अल-माइदा · 94/120
अनुवाद उच्चारण — अल-माइदा
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَيَبْلُوَنَّكُمُ اللَّهُ بِشَيْءٍ مِّنَ الصَّيْدِ تَنَالُهُ أَيْدِيكُمْ وَرِمَاحُكُمْ لِيَعْلَمَ اللَّهُ مَن يَخَافُهُ بِالْغَيْبِ ۚ فَمَنِ اعْتَدَىٰ بَعْدَ ذَٰلِكَ فَلَهُ عَذَابٌ أَلِيمٌ ۝٩٤
Yaaa aiyuhal lazeena aamanoo la yabluwannnakumul laahu bishai`im minas saidi tanaaluhooo aideekum wa rimaahukum liya`lamal laahu mai yakhaafuhoo bilghaib; famani` tadaa ba`da zaalika falahoo `azaabun aleem
📖 हिंदी अर्थ
ऐ ईमानदारों कुछ शिकार से जिन तक तुम्हारे हाथ और नैज़ें पहुँच सकते हैं ख़ुदा ज़रुर इम्तेहान करेगा ताकि ख़ुदा देख ले कि उससे बे देखे भाले कौन डरता है फिर उसके बाद भी जो ज्यादती करेगा तो उसके लिए दर्दनाक अज़ाब है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • لَيَبْلُوَنَّكُمُ: वह अवश्य तुम्हें परीक्षण में डालेगा।
  • الصَّيْدِ: शिकार (स्थलीय जानवर)।
  • تَنَالُهُ أَيْدِيكُمْ: जिसे तुम्हारे हाथ पकड़ सकें (छोटे जानवर, अंडे, बच्चे)।
  • وَرِمَاحُكُمْ: और तुम्हारे भाले (बड़े जानवर)।
  • لِيَعْلَمَ اللَّهُ: ताकि अल्लाह जान ले (अर्थात तुम्हारी परीक्षा लेकर तुम्हारा इरादा प्रकट करे)।
  • بِالْغَيْبِ: बिना देखे, छिपे हुए (अल्लाह से डरना)।
  • اعْتَدَى: हद से आगे बढ़ा (अर्थात हराम किया)।
  • عَذَابٌ أَلِيمٌ: दर्दनाक अज़ाब।

तफ़सीर:

ऐ ईमान वालो! अल्लाह तआला तुम्हें एक ऐसी चीज़ से ज़रूर आज़माएगा जो शिकार के रूप में तुम्हारे पास आएगी, और वह इस तरह कि जब तुम इहराम की हालत में हो (हज या उमरा के दौरान), तो जंगली जानवर तुम्हारे इतने करीब आ जाएंगे कि उनके छोटे बच्चों और अंडों को तुम अपने हाथों से पकड़ सको, और बड़े जानवरों को अपने भालों से मार सको। यह सब कुछ इसलिए होगा ताकि अल्लाह तआला तुम्हारी परीक्षा ले और यह प्रकट हो जाए कि कौन उससे छिपकर (बिना देखे) डरता है—यानी जिसका ईमान पूर्ण है, वह अल्लाह के हुक्म की पाबंदी करते हुए शिकार से रुक जाएगा, भले ही शिकार उसके हाथ में हो। यह डर उसके दिल में अल्लाह के पूर्ण ज्ञान और उसकी निगरानी के यकीन से पैदा होता है।

इसके बाद जो कोई हद से आगे बढ़े और इहराम की हालत में शिकार करे, तो उसके लिए क़यामत के दिन दर्दनाक अज़ाब है, क्योंकि उसने अल्लाह के स्पष्ट आदेश की अवहेलना की।


दावती पहलू:

यह आयत मुसलमानों को सिखाती है कि अल्लाह की परीक्षा कभी-कभी उन चीज़ों से होती है जो बिल्कुल सामने होती हैं और आसानी से मिल सकती हैं। असली इम्तिहान यही है कि इंसान अल्लाह के हुक्म की खातिर उस चीज़ को छोड़ दे जो उसके सामने मौजूद हो। यही तक़वा (परहेज़गारी) है। अल्लाह उन लोगों से बेहद मुहब्बत करता है जो उससे छिपकर डरते हैं—यानी जब कोई उन्हें देखता नहीं, तब भी वे अल्लाह की नाराज़गी से बचते हैं। यही वह डर है जो इंसान को जन्नत तक पहुंचाता है। अल्लाह ने इस आयत में शिकार के ज़रिए हमें सिखाया कि दुनिया की चीज़ें चाहे कितनी ही आसान और करीब क्यों न हों, अगर अल्लाह ने रोका है, तो उन्हें छोड़ देना ही ईमान की निशानी है। यही वह लोग हैं जिनके लिए अल्लाह के पास बड़ा इनाम और बेहतरीन जज़ा है।



