Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
- نَافَقُوا: जिन्होंने अपने दिलों में कुछ छिपाया और ज़ुबान पर कुछ और लाए, यानी मुनाफ़िक़ीन (दिखावे के मुसलमान)।
- لِإِخْوَانِهِمُ: अपने भाइयों से, यानी कुफ़्र और अहले-किताब होने में साझीदारों से।
- لَئِنْ أُخْرِجْتُمْ: अगर तुम्हें (अपने घरों से) निकाला गया।
- لَنَخْرُجَنَّ مَعَكُمْ: हम भी ज़रूर तुम्हारे साथ निकलेंगे।
- لَنَنصُرَنَّكُمْ: हम ज़रूर तुम्हारी मदद करेंगे।
- لَكَاذِبُونَ: बिल्कुल झूठे हैं।
तफ़सीर:
ऐ नबी! क्या आपने उन मुनाफ़िक़ों (दिखावे के मुसलमानों) की हालत पर ग़ौर नहीं किया, जो अहले-किताब (यहूदियों) में से अपने कुफ़्र में साझीदार भाइयों से कहते हैं कि “अगर तुम्हें (मदीना से) निकाला गया तो हम भी ज़रूर तुम्हारे साथ निकलेंगे, और हम तुम्हारे मामले में किसी की भी बात नहीं मानेंगे — चाहे वह ख़ुद रसूलुल्लाह ही क्यों न हों। और अगर तुमसे जंग लड़ी गई तो हम ज़रूर तुम्हारी मदद करेंगे।”
यह वादे और क़समें सिर्फ़ ज़ुबानी थीं। अल्लाह तआला गवाह है कि ये मुनाफ़िक़ बिल्कुल झूठे हैं। उनके दिलों में न तो सच्ची मुहब्बत थी इन यहूदियों से, और न ही उनके पास हिम्मत थी कि वे मुसलमानों के मुक़ाबले में खड़े हो सकें। जब असली वक़्त आया, तो इन्होंने अपने वादों से मुँह मोड़ लिया — जैसा कि आगे की आयात में बयान होगा कि उन्होंने न तो साथ छोड़ा, न मदद की, बल्कि पहले ही भाग खड़े हुए।
यह आयत हमें सिखाती है कि मुनाफ़िक़ी (दिखावा) अल्लाह की नज़र में सबसे बुरी बीमारी है। ये लोग दो तरफ़ा खेल खेलते हैं — एक तरफ़ मुसलमानों को दिखाते हैं कि हम तुम्हारे साथ हैं, और दूसरी तरफ़ कुफ़्फ़ार से वादे करते हैं कि हम तुम्हारे साथ हैं। लेकिन अल्लाह उनके दिलों का हाल जानता है और उनका झूठ खोलकर रख देता है।
इस आयत से हमें यह भी सबक़ मिलता है कि इंसान को चाहिए कि वह सच्चा और साफ़ दिल वाला हो। अल्लाह उन लोगों से मुहब्बत करता है जो सच्चे होते हैं, और वह मुनाफ़िक़ों को पसंद नहीं करता। मुसलमान को चाहिए कि वह अपने भाई के साथ सच्चा खड़ा हो, और जब वादा करे तो उसे पूरा करे — क्योंकि अल्लाह ने क़ुरआन में फ़रमाया है कि “वादा पूरा करो, बेशक वादे के बारे में पूछताछ होनी है।”
यह आयत हमें यह भी बताती है कि अल्लाह तआला अपने नबी और मोमिनीन की हिफ़ाज़त ख़ुद करता है। मुनाफ़िक़ों की साज़िशें और यहूदियों के साथ उनके गुप्त वादे कुछ भी नहीं कर सकते, जब तक अल्लाह की मदद मोमिनीन के साथ हो। इसलिए हमें अल्लाह पर भरोसा रखना चाहिए और उसकी राह पर साबित क़दम रहना चाहिए — क्योंकि अल्लाह ही सबसे बड़ा मददगार है।
📜 आयत 9-13 — सूरा अल-हश्र
अनुवाद — अल-हश्र 11
सूरा अल-हश्र आयत 11 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : क्या तुमने उन मुनाफ़िकों की हालत पर नज़र नहीं की…सूरा आयत 11/24 — सूरा अल-हश्र الحشر (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अल-हश्र सुनें, सूरा अल-हश्र अनुवाद, सूरा अल-हश्र mp3, सूरा अल-हश्र pdf. आयत 9–13. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Friday, October 2, 2026
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