अल-हश्र · 11/24
अनुवाद उच्चारण — अल-हश्र
۞ أَلَمْ تَرَ إِلَى الَّذِينَ نَافَقُوا يَقُولُونَ لِإِخْوَانِهِمُ الَّذِينَ كَفَرُوا مِنْ أَهْلِ الْكِتَابِ لَئِنْ أُخْرِجْتُمْ لَنَخْرُجَنَّ مَعَكُمْ وَلَا نُطِيعُ فِيكُمْ أَحَدًا أَبَدًا وَإِن قُوتِلْتُمْ لَنَنصُرَنَّكُمْ وَاللَّهُ يَشْهَدُ إِنَّهُمْ لَكَاذِبُونَ ۝١١
Alam tara ilal lazeena naafaqoo yaqooloona li ikhwaanihimul lazeena kafaroo min ahlil kitaabi la`in ukhrijtum lanakhrujanna ma`akum wa laa nutee`u feekum ahadan abadanw-wa in qootiltum lanansuran nakum wallaahu yashhadu innahum lakaaziboon
📖 हिंदी अर्थ
क्या तुमने उन मुनाफ़िकों की हालत पर नज़र नहीं की जो अपने काफ़िर भाइयों अहले किताब से कहा करते हैं कि अगर कहीं तुम (घरों से) निकाले गए तो यक़ीन जानों कि हम भी तुम्हारे साथ (ज़रूर) निकल खड़े होंगे और तुम्हारे बारे में कभी किसी की इताअत न करेंगे और अगर तुमसे लड़ाई होगी तो ज़रूर तुम्हारी मदद करेंगे, मगर ख़ुदा बयान किए देता है कि ये लोग यक़ीनन झूठे हैं
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • نَافَقُوا: जिन्होंने अपने दिलों में कुछ छिपाया और ज़ुबान पर कुछ और लाए, यानी मुनाफ़िक़ीन (दिखावे के मुसलमान)।
  • لِإِخْوَانِهِمُ: अपने भाइयों से, यानी कुफ़्र और अहले-किताब होने में साझीदारों से।
  • لَئِنْ أُخْرِجْتُمْ: अगर तुम्हें (अपने घरों से) निकाला गया।
  • لَنَخْرُجَنَّ مَعَكُمْ: हम भी ज़रूर तुम्हारे साथ निकलेंगे।
  • لَنَنصُرَنَّكُمْ: हम ज़रूर तुम्हारी मदद करेंगे।
  • لَكَاذِبُونَ: बिल्कुल झूठे हैं।

तफ़सीर:

ऐ नबी! क्या आपने उन मुनाफ़िक़ों (दिखावे के मुसलमानों) की हालत पर ग़ौर नहीं किया, जो अहले-किताब (यहूदियों) में से अपने कुफ़्र में साझीदार भाइयों से कहते हैं कि “अगर तुम्हें (मदीना से) निकाला गया तो हम भी ज़रूर तुम्हारे साथ निकलेंगे, और हम तुम्हारे मामले में किसी की भी बात नहीं मानेंगे — चाहे वह ख़ुद रसूलुल्लाह ही क्यों न हों। और अगर तुमसे जंग लड़ी गई तो हम ज़रूर तुम्हारी मदद करेंगे।”

यह वादे और क़समें सिर्फ़ ज़ुबानी थीं। अल्लाह तआला गवाह है कि ये मुनाफ़िक़ बिल्कुल झूठे हैं। उनके दिलों में न तो सच्ची मुहब्बत थी इन यहूदियों से, और न ही उनके पास हिम्मत थी कि वे मुसलमानों के मुक़ाबले में खड़े हो सकें। जब असली वक़्त आया, तो इन्होंने अपने वादों से मुँह मोड़ लिया — जैसा कि आगे की आयात में बयान होगा कि उन्होंने न तो साथ छोड़ा, न मदद की, बल्कि पहले ही भाग खड़े हुए।

यह आयत हमें सिखाती है कि मुनाफ़िक़ी (दिखावा) अल्लाह की नज़र में सबसे बुरी बीमारी है। ये लोग दो तरफ़ा खेल खेलते हैं — एक तरफ़ मुसलमानों को दिखाते हैं कि हम तुम्हारे साथ हैं, और दूसरी तरफ़ कुफ़्फ़ार से वादे करते हैं कि हम तुम्हारे साथ हैं। लेकिन अल्लाह उनके दिलों का हाल जानता है और उनका झूठ खोलकर रख देता है।

इस आयत से हमें यह भी सबक़ मिलता है कि इंसान को चाहिए कि वह सच्चा और साफ़ दिल वाला हो। अल्लाह उन लोगों से मुहब्बत करता है जो सच्चे होते हैं, और वह मुनाफ़िक़ों को पसंद नहीं करता। मुसलमान को चाहिए कि वह अपने भाई के साथ सच्चा खड़ा हो, और जब वादा करे तो उसे पूरा करे — क्योंकि अल्लाह ने क़ुरआन में फ़रमाया है कि “वादा पूरा करो, बेशक वादे के बारे में पूछताछ होनी है।”

यह आयत हमें यह भी बताती है कि अल्लाह तआला अपने नबी और मोमिनीन की हिफ़ाज़त ख़ुद करता है। मुनाफ़िक़ों की साज़िशें और यहूदियों के साथ उनके गुप्त वादे कुछ भी नहीं कर सकते, जब तक अल्लाह की मदद मोमिनीन के साथ हो। इसलिए हमें अल्लाह पर भरोसा रखना चाहिए और उसकी राह पर साबित क़दम रहना चाहिए — क्योंकि अल्लाह ही सबसे बड़ा मददगार है।

