَ وَالنَّصَارَىٰ أَوْلِيَاءَ ۘ بَعْضُهُمْ أَوْلِيَاءُ بَعْضٍ ۚ وَمَن يَتَوَلَّهُم مِّنكُمْ فَإِنَّهُ مِنْهُمْ ۗ إِنَّ اللَّهَ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الظَّالِمِينَ
ऐ ईमानदारों यहूदियों और नसरानियों को अपना सरपरस्त न बनाओ (क्योंकि) ये लोग (तुम्हारे मुख़ालिफ़ हैं मगर) बाहम एक दूसरे के दोस्त हैं और (याद रहे कि) तुममें से जिसने उनको अपना सरपरस्त बनाया पस फिर वह भी उन्हीं लोगों में से हो गया बेशक ख़ुदा ज़ालिम लोगों को राहे रास्त पर नहीं लाता
52فَتَرَى الَّذِينَ فِي قُلُوبِهِم مَّرَضٌ يُسَارِعُونَ فِيهِمْ يَقُولُونَ نَخْشَىٰ أَن تُصِيبَنَا دَائِرَةٌ ۚ فَعَسَى اللَّهُ أَن يَأْتِيَ بِالْفَتْحِ أَوْ أَمْرٍ مِّنْ عِندِهِ فَيُصْبِحُوا عَلَىٰ مَا أَسَرُّوا فِي أَنفُسِهِمْ نَادِمِينَ
तो (ऐ रसूल) जिन लोगों के दिलों में (नेफ़ाक़ की) बीमारी है तुम उन्हें देखोगे कि उनमें दौड़ दौड़ के मिले जाते हैं और तुमसे उसकी वजह यह बयान करते हैं कि हम तो इससे डरते हैं कि कहीं ऐसा न हो उनके न (मिलने से) ज़माने की गर्दिश में न मुब्तिला हो जाएं तो अनक़रीब ही ख़ुदा (मुसलमानों की) फ़तेह या कोई और बात अपनी तरफ़ से ज़ाहिर कर देगा तब यह लोग इस बदगुमानी पर जो अपने जी में छिपाते थे शर्माएंगे (
अल-माइदाकुरान सूची
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50आयत

अनुवाद — अल-माइदा 50

सूरा अल-माइदा आयत 50 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : क्या ये लोग (ज़मानाए) जाहिलीयत के हुक्म की (तुमसे भी)…

सूरा आयत 50/120 — अल-माइदा المائدة (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अल-माइदा सुनें, अल-माइदा अनुवाद, अल-माइदा mp3, अल-माइदा pdf. आयत 48–52. हिंदी अर्थ: اردو.




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Tuesday, August 18, 2026

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