📜 आयत 92-96 — अल-माइदा

92وَأَطِيعُوا اللَّهَ وَأَطِيعُوا الرَّسُولَ وَاحْذَرُوا ۚ فَإِن تَوَلَّيْتُمْ فَاعْلَمُوا أَنَّمَا عَلَىٰ رَسُولِنَا الْبَلَاغُ الْمُبِينُ
और ख़ुदा का हुक्म मानों और रसूल का हुक्म मानों और (नाफ़रमानी) से बचे रहो इस पर भी अगर तुमने (हुक्म ख़ुदा से) मुँह फेरा तो समझ रखो कि हमारे रसूल पर बस साफ़ साफ़ पैग़ाम पहुँचा देना फर्ज है
93لَيْسَ عَلَى الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ جُنَاحٌ فِيمَا طَعِمُوا إِذَا مَا اتَّقَوا وَّآمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ ثُمَّ اتَّقَوا وَّآمَنُوا ثُمَّ اتَّقَوا وَّأَحْسَنُوا ۗ وَاللَّهُ يُحِبُّ الْمُحْسِنِينَ
(फिर करो चाहे न करो तुम मुख़तार हो) जिन लोगों ने ईमान कुबूल किया और अच्छे (अच्छे) काम किए हैं उन पर जो कुछ खा (पी) चुके उसमें कुछ गुनाह नहीं जब उन्होंने परहेज़गारी की और ईमान ले आए और अच्छे (अच्छे) काम किए फिर परहेज़गारी की और नेकियाँ कीं और ख़ुदा नेकी करने वालों को दोस्त रखता है
94يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَيَبْلُوَنَّكُمُ اللَّهُ بِشَيْءٍ مِّنَ الصَّيْدِ تَنَالُهُ أَيْدِيكُمْ وَرِمَاحُكُمْ لِيَعْلَمَ اللَّهُ مَن يَخَافُهُ بِالْغَيْبِ ۚ فَمَنِ اعْتَدَىٰ بَعْدَ ذَٰلِكَ فَلَهُ عَذَابٌ أَلِيمٌ
ऐ ईमानदारों कुछ शिकार से जिन तक तुम्हारे हाथ और नैज़ें पहुँच सकते हैं ख़ुदा ज़रुर इम्तेहान करेगा ताकि ख़ुदा देख ले कि उससे बे देखे भाले कौन डरता है फिर उसके बाद भी जो ज्यादती करेगा तो उसके लिए दर्दनाक अज़ाब है
95يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَقْتُلُوا الصَّيْدَ وَأَنتُمْ حُرُمٌ ۚ وَمَن قَتَلَهُ مِنكُم مُّتَعَمِّدًا فَجَزَاءٌ مِّثْلُ مَا قَتَلَ مِنَ النَّعَمِ يَحْكُمُ بِهِ ذَوَا عَدْلٍ مِّنكُمْ هَدْيًا بَالِغَ الْكَعْبَةِ أَوْ كَفَّارَةٌ طَعَامُ مَسَاكِينَ أَوْ عَدْلُ ذَٰلِكَ صِيَامًا لِّيَذُوقَ وَبَالَ أَمْرِهِ ۗ عَفَا اللَّهُ عَمَّا سَلَفَ ۚ وَمَنْ عَادَ فَيَنتَقِمُ اللَّهُ مِنْهُ ۗ وَاللَّهُ عَزِيزٌ ذُو انتِقَامٍ
(ऐ ईमानदारों जब तुम हालते एहराम में हो तो शिकार न मारो और तुममें से जो कोई जान बूझ कर शिकार मारेगा तो जिस (जानवर) को मारा है चौपायों में से उसका मसल तुममें से जो दो मुन्सिफ आदमी तजवीज़ कर दें उसका बदला (देना) होगा (और) काबा तक पहुँचा कर कुर्बानी की जाए या (उसका) जुर्माना (उसकी क़ीमत से) मोहताजों को खाना खिलाना या उसके बराबर रोज़े रखना (यह जुर्माना इसलिए है) ताकि अपने किए की सज़ा का मज़ा चखो जो हो चुका उससे तो ख़ुदा ने दरग़ुज़र की और जो फिर ऐसी हरकत करेगा तो ख़ुदा उसकी सज़ा देगा और ख़ुदा ज़बरदस्त बदला लेने वाला है
96أُحِلَّ لَكُمْ صَيْدُ الْبَحْرِ وَطَعَامُهُ مَتَاعًا لَّكُمْ وَلِلسَّيَّارَةِ ۖ وَحُرِّمَ عَلَيْكُمْ صَيْدُ الْبَرِّ مَا دُمْتُمْ حُرُمًا ۗ وَاتَّقُوا اللَّهَ الَّذِي إِلَيْهِ تُحْشَرُونَ
तुम्हारे और काफ़िले के वास्ते दरियाई शिकार और उसका खाना तो (हर हालत में) तुम्हारे वास्ते जायज़ कर दिया है मगर खुश्की का शिकार जब तक तुम हालते एहराम में रहो तुम पर हराम है और उस ख़ुदा से डरते रहो जिसकी तरफ (मरने के बाद) उठाए जाओगे
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अनुवाद — अल-माइदा 94

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Tuesday, August 18, 2026

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