अत-तौबा · 7/129
अनुवाद उच्चारण — सूरा अत-तौबा
كَيْفَ يَكُونُ لِلْمُشْرِكِينَ عَهْدٌ عِندَ اللَّهِ وَعِندَ رَسُولِهِ إِلَّا الَّذِينَ عَاهَدتُّمْ عِندَ الْمَسْجِدِ الْحَرَامِ ۖ فَمَا اسْتَقَامُوا لَكُمْ فَاسْتَقِيمُوا لَهُمْ ۚ إِنَّ اللَّهَ يُحِبُّ الْمُتَّقِينَ ۝٧
Kaifa yakoonu lilmush rikeena `ahdun `indallaahi wa `inda Rasoolihee illal lazeena `aahattum `indal Masjidil Haraami famas taqaamoo lakum fastaqeemoo lahum; innallaaha yuhibbul muttaqeen
📖 हिंदी अर्थ
(जब) मुशरिकीन ने ख़ुद एहद शिकनी (तोड़ा) की तो उन का कोई एहदो पैमान ख़ुदा के नज़दीक और उसके रसूल के नज़दीक क्योंकर (क़ायम) रह सकता है मगर जिन लोगों से तुमने खानाए काबा के पास मुआहेदा किया था तो वह लोग (अपनी एहदो पैमान) तुमसे क़ायम रखना चाहें तो तुम भी उन से (अपना एहद) क़ायम रखो बेशक ख़ुदा (बद एहदी से) परहेज़ करने वालों को दोस्त रखता है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • عَهْدٌ: संधि, वचन, सुरक्षा का वादा।
  • عَاهَدتُّمْ: तुमने संधि की।
  • عِندَ الْمَسْجِدِ الْحَرَامِ: पवित्र मस्जिद (काबा) के पास — यहाँ संकेत हुदैबियyah की संधि की ओर है।
  • اسْتَقَامُوا: वे सीधे रहे, अर्थात अपने वचन पर दृढ़ रहे।
  • الْمُتَّقِينَ: परहेज़गार, जो अल्लाह से डरते हैं और उसकी आज्ञाओं का पालन करते हैं।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत उन मुशरिकों (बहुदेववादियों) के बारे में है जिन्होंने अल्लाह और उसके रसूल ﷺ के साथ की गई संधियों को बार-बार तोड़ा। अल्लाह तआला पूछते हैं: "ऐसे लोगों के लिए अल्लाह और उसके रसूल के पास कोई संधि कैसे हो सकती है?" — यह एक अर्थपूर्ण प्रश्न है जो उनकी संधि की अमान्यता को दर्शाता है, क्योंकि वे स्वयं वचन तोड़ने वाले हैं।

हालाँकि, अल्लाह ने एक अपवाद बताया: उन मुशरिकों को छोड़कर जिनसे तुमने मस्जिद-ए-हराम (हुदैबियyah) के पास संधि की थी। यह वे क़बीले थे जो हुदैबियyah की संधि में शामिल थे और उस पर कायम रहे। अल्लाह का आदेश है: जब तक वे तुम्हारे साथ अपनी संधि पर दृढ़ रहें, तुम भी उनके साथ संधि पर दृढ़ रहो। यह न्याय और वचन की पूर्ति का आदेश है।

अंत में अल्लाह फ़रमाता है कि वह उन परहेज़गारों से प्रेम करता है जो अपने वचनों को पूरा करते हैं, अल्लाह के आदेशों का पालन करते हैं और उसकी मनाही से बचते हैं। यह एक प्रोत्साहन है कि सच्ची परहेज़गारी (तक़वा) का एक बड़ा हिस्सा वचन की पूर्ति और ईमानदारी है।

शिक्षाएँ और लाभ:

  • इस आयत से हमें सीख मिलती है कि इस्लाम में वचन और संधि की पूर्ति कितनी महत्वपूर्ण है। एक मुसलमान को अपने वादों का पक्का होना चाहिए, चाहे सामने वाला कोई भी हो।
  • अल्लाह तआला न्याय और संतुलन का आदेश देते हैं — जो वचन निभाए, उसका सम्मान करो; जो धोखा दे, उससे सावधान रहो।
  • यह आयत हमें सिखाती है कि तक़वा (परहेज़गारी) केवल इबादत तक सीमित नहीं, बल्कि सामाजिक व्यवहार, अमानत और वादों की पूर्ति में भी झलकती है।
  • अल्लाह का प्रेम पाने का मार्ग सीधा और स्पष्ट है: उसकी आज्ञा का पालन, उसकी मनाही से बचाव, और लोगों के साथ सच्चाई और न्याय का व्यवहार।


