अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
- آثِمًا: वह व्यक्ति जो पाप में डूबा हो, गुनाहगार।
- कफ़ूरा: वह व्यक्ति जो कुफ्र (अधर्म) में अति करने वाला हो, अत्यधिक इनकार करने वाला।
तफ़सीर (व्याख्या):
अल्लाह तआला अपने प्यारे नबी ﷺ को धैर्य और सब्र का आदेश देते हुए फ़रमाता है कि ऐ नबी! आप अपने रब के फ़ैसले पर सब्र करें। रब का फ़ैसला दो तरह का होता है—एक तो वह जो उसने तक़दीर के रूप में लिख दिया है, उसे क़ुबूल करें और उस पर राज़ी रहें; और दूसरा वह हुक्म है जो उसने शरीअत (धर्म) के रूप में दिया है, यानी अल्लाह के आदेशों का पालन करें और उन पर अमल करते रहें। चाहे रास्ते में कितनी ही मुश्किलें आएँ, चाहे लोग कितना ही विरोध करें, आपको डटे रहना है और अल्लाह के हुक्म के आगे सर झुकाना है।
फिर अल्लाह तआला नबी ﷺ को नसीहत करता है कि काफ़िरों और मुशरिकों में से किसी की भी बात न मानें—चाहे वह गुनाहगार हो जो पाप में डूबा हो, या वह काफ़िर हो जो इनकार में हद से गुज़र गया हो। ऐसे लोग आपको गुनाह की तरफ बुलाते हैं, बुरे कामों पर उकसाते हैं, और कुफ्र की दावत देते हैं। उनकी बात मानना आपके लिए हरगिज़ जायज़ नहीं है। यहाँ "या" का ज़िक्र दोनों क़िस्म के लोगों को शामिल करने के लिए है—यानी न गुनाहगार की इताअत करें, न काफ़िर की। कुछ मुफ़स्सिरीन ने कहा है कि यहाँ "या" "व" के मानी में है, यानी ऐसे लोग जो इकट्ठे गुनाहगार भी हों और काफ़िर भी—क्योंकि काफ़िरों की यही हालत होती है कि वे गुनाह में भी डूबे होते हैं और कुफ्र में भी अति करने वाले होते हैं।
इस आयत में नबी ﷺ को सिर्फ़ सब्र की तालीम ही नहीं दी गई, बल्कि यह भी बताया गया कि सब्र के साथ-साथ अल्लाह का ज़िक्र करते रहना चाहिए—सुबह और शाम अल्लाह का नाम लेते रहें, उससे दुआ करते रहें। यही वह चीज़ है जो दिल को मज़बूत करती है और मुश्किलों का सामना करने की ताक़त देती है।
दावती पहलू:
यह आयत हर मुसलमान के लिए एक बहुमूल्य सबक़ है। जब हमारे प्यारे नबी ﷺ को सब्र का हुक्म दिया गया, तो हमें भी चाहिए कि अपनी ज़िंदगी में आने वाली मुश्किलों पर सब्र करें। अल्लाह का वादा है कि सब्र करने वालों के साथ अल्लाह है। जो लोग हमें गुनाह की तरफ बुलाते हैं या हमें धर्म से भटकाना चाहते हैं, उनकी बात कभी न मानें। चाहे दुनिया में कितना ही दबाव हो, अल्लाह का हुक्म सबसे बड़ा है। याद रखें—अल्लाह की मदद सब्र के साथ है, और जो अल्लाह पर भरोसा करता है, अल्लाह उसके लिए काफ़ी है। यही वह रास्ता है जो हमें दुनिया और आख़िरत दोनों में कामयाबी तक पहुँचाता है।
📜 आयत 22-26 — अल-इंसान
अनुवाद — अल-इंसान 24
सूरा अल-इंसान आयत 24 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : तो तुम अपने परवरदिगार के हुक्म के इन्तज़ार में सब्र…सूरा आयत 24/31 — अल-इंसान الإنسان (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अल-इंसान सुनें, अल-इंसान अनुवाद, अल-इंसान mp3, अल-इंसान pdf. आयत 22–26. हिंदी अर्थ: اردو.
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Tuesday, August 18, 2026
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