अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- أَوْلِيَاءَ: मित्र, सहायक, संरक्षक और विश्वासपात्र।
- يَتَوَلَّهُمْ: उनसे मित्रता करे, उन्हें अपना सहायक बनाए।
- الظَّالِمِينَ: अत्याचारी, जो अपने ऊपर अत्याचार करते हैं (क्योंकि वे ईमान के बाद कुफ्र की ओर लौट जाते हैं)।
तफ़सीर (व्याख्या):
हे ईमान वालो! यहूदियों और ईसाइयों को अपना मित्र, सहायक और संरक्षक न बनाओ। उनसे गहरी दोस्ती और विश्वास का रिश्ता मत रखो, क्योंकि वे आपस में एक-दूसरे के मित्र और सहायक हैं। उनकी आपसी एकता इसी बात पर है कि वे मुसलमानों के दुश्मन हैं और उनके खिलाफ एकजुट रहते हैं। यहूदी यहूदियों के साथ हैं और ईसाई ईसाइयों के साथ, और दोनों समूह तुम्हारी दुश्मनी में एक दूसरे का साथ देते हैं।
तुममें से जो कोई भी उन्हें अपना मित्र और सहायक बनाएगा, वह उन्हीं में से हो जाएगा — यानी उसका दर्जा और अंजाम उन्हीं जैसा होगा, क्योंकि उसने ईमान वालों का साथ छोड़कर काफिरों का पक्ष लिया। यह बात स्पष्ट कर दी गई है कि मोमिन को अपने भाइयों के साथ खड़ा होना चाहिए, न कि दुश्मनों के साथ।
निस्संदेह, अल्लाह उन लोगों को सीधा रास्ता नहीं दिखाता जो अपने ऊपर अत्याचार करते हैं — यानी जो अपनी मर्जी से ईमान छोड़कर कुफ्र की तरफ बढ़ते हैं और काफिरों से मित्रता करके अपनी आत्मा पर ज़ुल्म करते हैं। ऐसे लोगों को अल्लाह की हिदायत नसीब नहीं होती।
फ़ायदे (सीख):
- ईमान की पहचान: यह आयत सिखाती है कि सच्चा ईमान सिर्फ जुबान से नहीं, बल्कि दिल और अमल से होता है। जो काफिरों से दोस्ती करता है, उसका ईमान कमज़ोर है।
- मुसलमानों की एकता: यह आयत मुसलमानों को आपसी भाईचारे और एकता की ताकीद करती है। जब दुश्मन एकजुट हैं, तो मोमिनों को और ज़्यादा एकजुट होना चाहिए।
- स्वाभिमान और आज़ादी: यह सिखाती है कि मुसलमान को किसी बाहरी ताकत के आगे झुकना नहीं चाहिए। उसे अपने दीन और अपनी उम्मत पर भरोसा रखना चाहिए।
- सावधानी: यह आयत हमें दुश्मनों की चालों से सावधान रहने की शिक्षा देती है। दोस्ती और दुश्मनी में फर्क करना चाहिए — दुनियावी मामलों में न्याय और अच्छाई हो सकती है, लेकिन दिल की वफादारी और सहायता का रिश्ता सिर्फ ईमान वालों के साथ होना चाहिए।
- अल्लाह की रहमत का रास्ता: यह बताती है कि अल्लाह की हिदायत उन्हीं को मिलती है जो सच्चाई और ईमान पर कायम रहते हैं। जो लोग जानबूझकर गलत रास्ता चुनते हैं, वे खुद अपने ऊपर ज़ुल्म करते हैं।
📜 आयत 49-53 — अल-माइदा
अनुवाद — अल-माइदा 51
सूरा अल-माइदा आयत 51 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : ऐ ईमानदारों यहूदियों और नसरानियों को अपना सरपरस्त न बनाओ…सूरा आयत 51/120 — अल-माइदा المائدة (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अल-माइदा सुनें, अल-माइदा अनुवाद, अल-माइदा mp3, अल-माइदा pdf. आयत 49–53. हिंदी अर्थ: اردو.
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Tuesday, August 18, 2026
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