📜 आयत 5-9 — सूरा अत-तौबा

5فَإِذَا انسَلَخَ الْأَشْهُرُ الْحُرُمُ فَاقْتُلُوا الْمُشْرِكِينَ حَيْثُ وَجَدتُّمُوهُمْ وَخُذُوهُمْ وَاحْصُرُوهُمْ وَاقْعُدُوا لَهُمْ كُلَّ مَرْصَدٍ ۚ فَإِن تَابُوا وَأَقَامُوا الصَّلَاةَ وَآتَوُا الزَّكَاةَ فَخَلُّوا سَبِيلَهُمْ ۚ إِنَّ اللَّهَ غَفُورٌ رَّحِيمٌ
फिर जब हुरमत के चार महीने गुज़र जाएँ तो मुशरिकों को जहाँ पाओ (बे ताम्मुल) कत्ल करो और उनको गिरफ्तार कर लो और उनको कैद करो और हर घात की जगह में उनकी ताक में बैठो फिर अगर वह लोग (अब भी शिर्क से) बाज़ आऎं और नमाज़ पढ़ने लगें और ज़कात दे तो उनकी राह छोड़ दो (उनसे ताअरूज़ न करो) बेशक ख़ुदा बड़ा बख़्शने वाला मेहरबान है
6وَإِنْ أَحَدٌ مِّنَ الْمُشْرِكِينَ اسْتَجَارَكَ فَأَجِرْهُ حَتَّىٰ يَسْمَعَ كَلَامَ اللَّهِ ثُمَّ أَبْلِغْهُ مَأْمَنَهُ ۚ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ قَوْمٌ لَّا يَعْلَمُونَ
और (ऐ रसूल) अगर मुशरिकीन में से कोई तुमसे पनाह मागें तो उसको पनाह दो यहाँ तक कि वह ख़ुदा का कलाम सुन ले फिर उसे उसकी अमन की जगह वापस पहुँचा दो ये इस वजह से कि ये लोग नादान हैं
7كَيْفَ يَكُونُ لِلْمُشْرِكِينَ عَهْدٌ عِندَ اللَّهِ وَعِندَ رَسُولِهِ إِلَّا الَّذِينَ عَاهَدتُّمْ عِندَ الْمَسْجِدِ الْحَرَامِ ۖ فَمَا اسْتَقَامُوا لَكُمْ فَاسْتَقِيمُوا لَهُمْ ۚ إِنَّ اللَّهَ يُحِبُّ الْمُتَّقِينَ
(जब) मुशरिकीन ने ख़ुद एहद शिकनी (तोड़ा) की तो उन का कोई एहदो पैमान ख़ुदा के नज़दीक और उसके रसूल के नज़दीक क्योंकर (क़ायम) रह सकता है मगर जिन लोगों से तुमने खानाए काबा के पास मुआहेदा किया था तो वह लोग (अपनी एहदो पैमान) तुमसे क़ायम रखना चाहें तो तुम भी उन से (अपना एहद) क़ायम रखो बेशक ख़ुदा (बद एहदी से) परहेज़ करने वालों को दोस्त रखता है
8كَيْفَ وَإِن يَظْهَرُوا عَلَيْكُمْ لَا يَرْقُبُوا فِيكُمْ إِلًّا وَلَا ذِمَّةً ۚ يُرْضُونَكُم بِأَفْوَاهِهِمْ وَتَأْبَىٰ قُلُوبُهُمْ وَأَكْثَرُهُمْ فَاسِقُونَ
(उनका एहद) क्योंकर (रह सकता है) जब (उनकी ये हालत है) कि अगर तुम पर ग़लबा पा जाएं तो तुम्हारे में न तो रिश्ते नाते ही का लिहाज़ करेगें और न अपने क़ौल व क़रार का ये लोग तुम्हें अपनी ज़बानी (जमा खर्च में) खुश कर देते हैं हालॉकि उनके दिल नहीं मानते और उनमें के बहुतेरे तो बदचलन हैं
9اشْتَرَوْا بِآيَاتِ اللَّهِ ثَمَنًا قَلِيلًا فَصَدُّوا عَن سَبِيلِهِ ۚ إِنَّهُمْ سَاءَ مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ
और उन लोगों ने ख़ुदा की आयतों के बदले थोड़ी सी क़ीमत (दुनियावी फायदे) हासिल करके (लोगों को) उसकी राह से रोक दिया बेशक ये लोग जो कुछ करते हैं ये बहुत ही बुरा है
अत-तौबाकुरान सूची
129आयत
मदनीअवतरण स्थान
7आयत

अनुवाद — अत-तौबा 7

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Monday, September 28, 2026

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