अल-माइदा · 48/120
अनुवाद उच्चारण — अल-माइदा
وَأَنزَلْنَا إِلَيْكَ الْكِتَابَ بِالْحَقِّ مُصَدِّقًا لِّمَا بَيْنَ يَدَيْهِ مِنَ الْكِتَابِ وَمُهَيْمِنًا عَلَيْهِ ۖ فَاحْكُم بَيْنَهُم بِمَا أَنزَلَ اللَّهُ ۖ وَلَا تَتَّبِعْ أَهْوَاءَهُمْ عَمَّا جَاءَكَ مِنَ الْحَقِّ ۚ لِكُلٍّ جَعَلْنَا مِنكُمْ شِرْعَةً وَمِنْهَاجًا ۚ وَلَوْ شَاءَ اللَّهُ لَجَعَلَكُمْ أُمَّةً وَاحِدَةً وَلَٰكِن لِّيَبْلُوَكُمْ فِي مَا آتَاكُمْ ۖ فَاسْتَبِقُوا الْخَيْرَاتِ ۚ إِلَى اللَّهِ مَرْجِعُكُمْ جَمِيعًا فَيُنَبِّئُكُم بِمَا كُنتُمْ فِيهِ تَخْتَلِفُونَ ۝٤٨
Wa anzalnaa ilaikal Kitaaba bilhaqqi musaddiqallimaa baina yadaihi minal Kitaabi wa muhaiminan `alaihi fahkum bainahum bimaa anzalal laahu wa laa tattabi ahwaaa`ahum `ammaa jaaa`aka minal haqq; likullin ja`alnaa minkum shir`atanw wa minhaajaa; wa law shaaa`al laahu laja`alakum ummatanw waahidatanw wa laakil liyabluwakum fee maa aataakum fastabiqul khairaat; ilal laahi arji`ukum jamee`an fayunab bi`ukum bimaa kuntum feehi takhtalifoon
📖 हिंदी अर्थ
और (ऐ रसूल) हमने तुम पर भी बरहक़ किताब नाज़िल की जो किताब (उसके पहले से) उसके वक्त में मौजूद है उसकी तसदीक़ करती है और उसकी निगेहबान (भी) है जो कुछ तुम पर ख़ुदा ने नाज़िल किया है उसी के मुताबिक़ तुम भी हुक्म दो और जो हक़ बात ख़ुदा की तरफ़ से आ चुकी है उससे कतरा के उन लोगों की ख्वाहिशे नफ़सियानी की पैरवी न करो और हमने तुम में हर एक के वास्ते (हस्बे मसलेहते वक्त) एक एक शरीयत और ख़ास तरीक़े पर मुक़र्रर कर दिया और अगर ख़ुदा चाहता तो तुम सब के सब को एक ही (शरीयत की) उम्मत बना देता मगर (मुख़तलिफ़ शरीयतों से) ख़ुदा का मतलब यह था कि जो कुछ तुम्हें दिया है उसमें तुम्हारा इमतेहान करे बस तुम नेकी में लपक कर आगे बढ़ जाओ और (यक़ीन जानो कि) तुम सब को ख़ुदा ही की तरफ़ लौट कर जाना है

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अनुवाद — Tafsir

कठिन शब्दों के अर्थ:

  • مُهَيْمِنًا: रक्षक, निगरानी करने वाला, सत्यापित करने वाला।
  • شِرْعَةً: शरीयत, धार्मिक कानून, जीवन का तरीका।
  • مِنْهَاجًا: स्पष्ट मार्ग, व्यवस्था, रास्ता।
  • لِيَبْلُوَكُمْ: ताकि वह तुम्हारी परीक्षा ले।
  • فَاسْتَبِقُوا: जल्दी करो, प्रतिस्पर्धा करो।

तफसीर (व्याख्या):

ऐ प्यारे नबी (ﷺ)! हमने आप पर यह कुरआन सत्य के साथ उतारा है। यह वह किताब है जो अपने से पहले आई हुई सभी आसमानी किताबों (तौरात, इंजील, ज़बूर) की सच्चाई की गवाही देती है। जो कुछ उन किताबों में सही और सच्चा है, वह इसकी पुष्टि करती है, और जो कुछ उनमें बदलाव और मिलावट हो गई थी, उसे स्पष्ट करती है। यह कुरआन उन सभी किताबों पर निगरानी रखने वाला, उनकी रक्षा करने वाला और उनका फैसला करने वाला है।

