अल-माइदा · 52/120
अनुवाद उच्चारण — अल-माइदा
فَتَرَى الَّذِينَ فِي قُلُوبِهِم مَّرَضٌ يُسَارِعُونَ فِيهِمْ يَقُولُونَ نَخْشَىٰ أَن تُصِيبَنَا دَائِرَةٌ ۚ فَعَسَى اللَّهُ أَن يَأْتِيَ بِالْفَتْحِ أَوْ أَمْرٍ مِّنْ عِندِهِ فَيُصْبِحُوا عَلَىٰ مَا أَسَرُّوا فِي أَنفُسِهِمْ نَادِمِينَ ۝٥٢
Fataral lazeena fee quloobihim maraduny yusaari`oona feehim yaqooloona nakhshaaa an tuseebanaa daaa`irah; fa`asallaahu ai yaatiya bilfathi aw amrim min `indihee fa yusbihoo `alaa maaa asarroo feee anfusihim naadimeen
📖 हिंदी अर्थ
तो (ऐ रसूल) जिन लोगों के दिलों में (नेफ़ाक़ की) बीमारी है तुम उन्हें देखोगे कि उनमें दौड़ दौड़ के मिले जाते हैं और तुमसे उसकी वजह यह बयान करते हैं कि हम तो इससे डरते हैं कि कहीं ऐसा न हो उनके न (मिलने से) ज़माने की गर्दिश में न मुब्तिला हो जाएं तो अनक़रीब ही ख़ुदा (मुसलमानों की) फ़तेह या कोई और बात अपनी तरफ़ से ज़ाहिर कर देगा तब यह लोग इस बदगुमानी पर जो अपने जी में छिपाते थे शर्माएंगे (
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • الَّذِينَ فِي قُلُوبِهِم مَّرَضٌ: जिनके दिलों में (ईमान की) कमज़ोरी, शक और निफ़ाक़ (मुनाफ़िक़ी) की बीमारी है।
  • يُسَارِعُونَ فِيهِمْ: वे (यहूदियों और ईसाइयों की) मोहब्बत और मदद में जल्दी करते हैं।
  • دَائِرَةٌ: समय का पहिया (यानी हार, मुसीबत, या बुरा दौर) जो उन पर आ पड़े।
  • الْفَتْحِ: विजय (यहाँ मक्का की विजय या मुसलमानों की सफलता)।
  • أَسَرُّوا: उन्होंने छिपाया (अपने दिलों में)।

तफ़सीर (व्याख्या):

हे नबी! आप देखते हैं कि जिन लोगों के दिलों में निफ़ाक़ (मुनाफ़िक़ी) और ईमान की कमज़ोरी की बीमारी है, वे यहूदियों और ईसाइयों की दोस्ती और मदद करने में एक-दूसरे से आगे बढ़ने की कोशिश करते हैं। जब उन्हें टोका जाता है, तो वे बहाना बनाते हैं और कहते हैं: "हमें डर है कि कहीं हम पर कोई मुसीबत या बुरा दौर न आ जाए (यानी अगर यहूदी या ईसाई जीत गए, तो हम उनके साथ होंगे और हमें उनसे सुरक्षा मिलेगी)।" वे यह कहकर अपनी मुनाफ़िक़ी को छिपाने की कोशिश करते हैं।

अल्लाह तआला उनके इस बयान का जवाब देते हुए फ़रमाता है: "उम्मीद है कि अल्लाह जल्द ही अपने नबी को फ़तह (विजय) देगा, या अपनी ओर से कोई ऐसा फ़ैसला करेगा (जैसे यहूदियों को उनके ठिकानों से निकालना), जिससे मुसलमानों की ताक़त बढ़े और दुश्मनों की हिम्मत टूटे।" उस दिन ये मुनाफ़िक़, जो आज यहूदियों और ईसाइयों से दोस्ती कर रहे हैं, अपने उन कामों पर बहुत पछताएँगे जो उन्होंने अपने दिलों में छिपा रखे थे। उन्हें सिर्फ़ पछतावा ही नहीं होगा, बल्कि उनकी असलियत भी सबके सामने आ जाएगी।


फ़ायदे (सीख):

  1. मुनाफ़िक़ों की पहचान: यह आयत बताती है कि मुनाफ़िक़ों की एक बड़ी पहचान यह है कि वे अल्लाह के दुश्मनों से दोस्ती करते हैं और मुसलमानों के ख़िलाफ़ उनका साथ देते हैं। एक सच्चे मुसलमान को चाहिए कि वह अपनी दोस्ती और मोहब्बत में ईमान वालों को प्राथमिकता दे।
  2. अल्लाह पर भरोसा: मुनाफ़िक़ दुनिया के डर से काफ़िरों की तरफ़ झुकते हैं, जबकि एक मोमिन का विश्वास होता है कि अल्लाह ही फ़तह और नुसरत देने वाला है। उसे किसी इंसानी ताक़त से डरना नहीं चाहिए, बल्कि अल्लाह पर पूरा भरोसा रखना चाहिए।
  3. अल्लाह का वादा सच्चा है: अल्लाह ने अपने नबी और मोमिनीन की मदद का वादा किया है। चाहे दुश्मन कितने भी ताक़तवर क्यों न हों, अल्लाह की मदद ज़रूर आती है। यह आयत मुसलमानों को हिम्मत देती है कि वे सिर्फ़ अल्लाह पर भरोसा रखें और उसके दुश्मनों से दोस्ती न करें।
  4. पछतावे का अंजाम: जो लोग दुनिया के डर से ग़लत रास्ता चुनते हैं, वे आख़िरकार पछताते हैं। यह आयत हमें सिखाती है कि हमेशा सच्चाई और ईमान के साथ खड़े रहना चाहिए, भले ही शुरुआत में मुश्किल लगे, क्योंकि अंजाम ईमान वालों के हक़ में ही अच्छा होता है।
🎧 सुनें

