अल-माइदा · 51/120
अनुवाद उच्चारण — अल-माइदा
۞ يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَتَّخِذُوا الْيَهُودَ وَالنَّصَارَىٰ أَوْلِيَاءَ ۘ بَعْضُهُمْ أَوْلِيَاءُ بَعْضٍ ۚ وَمَن يَتَوَلَّهُم مِّنكُمْ فَإِنَّهُ مِنْهُمْ ۗ إِنَّ اللَّهَ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الظَّالِمِينَ ۝٥١
Yaaa aiyuhal lazeena aamanoo laa tattakhizul Yahooda wan nasaaraaa awliyaaa`; ba`duhum awliyaaa`u ba`d; wa mai yatawallahum minkum fa innahoo minhum; innal laaha laa yahdil qawmaz zaalimeen
📖 हिंदी अर्थ
ऐ ईमानदारों यहूदियों और नसरानियों को अपना सरपरस्त न बनाओ (क्योंकि) ये लोग (तुम्हारे मुख़ालिफ़ हैं मगर) बाहम एक दूसरे के दोस्त हैं और (याद रहे कि) तुममें से जिसने उनको अपना सरपरस्त बनाया पस फिर वह भी उन्हीं लोगों में से हो गया बेशक ख़ुदा ज़ालिम लोगों को राहे रास्त पर नहीं लाता
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • أَوْلِيَاءَ: मित्र, सहायक, संरक्षक और विश्वासपात्र।
  • يَتَوَلَّهُمْ: उनसे मित्रता करे, उन्हें अपना सहायक बनाए।
  • الظَّالِمِينَ: अत्याचारी, जो अपने ऊपर अत्याचार करते हैं (क्योंकि वे ईमान के बाद कुफ्र की ओर लौट जाते हैं)।

तफ़सीर (व्याख्या):

हे ईमान वालो! यहूदियों और ईसाइयों को अपना मित्र, सहायक और संरक्षक न बनाओ। उनसे गहरी दोस्ती और विश्वास का रिश्ता मत रखो, क्योंकि वे आपस में एक-दूसरे के मित्र और सहायक हैं। उनकी आपसी एकता इसी बात पर है कि वे मुसलमानों के दुश्मन हैं और उनके खिलाफ एकजुट रहते हैं। यहूदी यहूदियों के साथ हैं और ईसाई ईसाइयों के साथ, और दोनों समूह तुम्हारी दुश्मनी में एक दूसरे का साथ देते हैं।

तुममें से जो कोई भी उन्हें अपना मित्र और सहायक बनाएगा, वह उन्हीं में से हो जाएगा — यानी उसका दर्जा और अंजाम उन्हीं जैसा होगा, क्योंकि उसने ईमान वालों का साथ छोड़कर काफिरों का पक्ष लिया। यह बात स्पष्ट कर दी गई है कि मोमिन को अपने भाइयों के साथ खड़ा होना चाहिए, न कि दुश्मनों के साथ।

निस्संदेह, अल्लाह उन लोगों को सीधा रास्ता नहीं दिखाता जो अपने ऊपर अत्याचार करते हैं — यानी जो अपनी मर्जी से ईमान छोड़कर कुफ्र की तरफ बढ़ते हैं और काफिरों से मित्रता करके अपनी आत्मा पर ज़ुल्म करते हैं। ऐसे लोगों को अल्लाह की हिदायत नसीब नहीं होती।


फ़ायदे (सीख):

  1. ईमान की पहचान: यह आयत सिखाती है कि सच्चा ईमान सिर्फ जुबान से नहीं, बल्कि दिल और अमल से होता है। जो काफिरों से दोस्ती करता है, उसका ईमान कमज़ोर है।
  2. मुसलमानों की एकता: यह आयत मुसलमानों को आपसी भाईचारे और एकता की ताकीद करती है। जब दुश्मन एकजुट हैं, तो मोमिनों को और ज़्यादा एकजुट होना चाहिए।
  3. स्वाभिमान और आज़ादी: यह सिखाती है कि मुसलमान को किसी बाहरी ताकत के आगे झुकना नहीं चाहिए। उसे अपने दीन और अपनी उम्मत पर भरोसा रखना चाहिए।
  4. सावधानी: यह आयत हमें दुश्मनों की चालों से सावधान रहने की शिक्षा देती है। दोस्ती और दुश्मनी में फर्क करना चाहिए — दुनियावी मामलों में न्याय और अच्छाई हो सकती है, लेकिन दिल की वफादारी और सहायता का रिश्ता सिर्फ ईमान वालों के साथ होना चाहिए।
  5. अल्लाह की रहमत का रास्ता: यह बताती है कि अल्लाह की हिदायत उन्हीं को मिलती है जो सच्चाई और ईमान पर कायम रहते हैं। जो लोग जानबूझकर गलत रास्ता चुनते हैं, वे खुद अपने ऊपर ज़ुल्म करते हैं।
🎧 सुनें

