अल-आराफ · 42/206
अनुवाद उच्चारण — अल-आराफ
وَالَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ لَا نُكَلِّفُ نَفْسًا إِلَّا وُسْعَهَا أُولَٰئِكَ أَصْحَابُ الْجَنَّةِ ۖ هُمْ فِيهَا خَالِدُونَ ۝٤٢
Wallazeena aamanoo wa `amilus saalihaati la nukallifu nafsan illaa wus`ahaaa ulaaa`ika Ashaabul jannati hum feehaa khaalidoon
📖 हिंदी अर्थ
और अच्छे अच्छे काम किये और हम तो किसी शख्स को उसकी ताकत से ज्यादा तकलीफ देते ही नहीं यहीं लोग जन्नती हैं कि वह हमेशा जन्नत ही में रहा (सहा) करेगें

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • لَا نُكَلِّفُ نَفْسًا إِلَّا وُسْعَهَا: हम किसी प्राणी पर उसकी सामर्थ्य से अधिक बोझ नहीं डालते। "वुस्अ" का अर्थ है ताकत और क्षमता की सीमा।
  • أَصْحَابُ الْجَنَّةِ: जन्नत के लोग, यानी जन्नत में रहने वाले।
  • خَالِدُونَ: हमेशा रहने वाले, कभी न खत्म होने वाली जिंदगी।

तफसीर (व्याख्या):

यह आयत उन लोगों की विशेषता बयान करती है जो ईमान लाए और अच्छे कर्म करते रहे। अल्लाह तआला फरमाता है कि जिन लोगों ने उस पर ईमान लाया और अपनी सामर्थ्य के अनुसार अच्छे कर्म किए, उन पर अल्लाह कभी उनकी ताकत से बढ़कर बोझ नहीं डालता। अल्लाह का यह कानून है कि वह हर व्यक्ति को उसकी क्षमता के अनुसार ही जिम्मेदारी देता है, और उसकी शरिया में कोई ऐसा आदेश नहीं है जो इंसान की ताकत से बाहर हो। यह अल्लाह की रहमत और इंसाफ की निशानी है कि उसने दीन को आसान बनाया है।

ये लोग जन्नत के असली हकदार हैं, और वे उसमें हमेशा रहेंगे। उनका ईमान और अच्छे कर्म उन्हें ऐसी जगह पहुंचाएंगे जहां कोई दुख, थकान या मौत नहीं होगी। यह उनके लिए अल्लाह की तरफ से इनाम है, और यह इनाम उनके कर्मों की वजह से नहीं बल्कि अल्लाह के फजल (कृपा) से मिलेगा, हालांकि उनके कर्म इसके लिए जरिया बनेंगे।

फायदे (सबक):

  1. अल्लाह तआला अपने बंदों पर बहुत मेहरबान है — वह किसी पर उसकी ताकत से ज्यादा बोझ नहीं डालता। इससे मुसलमान को यह तसल्ली मिलती है कि दीन में कोई मुश्किल नहीं जो इंसान उठा न सके।
  2. ईमान और अच्छे कर्मों का आपस में गहरा रिश्ता है — सिर्फ ईमान काफी नहीं, बल्कि अमल भी जरूरी है। यह आयत हमें सिखाती है कि अच्छे कर्म करते रहना चाहिए, चाहे वह छोटे ही क्यों न हों, क्योंकि अल्लाह हर छोटे कर्म को देखता है।
  3. जन्नत की खुशखबरी — यह आयत मोमिनों को जन्नत की उम्मीद दिलाती है, जो हमेशा रहने वाली नेमत है। यह दुनिया की किसी भी खुशी से बड़ी खुशी है।
  4. अल्लाह का इंसाफ — अल्लाह किसी पर जुल्म नहीं करता, और उसका हिसाब पूरी तरह इंसाफ पर आधारित है। इससे दिल को सुकून मिलता है कि अगर हम अपनी तरफ से भरपूर कोशिश करें, तो अल्लाह हमें उसका पूरा इनाम देगा।
  5. यह आयत हमें यह भी सिखाती है कि इस्लाम में किसी को मजबूर नहीं किया जाता — हर इंसान अपनी क्षमता के अनुसार जिम्मेदार है, और अल्लाह उसी के हिसाब से फैसला करेगा। यह एक आसान और फितरत के मुताबिक दीन है।


