अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- الضُّعَفَاءِ: कमज़ोर लोग, जैसे बूढ़े, बीमार, अंधे, और वे जो युद्ध की शक्ति नहीं रखते।
- الْمَرْضَى: वे लोग जो बीमार हैं और युद्ध में जाने पर सक्षम नहीं हैं।
- لَا يَجِدُونَ مَا يُنفِقُونَ: वे गरीब लोग जिनके पास युद्ध के लिए खर्च करने को धन नहीं है।
- حَرَجٌ: गुनाह, पाबंदी, या कोई तंगी।
- نَصَحُوا لِلَّهِ وَرَسُولِهِ: अल्लाह और उसके रसूल के प्रति ईमानदारी और ख़ैरख्वाही रखें, यानी दिल से ईमान लाएँ और आज्ञाओं का पालन करें।
- سَبِيلٍ: कोई रास्ता या तरीका (यहाँ मतलब: सज़ा या मलामत का रास्ता)।
- مُحْسِنِينَ: नेकी करने वाले, जो अच्छे काम करते हैं।
आयत की तफ़सीर:
यह आयत उन लोगों के लिए राहत और छूट देती है जो युद्ध (जिहाद) में शामिल नहीं हो सकते, क्योंकि उनके पास वाजिब उज़्र (वैध कारण) हैं। अल्लाह तआला फ़रमाता है कि कमज़ोर लोगों (जैसे बूढ़े, अंधे, लंगड़े, और बीमार) पर, और उन बीमारों पर जिन्हें युद्ध की ताकत नहीं, और उन गरीबों पर जिनके पास युद्ध के लिए खर्च करने को कुछ नहीं है, कोई गुनाह नहीं है अगर वे युद्ध में न जाएँ। लेकिन इस छूट की शर्त यह है कि वे अल्लाह और उसके रसूल के प्रति ईमानदार हों, यानी उनके दिलों में ईमान सच्चा हो, वे अल्लाह की आज्ञाओं का पालन करें और रसूल ﷺ की सुन्नत पर चलें। वे अपनी ज़ुबान से या दिल से किसी भी तरह की बुराई या नफ़रत न रखें, बल्कि अच्छे इरादे रखें।
फिर अल्लाह फ़रमाता है: "मा अलल-मुहसिनीना मिन सबील" यानी जो लोग नेकी करने वाले हैं (जैसे ये माज़ूर लोग जो सच्चे दिल से ईमान रखते हैं), उन पर कोई रास्ता नहीं है — यानी उन्हें मलामत करने, सज़ा देने, या उनके खिलाफ कोई कार्रवाई करने का कोई रास्ता नहीं है। क्योंकि उन्होंने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की और वे सच्चे हैं, और अल्लाह उनके हाल से वाक़िफ है। आख़िर में अल्लाह फ़रमाता है: "वल्लाहु ग़फूरुन रहीम" — अल्लाह बहुत क्षमा करने वाला और बहुत दयालु है। वह अपने नेक बंदों के गुनाह माफ करता है और उन पर रहम करता है।
फ़ायदे (सबक़):
- इस आयत से पता चलता है कि इस्लाम में आसानी है — अल्लाह ने कमज़ोर और बीमार लोगों पर वह ज़िम्मेदारी नहीं डाली जो उनकी ताकत से बाहर है। यह रहमत और नर्मी का दीन है।
- नेकी और अच्छे इरादे की अहमियत — अगर कोई इंसान सच्चे दिल से चाहता है और अपनी ताकत के मुताबिक अमल करता है, तो अल्लाह उससे खुश होता है, चाहे वह बड़े काम न कर सके।
- अल्लाह की क्षमा और रहमत की उम्मीद — हमें हमेशा अल्लाह से माफी की उम्मीद रखनी चाहिए और यह यकीन रखना चाहिए कि वह अपने नेक बंदों को बख्श देता है।
- यह आयत हमें सिखाती है कि दूसरों के हालात को समझना चाहिए और जो लोग वाजिब कारण से पीछे रह जाते हैं, उन्हें मलामत नहीं करनी चाहिए, बल्कि उनके इरादों को देखना चाहिए।
- इस्लाम में ईमानदारी (नसीहत) की बहुत अहमियत है — अल्लाह और रसूल के प्रति सच्ची ख़ैरख्वाही ही असली कसौटी है, चाहे इंसान किसी भी हालत में हो।
📜 आयत 89-93 — अत-तौबा
अनुवाद — अत-तौबा 91
सूरा अत-तौबा आयत 91 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : (ऐ रसूल जिहाद में न जाने का) न तो कमज़ोरों…सूरा आयत 91/129 — अत-तौबा التوبة (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अत-तौबा सुनें, अत-तौबा अनुवाद, अत-तौबा mp3, अत-तौबा pdf. आयत 89–93. हिंदी अर्थ: اردو.
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Tuesday, August 18, 2026
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