अतः ऐ नबी! जब अहले-किताब (यहूदी और ईसाई) अपने झगड़ों को लेकर आपके पास आएँ, तो आप उनके बीच उसी कानून के अनुसार फैसला करें जो अल्लाह ने आप पर उतारा है—यानी कुरआन और सुन्नत के अनुसार। और सावधान रहें! उनकी इच्छाओं और मनमानी के पीछे न चलें, क्योंकि आपके पास स्पष्ट सत्य आ चुका है। उनकी बातों, उनके दबाव या उनके रीति-रिवाजों के कारण सत्य को न छोड़ें।

अल्लाह ने हर उम्मत के लिए एक शरीयत (कानून) और एक स्पष्ट मार्ग निर्धारित किया है। पहले के नबियों के लिए अलग कानून थे, और आपके लिए एक अलग और पूर्ण कानून है। यह अंतर उनकी बुद्धिमत्ता और योजना का हिस्सा है। अगर अल्लाह चाहता, तो वह सभी लोगों को एक ही उम्मत और एक ही कानून पर इकट्ठा कर देता। लेकिन उसने ऐसा इसलिए नहीं किया ताकि वह तुम्हारी परीक्षा ले—कि कौन सच्चे दिल से उसकी आज्ञा का पालन करता है और कौन अपनी इच्छाओं का।

इसलिए, ऐ मुसलमानों! तुम अपने जीवन में अच्छाई और नेकी के कामों में एक-दूसरे से आगे बढ़ने की कोशिश करो। नेकियों में प्रतिस्पर्धा करो, क्योंकि यही सच्ची सफलता का रास्ता है। याद रखो, तुम सबको एक दिन अल्लाह की ओर लौटना है। वही तुम्हारा अंतिम फैसला करने वाला है। जिस दिन तुम उसके सामने खड़े होंगे, वह तुम्हें बता देगा कि जिन चीज़ों में तुम मतभेद करते थे, उनका सही फैसला क्या था। वह हर एक को उसके कर्मों के अनुसार बदला देगा—नेकी का नेक बदला और बुराई का उचित दंड।

यह आयत हमें सिखाती है कि कुरआन ही हमारा मार्गदर्शक है, और हमें हर मामले में उसी को अपनाना चाहिए। यह हमें यह भी सिखाती है कि हमें अच्छाई के कामों में आगे रहना चाहिए, क्योंकि यही हमारी सच्ची पहचान है। अल्लाह ने हमें जो कुरआन दिया है, वह सबसे पूर्ण और अंतिम मार्गदर्शन है, और उस पर चलना ही हमारी सफलता है।