📜 आयत 40-44 — अल-आराफ

40إِنَّ الَّذِينَ كَذَّبُوا بِآيَاتِنَا وَاسْتَكْبَرُوا عَنْهَا لَا تُفَتَّحُ لَهُمْ أَبْوَابُ السَّمَاءِ وَلَا يَدْخُلُونَ الْجَنَّةَ حَتَّىٰ يَلِجَ الْجَمَلُ فِي سَمِّ الْخِيَاطِ ۚ وَكَذَٰلِكَ نَجْزِي الْمُجْرِمِينَ
और उनसे सरताबी की न उनके लिए आसमान के दरवाज़े खोले जाएंगें और वह बेहश्त ही में दाखिल होने पाएगें यहाँ तक कि ऊँट सूई के नाके में होकर निकल जाए (यानि जिस तरह ये मुहाल है) उसी तरह उनका बेहश्त में दाखिल होना मुहाल है और हम मुजरिमों को ऐसी ही सज़ा दिया करते हैं उनके लिए जहन्नुम (की आग) का बिछौना होगा
41لَهُم مِّن جَهَنَّمَ مِهَادٌ وَمِن فَوْقِهِمْ غَوَاشٍ ۚ وَكَذَٰلِكَ نَجْزِي الظَّالِمِينَ
और उनके ऊपर से (आग ही का) ओढ़ना भी और हम ज़ालिमों को ऐसी ही सज़ा देते हैं और जिन लोगों ने ईमान कुबुल किया
42وَالَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ لَا نُكَلِّفُ نَفْسًا إِلَّا وُسْعَهَا أُولَٰئِكَ أَصْحَابُ الْجَنَّةِ ۖ هُمْ فِيهَا خَالِدُونَ
और अच्छे अच्छे काम किये और हम तो किसी शख्स को उसकी ताकत से ज्यादा तकलीफ देते ही नहीं यहीं लोग जन्नती हैं कि वह हमेशा जन्नत ही में रहा (सहा) करेगें
43وَنَزَعْنَا مَا فِي صُدُورِهِم مِّنْ غِلٍّ تَجْرِي مِن تَحْتِهِمُ الْأَنْهَارُ ۖ وَقَالُوا الْحَمْدُ لِلَّهِ الَّذِي هَدَانَا لِهَٰذَا وَمَا كُنَّا لِنَهْتَدِيَ لَوْلَا أَنْ هَدَانَا اللَّهُ ۖ لَقَدْ جَاءَتْ رُسُلُ رَبِّنَا بِالْحَقِّ ۖ وَنُودُوا أَن تِلْكُمُ الْجَنَّةُ أُورِثْتُمُوهَا بِمَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ
और उन लोगों के दिल में जो कुछ (बुग़ज़ व कीना) होगा वह सब हम निकाल (बाहर कर) देगें उनके महलों के नीचे नहरें जारी होगीं और कहते होगें शुक्र है उस ख़ुदा का जिसने हमें इस (मंज़िले मक़सूद) तक पहुंचाया और अगर ख़ुदा हमें यहाँ न पहुंचाता तो हम किसी तरह यहाँ न पहुंच सकते बेशक हमारे परवरदिगार के पैग़म्बर दीने हक़ लेकर आये थे और उन लोगों से पुकार कर कह दिया जाएगा कि वह बेहिश्त हैं जिसके तुम अपनी कारग़ुज़ारियों की जज़ा में वारिस व मालिक बनाए गये हों
44وَنَادَىٰ أَصْحَابُ الْجَنَّةِ أَصْحَابَ النَّارِ أَن قَدْ وَجَدْنَا مَا وَعَدَنَا رَبُّنَا حَقًّا فَهَلْ وَجَدتُّم مَّا وَعَدَ رَبُّكُمْ حَقًّا ۖ قَالُوا نَعَمْ ۚ فَأَذَّنَ مُؤَذِّنٌ بَيْنَهُمْ أَن لَّعْنَةُ اللَّهِ عَلَى الظَّالِمِينَ
और जन्नती लोग जहन्नुमी वालों से पुकार कर कहेगें हमने तो बेशक जो हमारे परवरदिगार ने हमसे वायदा किया था ठीक ठीक पा लिया तो क्या तुमने भी जो तुमसे तम्हारे परवरदिगार ने वायदा किया था ठीक पाया (या नहीं) अहले जहन्नुम कहेगें हाँ (पाया) एक मुनादी उनके दरमियान निदा करेगा कि ज़ालिमों पर ख़ुदा की लानत है
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अनुवाद — अल-आराफ 42

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Tuesday, August 18, 2026

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