🎧 सुनें

📜 आयत 9-13 — अल-हश्र

9وَالَّذِينَ تَبَوَّءُوا الدَّارَ وَالْإِيمَانَ مِن قَبْلِهِمْ يُحِبُّونَ مَنْ هَاجَرَ إِلَيْهِمْ وَلَا يَجِدُونَ فِي صُدُورِهِمْ حَاجَةً مِّمَّا أُوتُوا وَيُؤْثِرُونَ عَلَىٰ أَنفُسِهِمْ وَلَوْ كَانَ بِهِمْ خَصَاصَةٌ ۚ وَمَن يُوقَ شُحَّ نَفْسِهِ فَأُولَٰئِكَ هُمُ الْمُفْلِحُونَ
जो लोग मोहाजेरीन से पहले (हिजरत के) घर (मदीना) में मुक़ीम हैं और ईमान में (मुसतक़िल) रहे और जो लोग हिजरत करके उनके पास आए उनसे मोहब्बत करते हैं और जो कुछ उनको मिला उसके लिए अपने दिलों में कुछ ग़रज़ नहीं पाते और अगरचे अपने ऊपर तंगी ही क्यों न हो दूसरों को अपने नफ्स पर तरजीह देते हैं और जो शख़्श अपने नफ्स की हिर्स से बचा लिया गया तो ऐसे ही लोग अपनी दिली मुरादें पाएँगे
10وَالَّذِينَ جَاءُوا مِن بَعْدِهِمْ يَقُولُونَ رَبَّنَا اغْفِرْ لَنَا وَلِإِخْوَانِنَا الَّذِينَ سَبَقُونَا بِالْإِيمَانِ وَلَا تَجْعَلْ فِي قُلُوبِنَا غِلًّا لِّلَّذِينَ آمَنُوا رَبَّنَا إِنَّكَ رَءُوفٌ رَّحِيمٌ
और उनका भी हिस्सा है और जो लोग उन (मोहाजेरीन) के बाद आए (और) दुआ करते हैं कि परवरदिगारा हमारी और उन लोगों की जो हमसे पहले ईमान ला चुके मग़फेरत कर और मोमिनों की तरफ से हमारे दिलों में किसी तरह का कीना न आने दे परवरदिगार बेशक तू बड़ा शफीक़ निहायत रहम वाला है
11۞ أَلَمْ تَرَ إِلَى الَّذِينَ نَافَقُوا يَقُولُونَ لِإِخْوَانِهِمُ الَّذِينَ كَفَرُوا مِنْ أَهْلِ الْكِتَابِ لَئِنْ أُخْرِجْتُمْ لَنَخْرُجَنَّ مَعَكُمْ وَلَا نُطِيعُ فِيكُمْ أَحَدًا أَبَدًا وَإِن قُوتِلْتُمْ لَنَنصُرَنَّكُمْ وَاللَّهُ يَشْهَدُ إِنَّهُمْ لَكَاذِبُونَ
क्या तुमने उन मुनाफ़िकों की हालत पर नज़र नहीं की जो अपने काफ़िर भाइयों अहले किताब से कहा करते हैं कि अगर कहीं तुम (घरों से) निकाले गए तो यक़ीन जानों कि हम भी तुम्हारे साथ (ज़रूर) निकल खड़े होंगे और तुम्हारे बारे में कभी किसी की इताअत न करेंगे और अगर तुमसे लड़ाई होगी तो ज़रूर तुम्हारी मदद करेंगे, मगर ख़ुदा बयान किए देता है कि ये लोग यक़ीनन झूठे हैं
12لَئِنْ أُخْرِجُوا لَا يَخْرُجُونَ مَعَهُمْ وَلَئِن قُوتِلُوا لَا يَنصُرُونَهُمْ وَلَئِن نَّصَرُوهُمْ لَيُوَلُّنَّ الْأَدْبَارَ ثُمَّ لَا يُنصَرُونَ
अगर कुफ्फ़ार निकाले भी जाएँ तो ये मुनाफेक़ीन उनके साथ न निकलेंगे और अगर उनसे लड़ाई हुई तो उनकी मदद भी न करेंगे और यक़ीनन करेंगे भी तो पीठ फेर कर भाग जाएँगे
13لَأَنتُمْ أَشَدُّ رَهْبَةً فِي صُدُورِهِم مِّنَ اللَّهِ ۚ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ قَوْمٌ لَّا يَفْقَهُونَ
फिर उनको कहीं से कुमक भी न मिलेगी (मोमिनों) तुम्हारी हैबत उनके दिलों में ख़ुदा से भी बढ़कर है, ये इस वजह से कि ये लोग समझ नहीं रखते
अल-हश्रकुरान सूची
24आयत
मदनीRevelation
11आयत

अनुवाद — अल-हश्र 11

सूरा अल-हश्र आयत 11 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : क्या तुमने उन मुनाफ़िकों की हालत पर नज़र नहीं की…

सूरा आयत 11/24 — अल-हश्र الحشر (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अल-हश्र सुनें, अल-हश्र अनुवाद, अल-हश्र mp3, अल-हश्र pdf. आयत 9–13. हिंदी अर्थ: اردو.




पवित्र क़ुरआन


Tuesday, August 18, 2026

अपनी नेक दुआओं में हमें मत भूलिए