Wa in ahadum minal mushrikeenas tajaaraka fa ajirhu hattaa yasma`a Kalaamal laahi summa ablighhu maa manah; zaalika bi annahum qawmul laa ya`lamoon
📖 अनुवाद (हिंदी अर्थ)
📖 हिंदी अर्थ
और (ऐ रसूल) अगर मुशरिकीन में से कोई तुमसे पनाह मागें तो उसको पनाह दो यहाँ तक कि वह ख़ुदा का कलाम सुन ले फिर उसे उसकी अमन की जगह वापस पहुँचा दो ये इस वजह से कि ये लोग नादान हैं
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اور اگر کوئی مشرک تم سے پناہ کا خواستگار ہو تو اس کو پناہ دو یہاں تک کہ کلام خدا سننے لگے پھر اس کو امن کی جگہ واپس پہنچادو۔ اس لیے کہ یہ بےخبر لوگ ہیں
اسْتَجَارَكَ: तुमसे पनाह (सुरक्षा) माँगे, अमन का वादा चाहे।
فَأَجِرْهُ: उसे पनाह दो, उसे सुरक्षित करो।
مَأْمَنَهُ: उसकी सुरक्षित जगह, जहाँ वह निडर होकर रह सके।
तफसीर (व्याख्या):
हे नबी! यदि मुशरिकीन (बहुदेववादियों) में से कोई व्यक्ति, जिनके ख़िलाफ़ युद्ध का आदेश दिया गया है, आकर आपसे पनाह माँगे और सुरक्षा का अनुरोध करे, तो उसे पनाह दें और उसे सुरक्षित रखें, यहाँ तक कि वह अल्लाह का कलाम (क़ुरआन) सुन ले और उसके आदेशों व शिक्षाओं से परिचित हो जाए। फिर उसके बाद यदि वह इस्लाम स्वीकार न करे, तो उसे उसकी सुरक्षित जगह (उसके घर या उसकी क़ौम के पास) पहुँचा दें, ताकि वह वहाँ निडर होकर रहे। यह आदेश इसलिए है कि ये लोग अज्ञानी हैं और इस दीन की सच्चाई को नहीं जानते। क़ुरआन सुनने के बाद उनके ज्ञान का द्वार खुल सकता है और वे हिदायत पा सकते हैं। यदि वे क़ुरआन सुनने के बाद भी इस्लाम न अपनाएँ और आपसे लड़ें, तो उनसे युद्ध किया जा सकता है।
फ़ायदे (लाभ):
इस्लाम दीन में दया, सहिष्णुता और न्याय का पाठ सिखाता है। दुश्मन को भी सच्चाई सुनने का अवसर दिया जाता है, चाहे वह युद्ध की स्थिति में ही क्यों न हो।
यह आदेश बताता है कि इस्लाम का उद्देश्य केवल जीतना नहीं, बल्कि लोगों तक अल्लाह का संदेश पहुँचाना है। ज्ञान और समझ को बल मिलता है।
इस्लाम में वचन और अमान (सुरक्षा) का सम्मान अत्यंत महत्वपूर्ण है। एक बार पनाह देने के बाद उसे तोड़ना मना है, भले ही सामने वाला शत्रु ही क्यों न हो।
यह आयत इस्लाम की रहमत और इंसाफ़ की तस्वीर है, जो दिखाती है कि इस्लाम दूसरों पर ज़ुल्म नहीं करता, बल्कि उन्हें सच्चाई समझने का मौका देता है। यही वजह है कि इस्लाम का पैग़ाम दुनिया में तेज़ी से फैला।
और (ऐ रसूल) अगर मुशरिकीन में से कोई तुमसे पनाह मागें तो उसको पनाह दो यहाँ तक कि वह ख़ुदा का कलाम सुन ले फिर उसे उसकी अमन की जगह वापस पहुँचा दो ये इस वजह से कि ये लोग नादान हैं
मगर (हाँ) जिन मुशरिकों से तुमने एहदो पैमान किया था फिर उन लोगों ने भी कभी कुछ तुमसे (वफ़ा एहद में) कमी नहीं की और न तुम्हारे मुक़ाबले में किसी की मदद की हो तो उनके एहद व पैमान को जितनी मुद्द्त के वास्ते मुक़र्रर किया है पूरा कर दो ख़ुदा परहेज़गारों को यक़ीनन दोस्त रखता है
फिर जब हुरमत के चार महीने गुज़र जाएँ तो मुशरिकों को जहाँ पाओ (बे ताम्मुल) कत्ल करो और उनको गिरफ्तार कर लो और उनको कैद करो और हर घात की जगह में उनकी ताक में बैठो फिर अगर वह लोग (अब भी शिर्क से) बाज़ आऎं और नमाज़ पढ़ने लगें और ज़कात दे तो उनकी राह छोड़ दो (उनसे ताअरूज़ न करो) बेशक ख़ुदा बड़ा बख़्शने वाला मेहरबान है
और (ऐ रसूल) अगर मुशरिकीन में से कोई तुमसे पनाह मागें तो उसको पनाह दो यहाँ तक कि वह ख़ुदा का कलाम सुन ले फिर उसे उसकी अमन की जगह वापस पहुँचा दो ये इस वजह से कि ये लोग नादान हैं
(जब) मुशरिकीन ने ख़ुद एहद शिकनी (तोड़ा) की तो उन का कोई एहदो पैमान ख़ुदा के नज़दीक और उसके रसूल के नज़दीक क्योंकर (क़ायम) रह सकता है मगर जिन लोगों से तुमने खानाए काबा के पास मुआहेदा किया था तो वह लोग (अपनी एहदो पैमान) तुमसे क़ायम रखना चाहें तो तुम भी उन से (अपना एहद) क़ायम रखो बेशक ख़ुदा (बद एहदी से) परहेज़ करने वालों को दोस्त रखता है
(उनका एहद) क्योंकर (रह सकता है) जब (उनकी ये हालत है) कि अगर तुम पर ग़लबा पा जाएं तो तुम्हारे में न तो रिश्ते नाते ही का लिहाज़ करेगें और न अपने क़ौल व क़रार का ये लोग तुम्हें अपनी ज़बानी (जमा खर्च में) खुश कर देते हैं हालॉकि उनके दिल नहीं मानते और उनमें के बहुतेरे तो बदचलन हैं
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