📜 आयत 50-54 — अल-माइदा

50أَفَحُكْمَ الْجَاهِلِيَّةِ يَبْغُونَ ۚ وَمَنْ أَحْسَنُ مِنَ اللَّهِ حُكْمًا لِّقَوْمٍ يُوقِنُونَ
क्या ये लोग (ज़मानाए) जाहिलीयत के हुक्म की (तुमसे भी) तमन्ना रखते हैं हालॉकि यक़ीन करने वाले लोगों के वास्ते हुक्मे ख़ुदा से बेहतर कौन होगा
51۞ يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَتَّخِذُوا الْيَهُودَ وَالنَّصَارَىٰ أَوْلِيَاءَ ۘ بَعْضُهُمْ أَوْلِيَاءُ بَعْضٍ ۚ وَمَن يَتَوَلَّهُم مِّنكُمْ فَإِنَّهُ مِنْهُمْ ۗ إِنَّ اللَّهَ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الظَّالِمِينَ
ऐ ईमानदारों यहूदियों और नसरानियों को अपना सरपरस्त न बनाओ (क्योंकि) ये लोग (तुम्हारे मुख़ालिफ़ हैं मगर) बाहम एक दूसरे के दोस्त हैं और (याद रहे कि) तुममें से जिसने उनको अपना सरपरस्त बनाया पस फिर वह भी उन्हीं लोगों में से हो गया बेशक ख़ुदा ज़ालिम लोगों को राहे रास्त पर नहीं लाता
52فَتَرَى الَّذِينَ فِي قُلُوبِهِم مَّرَضٌ يُسَارِعُونَ فِيهِمْ يَقُولُونَ نَخْشَىٰ أَن تُصِيبَنَا دَائِرَةٌ ۚ فَعَسَى اللَّهُ أَن يَأْتِيَ بِالْفَتْحِ أَوْ أَمْرٍ مِّنْ عِندِهِ فَيُصْبِحُوا عَلَىٰ مَا أَسَرُّوا فِي أَنفُسِهِمْ نَادِمِينَ
तो (ऐ रसूल) जिन लोगों के दिलों में (नेफ़ाक़ की) बीमारी है तुम उन्हें देखोगे कि उनमें दौड़ दौड़ के मिले जाते हैं और तुमसे उसकी वजह यह बयान करते हैं कि हम तो इससे डरते हैं कि कहीं ऐसा न हो उनके न (मिलने से) ज़माने की गर्दिश में न मुब्तिला हो जाएं तो अनक़रीब ही ख़ुदा (मुसलमानों की) फ़तेह या कोई और बात अपनी तरफ़ से ज़ाहिर कर देगा तब यह लोग इस बदगुमानी पर जो अपने जी में छिपाते थे शर्माएंगे (
53وَيَقُولُ الَّذِينَ آمَنُوا أَهَٰؤُلَاءِ الَّذِينَ أَقْسَمُوا بِاللَّهِ جَهْدَ أَيْمَانِهِمْ ۙ إِنَّهُمْ لَمَعَكُمْ ۚ حَبِطَتْ أَعْمَالُهُمْ فَأَصْبَحُوا خَاسِرِينَ
और मोमिनीन (जब उन पर नेफ़ाक़ ज़ाहिर हो जाएगा तो) कहेंगे क्या ये वही लोग हैं जो सख्त से सख्त क़समें खाकर (हमसे) कहते थे कि हम ज़रूर तुम्हारे साथ हैं उनका सारा किया धरा अकारत हुआ और सख्त घाटे में आ गए
54يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا مَن يَرْتَدَّ مِنكُمْ عَن دِينِهِ فَسَوْفَ يَأْتِي اللَّهُ بِقَوْمٍ يُحِبُّهُمْ وَيُحِبُّونَهُ أَذِلَّةٍ عَلَى الْمُؤْمِنِينَ أَعِزَّةٍ عَلَى الْكَافِرِينَ يُجَاهِدُونَ فِي سَبِيلِ اللَّهِ وَلَا يَخَافُونَ لَوْمَةَ لَائِمٍ ۚ ذَٰلِكَ فَضْلُ اللَّهِ يُؤْتِيهِ مَن يَشَاءُ ۚ وَاللَّهُ وَاسِعٌ عَلِيمٌ
ऐ ईमानदारों तुममें से जो कोई अपने दीन से फिर जाएगा तो (कुछ परवाह नहीं फिर जाए) अनक़रीब ही ख़ुदा ऐसे लोगों को ज़ाहिर कर देगा जिन्हें ख़ुदा दोस्त रखता होगा और वह उसको दोस्त रखते होंगे ईमानदारों के साथ नर्म और मुन्किर (और) काफ़िरों के साथ सख्त ख़ुदा की राह में जेहाद करेंगे और किसी मलामत करने वाले की मलामत की कुछ परवाह न करेंगे ये ख़ुदा का फ़ज़ल (व करम) है वह जिसे चाहता हे देता है और ख़ुदा तो बड़ी गुन्जाइश वाला वाक़िफ़कार है
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52आयत

अनुवाद — अल-माइदा 52

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Tuesday, August 18, 2026

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