अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
- المُعَذِّرُونَ: वे लोग जो बहाने बनाकर आए, हालाँकि उनके पास कोई सच्चा उज़्र (वैध कारण) नहीं था।
- الأَعْرَابِ: बद्दू (ग्रामीण अरब) जो नगरों से बाहर रेगिस्तान में रहते थे।
- لِيُؤْذَنَ لَهُمْ: ताकि उन्हें (जिहाद से बचने की) अनुमति दे दी जाए।
- وَقَعَدَ: और बैठे रहे (यानी बिना अनुमति लिए ही पीछे रह गए)।
- كَذَبُوا اللَّهَ وَرَسُولَهُ: उन्होंने अल्लाह और उसके रसूल से झूठ बोला (यानी ईमान का दावा झूठा था)।
- عَذَابٌ أَلِيمٌ: दर्दनाक (बहुत तकलीफ़देह) यातना।
तफ़सीर (व्याख्या):
जब अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने तबूक के जिहाद का एलान किया, तो आस-पास के रेगिस्तानी इलाकों (बद्दूओं) में से कुछ लोग आपके पास हाज़िर हुए। ये लोग असल में बहाने बनाने वाले थे — उनके पास कोई सच्चा और वैध कारण नहीं था, लेकिन वे झूठे बहाने पेश कर रहे थे कि हम कमज़ोर हैं, हमारे पास सवारी नहीं है, हमारे परिवार बड़े हैं, वगैरह — ताकि आप उन्हें जिहाद से माफ़ कर दें और उन्हें पीछे रहने की इजाज़त दे दें।
दूसरी ओर, कुछ और लोग थे — जो मुनाफ़िक़ (दिखावटी मुसलमान) थे — वे न तो आए, न उन्होंने कोई उज़्र पेश किया, बल्कि चुपचाप घर बैठे रहे। उन्होंने अल्लाह और उसके रसूल से झूठ बोला था, क्योंकि वे ज़बान से ईमान का दावा करते थे, लेकिन दिल से काफ़िर थे। उनका यह बैठना अल्लाह और उसके रसूल की अवज्ञा थी।
अल्लाह तआला फ़रमाता है कि इनमें से जो लोग कुफ़्र पर अड़े रहे, उन्हें ज़रूर दर्दनाक अज़ाब पहुँचेगा — दुनिया में क़त्ल, क़ैद या ज़िल्लत के रूप में, और आख़िरत में जहन्नम की आग के रूप में। यह उनके झूठ और नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की नाफ़रमानी का नतीजा है।
फ़ायदे (सबक़):
- ईमान का दावा सिर्फ़ ज़बान से नहीं होता — असली ईमान वह है जो दिल में हो और अमल से साबित हो। जो लोग अल्लाह और रसूल से झूठ बोलते हैं, उनका अंजाम बुरा है।
- जिहाद और अल्लाह के काम में पीछे रहना बड़ी बुराई है — जब मुसलमानों को किसी भलाई के काम के लिए बुलाया जाए, तो बहाने बनाकर बचना और घर बैठ जाना मुनाफ़िक़ों की आदत है। मोमिन की शान यह है कि वह हर हाल में दीन की मदद के लिए आगे बढ़े।
- बहाने बनाना और सच्चाई से भागना कमज़ोर ईमान की निशानी है — सच्चा मुसलमान अपनी कमियों को स्वीकार करता है और जितना हो सके अल्लाह के काम में हिस्सा लेता है।
- अल्लाह की यातना से बचने का रास्ता सिर्फ़ ईमान और अमल है — जो लोग कुफ़्र और नाफ़रमानी पर मरते हैं, उनके लिए दुनिया और आख़िरत दोनों में तकलीफ़ है। इसलिए हमें हमेशा अल्लाह की इताअत (आज्ञापालन) और रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की पैरवी को अपना जीवन-लक्ष्य बनाना चाहिए।
- अल्लाह हर नीयत को जानता है — यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह के सामने हमारे बहाने और हमारी सच्चाई दोनों साफ़ हैं। इसलिए हमें अपनी नीयत को हमेशा सच्चा और ख़ालिस रखना चाहिए।
📜 आयत 88-92 — अत-तौबा
अनुवाद — अत-तौबा 90
सूरा अत-तौबा आयत 90 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : और (तुम्हारे पास) कुछ हीला करने वाले गवार देहाती (भी)…सूरा आयत 90/129 — अत-तौबा التوبة (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अत-तौबा सुनें, अत-तौबा अनुवाद, अत-तौबा mp3, अत-तौबा pdf. आयत 88–92. हिंदी अर्थ: اردو.
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Tuesday, August 18, 2026
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