📜 आयत 46-50 — अल-माइदा

46وَقَفَّيْنَا عَلَىٰ آثَارِهِم بِعِيسَى ابْنِ مَرْيَمَ مُصَدِّقًا لِّمَا بَيْنَ يَدَيْهِ مِنَ التَّوْرَاةِ ۖ وَآتَيْنَاهُ الْإِنجِيلَ فِيهِ هُدًى وَنُورٌ وَمُصَدِّقًا لِّمَا بَيْنَ يَدَيْهِ مِنَ التَّوْرَاةِ وَهُدًى وَمَوْعِظَةً لِّلْمُتَّقِينَ
और हम ने उन्हीं पैग़म्बरों के क़दम ब क़दम मरियम के बेटे ईसा को चलाया और वह इस किताब तौरैत की भी तस्दीक़ करते थे जो उनके सामने (पहले से) मौजूद थी और हमने उनको इन्जील (भी) अता की जिसमें (लोगों के लिए हर तरह की) हिदायत थी और नूर (ईमान) और वह इस किताब तौरेत की जो वक्ते नुज़ूले इन्जील (पहले से) मौजूद थी तसदीक़ करने वाली और परहेज़गारों की हिदायत व नसीहत थी
47وَلْيَحْكُمْ أَهْلُ الْإِنجِيلِ بِمَا أَنزَلَ اللَّهُ فِيهِ ۚ وَمَن لَّمْ يَحْكُم بِمَا أَنزَلَ اللَّهُ فَأُولَٰئِكَ هُمُ الْفَاسِقُونَ
और इन्जील वालों (नसारा) को जो कुछ ख़ुदा ने (उसमें) नाज़िल किया है उसके मुताबिक़ हुक्म करना चाहिए और जो शख्स ख़ुदा की नाज़िल की हुई (किताब के मुआफ़िक) हुक्म न दे तो ऐसे ही लोग बदकार हैं
48وَأَنزَلْنَا إِلَيْكَ الْكِتَابَ بِالْحَقِّ مُصَدِّقًا لِّمَا بَيْنَ يَدَيْهِ مِنَ الْكِتَابِ وَمُهَيْمِنًا عَلَيْهِ ۖ فَاحْكُم بَيْنَهُم بِمَا أَنزَلَ اللَّهُ ۖ وَلَا تَتَّبِعْ أَهْوَاءَهُمْ عَمَّا جَاءَكَ مِنَ الْحَقِّ ۚ لِكُلٍّ جَعَلْنَا مِنكُمْ شِرْعَةً وَمِنْهَاجًا ۚ وَلَوْ شَاءَ اللَّهُ لَجَعَلَكُمْ أُمَّةً وَاحِدَةً وَلَٰكِن لِّيَبْلُوَكُمْ فِي مَا آتَاكُمْ ۖ فَاسْتَبِقُوا الْخَيْرَاتِ ۚ إِلَى اللَّهِ مَرْجِعُكُمْ جَمِيعًا فَيُنَبِّئُكُم بِمَا كُنتُمْ فِيهِ تَخْتَلِفُونَ
और (ऐ रसूल) हमने तुम पर भी बरहक़ किताब नाज़िल की जो किताब (उसके पहले से) उसके वक्त में मौजूद है उसकी तसदीक़ करती है और उसकी निगेहबान (भी) है जो कुछ तुम पर ख़ुदा ने नाज़िल किया है उसी के मुताबिक़ तुम भी हुक्म दो और जो हक़ बात ख़ुदा की तरफ़ से आ चुकी है उससे कतरा के उन लोगों की ख्वाहिशे नफ़सियानी की पैरवी न करो और हमने तुम में हर एक के वास्ते (हस्बे मसलेहते वक्त) एक एक शरीयत और ख़ास तरीक़े पर मुक़र्रर कर दिया और अगर ख़ुदा चाहता तो तुम सब के सब को एक ही (शरीयत की) उम्मत बना देता मगर (मुख़तलिफ़ शरीयतों से) ख़ुदा का मतलब यह था कि जो कुछ तुम्हें दिया है उसमें तुम्हारा इमतेहान करे बस तुम नेकी में लपक कर आगे बढ़ जाओ और (यक़ीन जानो कि) तुम सब को ख़ुदा ही की तरफ़ लौट कर जाना है
49وَأَنِ احْكُم بَيْنَهُم بِمَا أَنزَلَ اللَّهُ وَلَا تَتَّبِعْ أَهْوَاءَهُمْ وَاحْذَرْهُمْ أَن يَفْتِنُوكَ عَن بَعْضِ مَا أَنزَلَ اللَّهُ إِلَيْكَ ۖ فَإِن تَوَلَّوْا فَاعْلَمْ أَنَّمَا يُرِيدُ اللَّهُ أَن يُصِيبَهُم بِبَعْضِ ذُنُوبِهِمْ ۗ وَإِنَّ كَثِيرًا مِّنَ النَّاسِ لَفَاسِقُونَ
तब (उस वक्त) ज़िन बातों में तुम इख्तेलाफ़ करते वह तुम्हें बता देगा और (ऐ रसूल) हम फिर कहते हैं कि जो एहकाम ख़ुदा नाज़िल किए हैं तुम उसके मुताबिक़ फैसला करो और उनकी (बेजा) ख्वाहिशे नफ़सियानी की पैरवी न करो (बल्कि) तुम उनसे बचे रहो (ऐसा न हो) कि किसी हुक्म से जो ख़ुदा ने तुम पर नाज़िल किया है तुमको ये लोग भटका दें फिर अगर ये लोग तुम्हारे हुक्म से मुंह मोड़ें तो समझ लो कि (गोया) ख़ुदा ही की मरज़ी है कि उनके बाज़ गुनाहों की वजह से उन्हें मुसीबत में फॅसा दे और इसमें तो शक ही नहीं कि बहुतेरे लोग बदचलन हैं
50أَفَحُكْمَ الْجَاهِلِيَّةِ يَبْغُونَ ۚ وَمَنْ أَحْسَنُ مِنَ اللَّهِ حُكْمًا لِّقَوْمٍ يُوقِنُونَ
क्या ये लोग (ज़मानाए) जाहिलीयत के हुक्म की (तुमसे भी) तमन्ना रखते हैं हालॉकि यक़ीन करने वाले लोगों के वास्ते हुक्मे ख़ुदा से बेहतर कौन होगा
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अनुवाद — अल-माइदा 48

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सूरा आयत 48/120 — अल-माइदा المائدة (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अल-माइदा सुनें, अल-माइदा अनुवाद, अल-माइदा mp3, अल-माइदा pdf. आयत 46–50. हिंदी अर्थ: اردو.




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Wednesday, August 19, 2026

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