📜 आयत 49-53 — अल-माइदा

49وَأَنِ احْكُم بَيْنَهُم بِمَا أَنزَلَ اللَّهُ وَلَا تَتَّبِعْ أَهْوَاءَهُمْ وَاحْذَرْهُمْ أَن يَفْتِنُوكَ عَن بَعْضِ مَا أَنزَلَ اللَّهُ إِلَيْكَ ۖ فَإِن تَوَلَّوْا فَاعْلَمْ أَنَّمَا يُرِيدُ اللَّهُ أَن يُصِيبَهُم بِبَعْضِ ذُنُوبِهِمْ ۗ وَإِنَّ كَثِيرًا مِّنَ النَّاسِ لَفَاسِقُونَ
तब (उस वक्त) ज़िन बातों में तुम इख्तेलाफ़ करते वह तुम्हें बता देगा और (ऐ रसूल) हम फिर कहते हैं कि जो एहकाम ख़ुदा नाज़िल किए हैं तुम उसके मुताबिक़ फैसला करो और उनकी (बेजा) ख्वाहिशे नफ़सियानी की पैरवी न करो (बल्कि) तुम उनसे बचे रहो (ऐसा न हो) कि किसी हुक्म से जो ख़ुदा ने तुम पर नाज़िल किया है तुमको ये लोग भटका दें फिर अगर ये लोग तुम्हारे हुक्म से मुंह मोड़ें तो समझ लो कि (गोया) ख़ुदा ही की मरज़ी है कि उनके बाज़ गुनाहों की वजह से उन्हें मुसीबत में फॅसा दे और इसमें तो शक ही नहीं कि बहुतेरे लोग बदचलन हैं
50أَفَحُكْمَ الْجَاهِلِيَّةِ يَبْغُونَ ۚ وَمَنْ أَحْسَنُ مِنَ اللَّهِ حُكْمًا لِّقَوْمٍ يُوقِنُونَ
क्या ये लोग (ज़मानाए) जाहिलीयत के हुक्म की (तुमसे भी) तमन्ना रखते हैं हालॉकि यक़ीन करने वाले लोगों के वास्ते हुक्मे ख़ुदा से बेहतर कौन होगा
51۞ يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَتَّخِذُوا الْيَهُودَ وَالنَّصَارَىٰ أَوْلِيَاءَ ۘ بَعْضُهُمْ أَوْلِيَاءُ بَعْضٍ ۚ وَمَن يَتَوَلَّهُم مِّنكُمْ فَإِنَّهُ مِنْهُمْ ۗ إِنَّ اللَّهَ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الظَّالِمِينَ
ऐ ईमानदारों यहूदियों और नसरानियों को अपना सरपरस्त न बनाओ (क्योंकि) ये लोग (तुम्हारे मुख़ालिफ़ हैं मगर) बाहम एक दूसरे के दोस्त हैं और (याद रहे कि) तुममें से जिसने उनको अपना सरपरस्त बनाया पस फिर वह भी उन्हीं लोगों में से हो गया बेशक ख़ुदा ज़ालिम लोगों को राहे रास्त पर नहीं लाता
52فَتَرَى الَّذِينَ فِي قُلُوبِهِم مَّرَضٌ يُسَارِعُونَ فِيهِمْ يَقُولُونَ نَخْشَىٰ أَن تُصِيبَنَا دَائِرَةٌ ۚ فَعَسَى اللَّهُ أَن يَأْتِيَ بِالْفَتْحِ أَوْ أَمْرٍ مِّنْ عِندِهِ فَيُصْبِحُوا عَلَىٰ مَا أَسَرُّوا فِي أَنفُسِهِمْ نَادِمِينَ
तो (ऐ रसूल) जिन लोगों के दिलों में (नेफ़ाक़ की) बीमारी है तुम उन्हें देखोगे कि उनमें दौड़ दौड़ के मिले जाते हैं और तुमसे उसकी वजह यह बयान करते हैं कि हम तो इससे डरते हैं कि कहीं ऐसा न हो उनके न (मिलने से) ज़माने की गर्दिश में न मुब्तिला हो जाएं तो अनक़रीब ही ख़ुदा (मुसलमानों की) फ़तेह या कोई और बात अपनी तरफ़ से ज़ाहिर कर देगा तब यह लोग इस बदगुमानी पर जो अपने जी में छिपाते थे शर्माएंगे (
53وَيَقُولُ الَّذِينَ آمَنُوا أَهَٰؤُلَاءِ الَّذِينَ أَقْسَمُوا بِاللَّهِ جَهْدَ أَيْمَانِهِمْ ۙ إِنَّهُمْ لَمَعَكُمْ ۚ حَبِطَتْ أَعْمَالُهُمْ فَأَصْبَحُوا خَاسِرِينَ
और मोमिनीन (जब उन पर नेफ़ाक़ ज़ाहिर हो जाएगा तो) कहेंगे क्या ये वही लोग हैं जो सख्त से सख्त क़समें खाकर (हमसे) कहते थे कि हम ज़रूर तुम्हारे साथ हैं उनका सारा किया धरा अकारत हुआ और सख्त घाटे में आ गए
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अनुवाद — अल-माइदा 51

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सूरा आयत 51/120 — अल-माइदा المائدة (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अल-माइदा सुनें, अल-माइदा अनुवाद, अल-माइदा mp3, अल-माइदा pdf. आयत 49–53. हिंदी अर्थ: اردو.




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Tuesday, August 18, 2026

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